Tuesday, December 21, 2010
बुंदेलखंड मे खाद- बीज की किल्लत
Saturday, October 16, 2010
राष्ट्रमंडल खेलों की सफलता तथा इससे मिलती सीख व अनुभव
राष्ट्रमंडल खेलो की सफलता व गौरवपूर्ण परिसमाप्ति के तुरंत बाद इसका श्रेय लेने की राजनेताओं मे होड़ मची हुई है | राजनेता भले ही अपने मुह मिया मिट्ठू बनकर खुद अपनी पीठ थपथपा लें , देश की जनता किसी राजनेता को इसका श्रेय देने से रही , क्योकि लोगो को बखूबी पता है कि राजनेताओं ने खेलों तथा खेल आयोजनों के सम्बन्ध मे न तो समय से निर्णय लिए और इसकी तैयारियों मे काफी घपलेबाजियां की गयी थी, भ्रष्टाचार का नंगा नाच हुआ और पूरे देश की साख को बट्टा लगाया | इन नेताओं और व्यवस्थाकारों ने खिलाडियों को अभ्यास के लिए आवश्यक साजो समान तक समय से नहीं मुहैया कराया , उदाहरणार्थ निशानेबाजों को अभ्यास के लिए समय से कारतूस तक नहीं उपलब्ध कराये गए थे | ऐसी स्थिति मे राजनेताओं को श्रेय देने का प्रश्न नहीं उठता | आज की जनता बहुत होशियार हो गयी है और देश की जनता को यह भली भांति पता है कि इस सम्बन्ध मे किसी भी प्रकार का श्रेय राजनेताओं , खेल प्रशासन , खिलाडियों , प्रशिक्षकों तथा कोच मे से किसको मिलना चाहिए |
इस गौरवशाली सफलता मे सबसे पहला श्रेय खिलाडियों को मिलना चाहिए, जिन्होंने जी तोड़ मेहनत करके इतने अधिक पदक जीते | यदि खिलाडियों को समय से प्रचुर सुविधाएँ उपलब्ध करायी जाती, तो स्वर्ण पदकों तथा जीते गए पदकों की कुल संख्या काफी अधिक होती | इस खेल महाकुम्भ के आयोजन का सर्बाधिक लाभ यही रहा है कि देश मे खेल पुनर्जागरण के अभिनव युग का सूत्रपात हो चुका है और अब खेल यात्रा विश्व विजय के बाद ही थमेगी , जिसका प्रमाण एक माह बाद ही आयोजित होने वाले एशियन खेलों से मिलना शुरू हो जावेगा और अगले ओलम्पिक तथा राष्ट्रकुल खेलों मे व्यापक प्रभाव परिलक्षित होगा, ऐसी उम्मीद बनी है |
खेल के क्षेत्र का सबसे बड़ा कार्य यही है कि प्रारंभिक स्तर पर खेल प्रतिभाओं की पहचान करने की धरातल स्तर की व्यावहारिक योजना बनायीं जाय और इसका पूरी ईमानदारी से कार्यान्वित किया जाय | राजनीति को कमसे काम इस स्तर पर पूर्णतया अलग थलग रखा जाय , क्योंकि राजनीति और भाई भतीजाबाद वस्तुतः खेल को बिगाड़ते हैं और प्रारंभिक स्तर पर हुई गड़बड़ी को आगे किसी तरह ठीक नहीं किया जा सकता | प्रारंभिक चयन के बाद उनका सर्बश्रेष्ट प्रशिक्षण देकर उनकी क्षमता तथा कौशल का सुधार करना और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाडियों के साथ खेलने का अवसर दिलाना काफी लाभदायक हो सकता है | उपयुक्त स्तरों पर तत्क्रम पर समीक्षा करना भी आवश्यक होगा | राज्यों को इस सम्बन्ध मे सर्बाधिक दिलचस्पी लेने का बहुत अच्छा लाभ मिलेगा , जैसा कि हरयाणा सरकार ने करके अनुकरणीय उदाहरण अन्य राज्यों के समक्ष रखा है , जिसके चलते छोटे से हरयाणा राज्य के खिलाडियों ने हर राज्य से अधिक पदक जीते | इसके अलावा खेल को कैरियर के रूप अपनाने का अवसर उपलब्ध कराने के आशय से तकनीकी संस्थानों की तर्ज पर बड़े पैमाने पर खेल संस्थान खोलने की भी जरुरत होगी | तत्क्रम मे सरकारी नीति निर्धारण की भी आवश्यकता होगी |
Friday, October 8, 2010
गति और प्रगति
अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा
भारत की सुरक्षा और अस्मिता से जुडी विशिष्ट पहचान संख्या योजना
अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा
Thursday, April 29, 2010
प्रवर्तन कार्य की असली हकीकत
यह भी एक सच है कि परिवहन विभाग का प्रवर्तन अधिकारी माह मे लगभग 3000 वाहनों को ही चेक कर सकता है, जबकि उसके कार्यक्षेत्र मे लाख से अधिक वाहन चलते हैं | ऐसी दशा मे उक्त अधिकारी अधिक से अधिक वाहनों को कवर करना चाहता है | अतः बड़ी बड़ी ट्रांसपोर्ट कंपनियों से वह माहवारी बांध लेता है, जिससे बड़ी कम्पनियों के वाहन क़ानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए बिना किसी भये के सीना तान कर चले जाते हैं | जबकि अधिकारी फुटकर वाहनों को मामूली जुर्मो मे चलान कर अपना कोटा पूरा करता है | इस प्रकार की कार्यवाही पर सबकी नजर रहती है, अतयव प्रवर्तन अधिकारी की सामाजिक प्रतिष्ठा एवं मनोबल पर बहुत बुरा असर पड़ता है और वह समाज से खुलकर नजर नहीं मिला सकता है | ऐसे व्यक्ति से हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह कानून का पालन कराएगा | यह तो मात्र उदहारण है | इसी तरह की स्थितियां अन्य विभागों जैसे कि पुलिस, आबकारी, सप्लाई, ट्रेड टैक्स, इनकम टैक्स आदि विभागों की प्रवर्तन मशीनरी की भी होती है |
जहाँ तक पुलिस विभाग का प्रश्न है, सर्वाधिक कानूनों को लागू करने तथा उल्लंघन होने की दशा मे दंडात्मक कार्यवाही करने की जिम्मेदारी इसी विभाग की है | इसके विपरीत पुलिस अधिकारियो के पास प्रवर्तन कार्य के लिए बिलकुल समय नहीं होता है | वे वीआईपी एवं कानून व्यवस्था सहित नेताओं व पत्रकारों से समायोजन करने मे ही इतने व्यस्त रहते है कि अन्य कार्यो हेतु उन्हें समय नहीं मिलता | उनके द्वारा किये गए कार्यों का उच्चाधिकारियों द्वारा मूल्यांकन की दोषपूर्ण प्रक्रिया भी प्रवर्तन अधिकारी का मनोबल एवं कार्यक्षमता गिराने वाली सिद्ध होती है | पुलिस विभाग के उच्चाधिकारी के पास मूल्यांकन की दुधारी तलवार होती है, जिसका वह मनमाफिक इस्तेमाल कर सकता है | अर्थात एक पुलिस अधिकारी खुश होने पर अपने अधीनस्त के कार्य पर उसे शाबाशी दे सकता है और नाराज होने पर उसी कार्य पर उसे कठोर दंड भी दे सकता है | यानि वह यह कहकर शाबाशी देता है कि तुमने रात रात भर जागकर बहुत सारे डकैतों एवं चोरों को पकड़कर अपराधियों के हौसले पस्त कियें हैं | वही अथवा अन्य अधिकारी नाराज होने पर उसी अधिकारी को दण्डित कर सकता है कि तुम्हारे कार्यकाल मे अपराध बहुत बढ़ गए हैं और तुम्हे पद पर रहने का कोई हक़ नहीं है | मूल्यांकन के इस दोषपूर्ण अधिकार के कारण उच्चाधिकारियों की जी हजूरी की प्रवृति भी पुलिस विभाग मे खूब दिखाई पड़ती है, जिससे भी विभाग की कार्य क्षमता प्रतिकूल ढंग से प्रभावित होती है |
उपरोक्त के अलावा पुलिस विभाग के उपनिरीक्षक तक को वाहनों को चेकिंग करने एवं मौके पर जुर्माना वसूलने का अधिकार मिल जाने से पूरी पुलिस फ़ोर्स का आधा समय इसी काम मे लग जाता है, क्योंकि कुछ ख़ास कारणों से इसमें सब की विशेष रूचि होती है | इसके कारण भी पुलिस को उसके असली कामो के लिए समय नहीं मिल पाता है और इससे उसकी कार्य क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है |