<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783</id><updated>2011-12-07T14:40:33.947+05:30</updated><category term='अन्य'/><category term='शिक्षा'/><category term='ग्रामीण'/><category term='विज्ञान'/><category term='संस्कृति'/><category term='सम्पादकीय'/><category term='विकास योजनायें'/><category term='भक्ति एवं आद्यात्म'/><category term='राजनीतिक'/><category term='कृषि'/><category term='समाज'/><category term='प्रशासन'/><category term='सामाजिक समस्याएं'/><category term='खेल'/><category term='राष्ट्रीय'/><category term='पर्यावरण'/><title type='text'>Apna Bundelkhand</title><subtitle type='html'>Transforming Bundelkhand</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>71</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-5825033658443402451</id><published>2011-01-29T10:21:00.000+05:30</published><updated>2011-01-29T10:21:59.649+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकास योजनायें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीतिक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सामाजिक समस्याएं'/><title type='text'>बुंदेलखंड का अलग राज्य बनाये जाने का औचित्य</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;बुंदेलखंड आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-भाषा&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;यी समानता वाला एक अलग व स्वतन्त्र भौगोलिक प्रक्षेत्र है, जो आजादी के ६३ साल बाद भी उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के मध्य अप्राकृतिक व अवैज्ञानिक रूप से बटा अब तक विकास की बाट जोह रहा है, जबकि देश के अधिकांश हिस्से विकास की राह पर काफी आगे बढ़ गए हैं | इसी कारण बुंदेलखंड आज देश के सबसे गरीब व पिछड़े क्षेत्र के रूप मे जाना-पहचाना जाता है, जबकि प्राकृतिक, वन व खनिज सम्पदा तथा पर्यटन स्थलों की दृष्टि से बुंदेलखंड अत्यधिक समृद्ध है और जिनका उपयोग करके बुंदेलखंड को बहुत अधिक विकसित किया जा सकता है | बुंदेलखंड का इतिहास, संस्कृति, सामाजिक रीति रिवाजों/ परम्पराओं, बोली मे समानता है और लोगों मे अपने पन तथा भावनात्मक एकता की भावना का होना बुंदेलखंड क्षेत्र की विशेषता है |&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; उपरोक्त पृष्ठिभूमि मे बुंदेलखंड के पिछड़ेपन के कारणों एवं उपायों के सम्बन्ध मे&amp;nbsp; गंभीरतापूर्वक विचार करना बहुत आवश्यक हो गया है | बुंदेलखंड मे उत्तर प्रदेश का झाँसी, ललितपुर, हमीरपुर, बांदा, महोबा, चित्रकूट जनपद तथा मध्य प्रदेश का दतिया, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, सागर, दमोह, कटनी जनपद, सतना जनपद का चित्रकूट विधान सभा क्षेत्र, गुना जनपद का चंदेरी विधान सभा क्षेत्र, शिवपुरी जनपद का पिछोर विधान सभा क्षेत्र, भिंड जनपद का लहर विधान सभा क्षेत्र, नरसिंह जनपद की गाडरवाला तहसील, विदिशा, साँची, गंज बासौदा क्षेत्र आता है | &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; यह एक निर्विवाद सत्य है कि बुंदेलखंड का विकास तभी संभव हो सकता है, जब पूरी ईमानदारी तथा निष्ठांपूर्वक बुंदेलखंड क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं की पहचान करके उनका समाधान ढूंढने का प्रयास किया जाय | यह तभी संभव हो सकता है, जब उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश से अलग करके बुंदेलखंड राज्य गठित किया जाये और बुंदेलखंड राज्य की धरती पर बैठ कर इस क्षेत्र की समस्याओं की पहचान कर उनके समाधान की योजना बनाकर बुंदेलखंड के लोगों द्वारा ही सम्पादित किया जाय | तभी इस क्षेत्र के बिपुल संसाधनों का उपयोग करके बुंदेलखंड के लोगों का कल्याण करना संभव हो सकेगा | अभी तक भिन्न आर्थिक-सामाजिक-भौगोलिक परिवेश(लखनऊ-भोपाल) से बुंदेलखंड वासियों के लिए योजना विरचन तथा कार्यान्वयन सम्बन्धी कार्य सम्पादित किये जा रहे हैं | इसी दोष पूर्ण कार्य पद्धति के कारण ही आजादी के ६३ वर्ष तक बुंदेलखंड पिछड़ा का पिछड़ा बना हुआ है और जन अपेक्षाएं निरंतर उपेक्षित हो रही हैं | अतयव बुंदेलखंड की वर्तमान स्थिति को आगे भी अनंत काल तक बनाये रखना औचित्य पूर्ण नही प्रतीत होता है और न ही इस क्षेत्र की जनता ही यह बर्दास्त करेगी |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; उपरोक्त के परिप्रेक्ष्य मे ही कदाचित बुंदेलखंड आज दोनों राज्यों व केंद्र सरकारों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण बन गया है, जो एक दूसरे से आगे बढकर बुंदेलखंड के विकास की बातें कर रही हैं और काफी धनराशियाँ भी आबंटित कर रही है, पर दूरस्थ प्रणाली द्वारा संचालित होने के कारण इन विकास परक प्रयासों का लाभ न तो बुंदेलखंड को मिल पा रहा है और न ही बुंदेलखंड की धरती पर इसका कोई सकारात्मक प्रभाव ही परिलक्षित हो रहा है |&amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; देश मे बुंदेलखंड की ही तरह उपेक्षित व पिछड़े क्षेत्रों को अलग करके उत्तराँचल, छत्तीस गढ़, झारखण्ड आदि राज्य बनाये गए हैं | जिसका अत्यधिक सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहा है | नये राज्यों के बनने के बाद वहां के निवासियों मे अदम्य उत्साह का संचरण हुआ है | इन राज्यों का विकास कई कई गुना बढ गया है और वे अपने पुराने पैत्रिक प्रान्त को विकास की दौड़ मे काफी पीछे छोड़ कर काफी आगे बढ गए हैं | इसका मुख्य कारण अपने राज्य की धरती पर बैठ कर वास्तविक जरूरतों और समस्याओं की पहचान कर सम्यक योजना विरचन एवं कार्यान्वयन द्वारा अपना विकास करना रहा है | अलग राज्य बनने के पश्चात् इन राज्यों के निवासियों मे निजता और आत्म निर्णय का भाव पैदा हुआ है और सभी मिलकर अपने अपने प्रदेशों को तेजी के साथ आगे बढ़ने की ओर चल पड़े हैं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; बुंदेलखंड की एक विशेष बात यह भी है कि बुंदेलखंड का भूभाग उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश दोनों राज्यों के अंतर्गत आता है | अतयव दोनों प्रदेशों द्वारा समान समस्याओं के सन्दर्भ मे समान, समन्वित व एकीकृत प्रयास नही हो पाता है | इसके अलावा यह भी ध्रुव सत्य है कि अनेकानेक कारणों से दोनों प्रान्त सरकारें यह नहीं चाहती कि उनका कोई अंश उनसे अलग हो | यह भी सही है कि बन व खनिज सम्पदा की दृष्टि से मध्य प्रदेश स्थित बुंदेलखंड अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध है | अतयव बुंदेलखंड के बृहत्तर एकीकरण के फलस्वरूप सम्पूर्ण बुंदेलखंड का सही मायने मे विकास संभव हो सकेगा और संसाधनों की कमी बाधक नही साबित होगी | तब हम देखेंगे कि देश के अन्य नव सृजित प्रदेशों की भांति बुंदेलखंड के लोग भी हीन भावना से उबरकर स्वाभिमान और निजता के भाव से अपना व क्षेत्र का विकास कर सकेगे | &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बुंदेलखंड के अलग प्रान्त की मांग करने वाले कई संगठन/ संस्थाएं एतदर्थ कार्य कर रही हैं, उनके प्रयासों मे एकरूपता, समन्वय व परस्पर सहयोग का अभाव देखने मे आ रहा है | अतयव यह आवश्यक प्रतीत होता है कि इस दिशा मे क्रियाशील समस्त संगठन/ संस्थाओं/ व्यक्तियों को चाहिए के वे अपने अहम् को तिलाजली देकर समन्वित, एकीकृत एवं सहयोगात्मक प्रयास करना चाहिए | तभी इस वृहत्तर लक्ष्य को शीघ्रतापूर्वक प्राप्त करना संभव हो सकता है और यही बुंदेलखंड के हित मे है |&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम&lt;/span&gt; के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-5825033658443402451?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/5825033658443402451/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2011/01/blog-post_2278.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/5825033658443402451'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/5825033658443402451'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2011/01/blog-post_2278.html' title='बुंदेलखंड का अलग राज्य बनाये जाने का औचित्य'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' 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normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;प्रत्येक संरचना का प्राण केंद्र होना एक अनिवार्य अपरिहार्यता है | अर्थात प्राण केंद्र विहीन किसी&amp;nbsp; संरचना की कल्पना तक नहीं की जा सकती | श्रृष्टि संरचनात्मक विधान मे परमाणु सबसे छोटी इकाई होती है, जिसका भी प्राण केंद्र अवश्यमेव ही होता है | इलेक्ट्रान तथा प्रोटान उक्त परमाणु से सम्बद्ध रहकर उसकी निरन्तर परिक्रमा करते रहते हैं | समस्त परमाणुओं का समग्र रूप एक ग्रह यानि पृथ्वी की संरचना को आकार देता है | पृथ्वी का गुरुत्व केंद्र इसका प्राण केंद्र और चन्द्रमा पृथ्वी का इलेक्ट्रान है, जो पृथ्वी के प्राण केंद्र से आबद्ध रहकर पृथ्वी के अंश के रूप मे इसकी निरंतर परिक्रमा करता रहता है | सूर्य सौर्य-मंडल का प्राण केंद्र है और सारे ग्रह-उपग्रह&amp;nbsp;सूर्य से आबद्ध रहकर&amp;nbsp; सूर्य की निरन्तर परिक्रमा करते रहते हैं | ब्रह्माण्ड मे असंख्य सौर-मंडल हैं और समस्त सौर-मंडल एक महा-सौर-मंडल की संरचना करते हैं | महा सूर्य की स्थिति इस महा-सौर-मंडल के&amp;nbsp; प्राण केंद्र की है और सारे सौर-मंडल इस महा-सूर्य से आबद्ध रहकर महा-सूर्य की निरन्तर परिक्रमा करते रहते हैं | यह क्रम आगे भी उस अंतिम सत्ता तक चलता रहता है, जिससे आबद्ध रहकर ब्रह्माण्ड की समस्त संरचनाएं उसकी परिक्रमा करती रहती हैं | यह परम सत्ता पूरे ब्रह्माण्ड की समस्त संरचनाओं का परिचालन, नियंत्रण तथा पोषण करता है | इस प्रकार यही सर्व शक्तिमान, सर्व विद्यमान एवं सर्व नियंतात्मक सत्ता है |&amp;nbsp; इसी परम सत्ता को हम-सब परम पुरुष अथवा ब्रह्म के नाम से जानते हैं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; उपरोक्तानुसार श्रृष्टि संरचना विधान की तरह ही समाज संरचना की भी स्थिति है | परमाणु की तरह ग्राम सबसे छोटी इकाई होती है | ग्राम प्रधान प्रत्येक ग्राम संरचना का प्राण केंद्र होता है | समस्त ग्राम स्तरीय कर्मचारियों की स्थिति प्रधान के सचिवों के समान ही होती है | लेखपाल राजस्व सचिव, ग्राम सेवक विकास सचिव, पंचायत सेवक पंचायत सचिव, बी एच डब्लू स्वास्थ्य सचिव, सींचपाल सिचाई&amp;nbsp; सचिव, प्रधानाध्यापक शिक्षा सचिव, लाइनमैन विद्युत् सचिव की भांति होते हैं | वास्तव मे ग्राम प्रधानों की स्थिति इन सभी ग्राम स्तरीय सचिवों के अध्यक्ष एवं समन्वयक की तरह&amp;nbsp; हैं | विकेंद्रीकरण की स्थिति मे अब ग्राम प्रधान पहले से अधिक प्रभावी व शक्तिशाली बन गए हैं और वे ग्राम स्तरीय कर्मचारियों के नियंत्रक बन गए हैं | परन्तु इस स्वस्थ स्थिति का समुचित संज्ञान न तो शासन- प्रशासन को है, और न ही प्रधान व उसके विभिन्न सचिवगण को ही इसका अथोचित सज्ञान होता है | यही कारण है कि उपरोक्तानुसार विभिन्न ग्राम स्तरीय कर्मचारियों एवं विभागों का कार्य कलाप सही ढंग से नहीं हो पा रहा है और विकाश सही व सकारात्मक रूप से नहीं संभव हो पाता है | उपरोक्तानुसार परिस्थितियों मे शासन- प्रशासन विकास का अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने मे असफल होता सा प्रतीत होता है |&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; १९७९-८२ तक अपर जिलाधिकारी (परियोजना) फतेहपुर के अपने कार्यकाल मे मैंने इस विसंगति को देखा था और इस सम्बन्ध मे गहन अनुशीलन के पश्चात् अपना मत निर्धारित कर लिया था | उस समय मैंने शासन को तत्क्रम मे एक तथ्य परक सुझाव भी भेजा था, पर इस सम्बन्ध मे शासन स्तर से&amp;nbsp; समुचित पहल अब तक संभव नहीं हो सकी है | यही कारण है कि विकास की यात्रा मे हम आज तक वांक्षित स्तर तक नही पहुँच पाए हैं | तत्क्रम मे मेरा सुझाव था ग्राम सचिवालयों की स्थापना | इस अवधारणा मे मात्र इतनी सी बात है कि यह सर्वमान्य तथ्य है कि ग्राम प्रधान ग्राम पंचायत का अध्यक्ष होता है | इसके अलावा सारे ग्राम स्तरीय कर्मचारी ग्राम प्रधान के सचिव के रूप मे होते हैं | इस तथ्य को प्रधान व उसके सचिवों को भली भाति समझना समझाना आवश्यक है | प्रधान का अपने समस्त सचिवों के साथ सप्ताह मे एक दिन किसी&amp;nbsp; नियत स्थान पर बैठना आवश्यक है | तभी प्रधान का उनके नियंत्रक व समन्वयक होने की सार्थकता सिद्ध होगी | इसे ही हम ग्राम सचिवालय का नाम दे सकते हैं | ग्राम वासियों की सामान्यतया यह शिकायत रहती है कि वह अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए विभिन्न ग्राम स्तरीय कर्मचारियों का चक्कर लगाते हुए महीनो भटकता रहता है, परन्तु ग्राम स्तरीय कार्यकर्ता से नहीं मिल पाने के कारण उसका काम नहीं हो पाता है | इसका एक कारण यह भी होता है कि ग्राम स्तरीय कार्यकर्ताओं का कोई निश्चित कार्यालय नहीं होता, जहाँ उससे मिला जा सके | इसके अलावा विभिन्न कर्मचारियों का भी एक दूसरे से काम भी हो सकता है | ऐसी स्थिति मे भी ग्राम सचिवालय स्थापित करने की सार्थकता प्रमाणित होती है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; यह स्वागत योग्य बात है कि ग्राम सचिवालय की स्थापना के औचित्य के बारे मे आज देर से ही सही उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विचार प्रारंभ हो गया है | मुझे तो इससे ही विशेष ख़ुशी मिल रही है कि मेरे तीस साल पुराने चिंतन एवं प्रस्ताव के क्रम मे कमसे कम अब पहल शुरू हो रहा है , पर आशाजनक एवं सार्थक परिणाम पाने के उद्देश्य से ग्राम सचिवालय की अवधारणा को सही परिप्रेक्ष्य मे समझ कर ईमानदारी पूर्वक&amp;nbsp; कार्यान्वयन सुनिश्चित करना भी बहुत आवश्यक है |&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;a href="http://apnabundelkhand.com/"&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-1530259149508157163?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/1530259149508157163/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2011/01/blog-post_29.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/1530259149508157163'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/1530259149508157163'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2011/01/blog-post_29.html' title='ग्राम सचिवालय:एक यथार्थ परक एवं उपयोगी अवधारणा'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-973148562793968430</id><published>2011-01-08T13:42:00.000+05:30</published><updated>2011-01-08T13:42:33.061+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकास योजनायें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्कृति'/><title type='text'>बचत  की आदत:विकास का मूलमंत्र</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="-webkit-border-horizontal-spacing: 0px; -webkit-border-vertical-spacing: 0px; -webkit-text-decorations-in-effect: none; -webkit-text-size-adjust: auto; -webkit-text-stroke-width: 0px; border-collapse: separate; color: black; font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif;"&gt; &lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; संकटकालीन समय तथा भविष्य की आकस्मिक&amp;nbsp; ज़रूरतों&amp;nbsp; के लिए बचत करना एक अत्यधिक स्वाभाविक मानव&amp;nbsp;स्वभाव है&amp;nbsp;&amp;nbsp;और&amp;nbsp;यह&amp;nbsp;विकास&amp;nbsp;एवं&amp;nbsp;कल्याण&amp;nbsp;के&amp;nbsp;&lt;wbr&gt;लिए&amp;nbsp;बहुत&amp;nbsp;आवश्यक भी&amp;nbsp; है&amp;nbsp;&amp;nbsp;| मनुष्यों की बात तो दूर&amp;nbsp; यहाँ तक कि जानवरों&amp;nbsp; मे&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;संकट काल&amp;nbsp;&amp;nbsp;के लिए बचत करने की प्रवृति व व्यवहार देखने को मिल जाता&amp;nbsp; है | गिलहरी, चींटी, ऊंट और हाथी आदि लगभग अधिकांश&amp;nbsp;&amp;nbsp;जानवरों&amp;nbsp;मे&amp;nbsp;&amp;nbsp;भविष्य की संकट कालीन स्थिति के लिए संग्रह करने की प्रवृति पाई जाती है | जबकि जानवर वर्तमान मे ही जीते हैं और उनमे भविष्य के लिए चिता करने का भाव व&amp;nbsp;&amp;nbsp;स्वभाव नहीं होता है | इसे ही हम बचत की सार्वभौम आदत की संज्ञा दे सकते हैं | मनुष्यों मे&amp;nbsp;तो&amp;nbsp;&amp;nbsp;बचत की आदत एक&amp;nbsp;&amp;nbsp;अपरिहार्यता&amp;nbsp; है | अतयव&amp;nbsp;वे मनुष्य,&amp;nbsp;&amp;nbsp;जिनमे बचत की आदत नहीं होती, जानवरों से भी गए गुजरे माने जावेगें | &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; इस बचत की आदत के&amp;nbsp;&amp;nbsp;न होने के कारण प्रायः छोटी व सामान्य&amp;nbsp;सी&amp;nbsp;समस्याएं&amp;nbsp;&amp;nbsp;पहाड़ जैसी दुर्गम एवं कठिन लगने लगती हैं | एक उदाहरण लेकर मैं इसे स्पष्ट करना चाहूँगा | लडकियाँ सामान्यतया इस कारण भार- स्वरूप प्रतीत होती हैं कि उनकी शादी&amp;nbsp;आदि&amp;nbsp;प्रयोजनों&amp;nbsp;&amp;nbsp;मे काफी खर्चा करना&amp;nbsp;होता है | बचत की यही आदत&amp;nbsp;&amp;nbsp;लोगों&amp;nbsp;को&amp;nbsp;इस गंभीर&amp;nbsp; चिंता से मुक्त&amp;nbsp;करा&amp;nbsp;सकती&amp;nbsp;&amp;nbsp;हैं | लड़की के माता पिता लड़की के जन्म के समय&amp;nbsp; ही&amp;nbsp; अपने आर्थिक- सामाजिक स्तर के अनुसार कुछ&amp;nbsp;&amp;nbsp;हजार अथवा&amp;nbsp; कुछ&amp;nbsp; लाख रुपया २० साल के लिए लड़की के नाम सावधि जमा&amp;nbsp;करा देते हैं, तो शादी के समय &amp;nbsp;अपेक्षित धन की व्यवस्था स्वतः&amp;nbsp; हो जावेगी | ऐसी स्थिति मे लडकियों को भार स्वरूप समझने की स्थिति नहीं रह जाएगी | इतना ही नहीं , लडको की ही तरह यदि लड़कियों&amp;nbsp;को भी पढ़ा&amp;nbsp;लिखा&amp;nbsp;कर आर्थिक रूप से आत्म&amp;nbsp;निर्भर&amp;nbsp;बना दिया&amp;nbsp;जाता है तो लड़की&amp;nbsp;भी लड़कों की तरह कमाने&amp;nbsp;योग्य&amp;nbsp;अर्थात&amp;nbsp;asset बन जावेंगी | इससे लड़कों को asset तथा लड़कियों को liability समझ कर दहेज़ लेने व देने की कुरीति को समूल समाप्त करना भी&amp;nbsp; संभव हो सकता है , क्योंकि दहेज़ का मूल कारण आर्थिक ही है |. &amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; अब बचत की इस आदत को न अपनाने के दुष्परिणाम की तरफ यदि हम दृष्टिपात करें तो हम पाते हैं कि गरीबों उन्मूलन सहित तमाम ऋण योजनाओं मे किस्त देने हेतु अपेक्षित बचत करना अपरिहार्य&amp;nbsp; होता है , तभी ऋणी व्यक्ति बैंकों व तहसील का बकायेदार बनकर उत्पीडित होने&amp;nbsp; तथा वारंट गिरफ़्तारी आदि खतरनाक व घातक हथियारों के आघात से बचा रह सकता है | सरकारी मशीनरी तथा बैंक अपने कर्जों की वापसी हेतु किस्त भुगतान हेतु अपेक्षित धनराशि एकत्रित रखने के आशय से बचत करने की आदत डलवाने का प्रयास नहीं करते जो उनके तथा उनकी संस्था के लिए भी लाभदायक होता है | पर यह लोग कर्जदारों के पास तभी पहुंचते हैं, जब उनके शस्त्रागार मे वारंट- कुर्की- गिरफ़्तारी जैसे मारक व कारगर&amp;nbsp; हथियार आ जाते हैं | उनका यह व्यवहार मनुष्य का मनुष्य के साथ अपनाने जाने योग्य न होकर जात- शत्रुओं के साथ अपनाने वाले व्यवहार जैसा ही होता है |&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कुछ लोग तो लोगों द्वारा बचत की आदत डालने के ही पक्षधर नहीं होते | ऐसे चार्वाक दर्शन के मानने वालों का मानना है कि " यावत जीवेत सुखं जीवेत , ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत&amp;nbsp; |&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; भस्मीभूतस्य&amp;nbsp; देहस्य पुनरागमनं&amp;nbsp; कुतः | " ऐसी सोंच वाले लोग मनुष्य जाति और मनुष्यता के खतरनाक&amp;nbsp; शत्रु हैं और इससे मानव का विकास व कल्याण मे सर्वाधिक बाधा पहुंचती है |&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; इसीलिए मानव कल्याण व विकास के हित मे बचपन से ही बचत की आदत डलवाना परिवार, सरकार, समाज तथा शिक्षण संस्थाओं के दायित्व में सामिल होना चाहिए | इसके अलावा बचत की आदत को बढ़ावा देने हेतु प्रत्येक स्तर पर हर प्रकार का प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए | बैंकों द्वारा ऋण देने के साथ ही ऋण वापसी हेतु कमसे कम किस्त की धनराशि के बराबर बचत सुनिश्चित कराने का दायित्व भी बहन करना चाहिए और ऋण वापसी न सुनिश्चित हो पाने&amp;nbsp; की दशा में आधी जिम्मेदारी बैंकों को बहन करना चाहिए |&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कुछ लोगों का मानना है कि केवल खूब खाते- पीते लोगों द्वारा ही बचत की आदत डालना संभव है जो सही नहीं है | जबकि सही बस्तुस्थिति यह है कि प्रत्येक व्यक्ति, यहाँ तक कि भिखारी भी बचत कर सकता है और ५० - १०० रूपये का रिकरिंग डिपाजिट का खाता खोलवा कर इस खाते को निरन्तर चला सकता है | इसके लिए सबसे जरुरी चीज है इच्छा शक्ति की, जो हर एक मनुष्य के पास हो सकती है और इसके लिए व्यक्ति का आत्म विश्वास ही अपेक्षित होता है | तभी तो कई भिखारियों के मरने के बाद यह प्रायः देखने मे आता रहता है कि वे अकूत सम्पतियों व बड़े कारोबार के मालिक रहे हैं |&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&lt;/span&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;&lt;strong&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-973148562793968430?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/973148562793968430/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2011/01/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/973148562793968430'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/973148562793968430'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='बचत  की आदत:विकास का मूलमंत्र'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-6408522274198786948</id><published>2010-12-21T11:50:00.000+05:30</published><updated>2010-12-21T11:50:13.244+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सम्पादकीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्य'/><title type='text'>शाश्वत वाणी उपवन : एक साहित्यिक उद्यान</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; color: #202020; font-family: 'Droid Sans',arial,sans-serif;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;इतिहास की विरासत&amp;nbsp;को सजोना और इसे संरक्षित करना जहाँ एक ओर मानव स्वभाव है, वहीँ ऐसा करना समाज और&amp;nbsp; सरकार का परम&amp;nbsp;दायित्व &amp;nbsp;भी &amp;nbsp;है | इतिहास की ही तरह&amp;nbsp; साहित्य की विरासत को सहेजना भी आती आवश्यक &amp;nbsp;होता&amp;nbsp;है | &amp;nbsp;कमसे कम सौ या दो सौ सालों तक सामान्य जन मानस के जीवन मे अभिव्याप्त हो जाने वाला साहित्य &amp;nbsp;शाश्वत वाणी बन जाता&amp;nbsp; है | तब वे आप्त वचन, सूक्ति व प्रमाण बनकर जन जीवन का हिस्सा बन जाते हैं |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; इस शाश्वत वाणी से वैश्विक जनमानस को जोड़ना और उनका अधिकाधिक उपयोग सुनिश्चित करना एक सामाजिक दायित्व भी होता है | इसी सामाजिक दायित्व का सम्यक निर्वहन किये जाने के उद्देश्य से किसी बड़े पार्क मे एक शाश्वत वाणी उपवन निर्मित किये जाने की योजना को आकार &amp;nbsp;देने का&amp;nbsp;सम्यक &amp;nbsp;विचार समाज व सरकारों के समक्ष रखना चाहता हूँ | वेद व्यास, वाल्मीकि , कबीर, &amp;nbsp;गोस्वामी&amp;nbsp; तुलसीदास&amp;nbsp; , सूरदास , मीरा, &amp;nbsp;नानक , दादू , रैदास , रहीम , रसखान , बिहारी भूषण, अमीर खुसरो , भारतेंदु , &amp;nbsp;निराला , जय शंकर प्रसाद , महादेवी वर्मा, &amp;nbsp;सुमित्रा नंदन पन्त, मैथिली शरण गुप्त , दिनकर , सोहनलाल द्विवेदी , ग़ालिब , मेरे , आग , इक़बाल , &amp;nbsp;घाघ, आदि ३०- ४० कविगण को इस योजना का अंग बनाया जा सकता है | &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; शाश्वत वाणी उपवन की इस योजना मे एक बड़े पार्क को शाश्वत वाणी उपवन नाम से&amp;nbsp;साहित्यिक उद्यान के रूप मे विकसित किया जावेगा | यह उपवन उतने खण्डों (काम्प्लेक्स) मे विभक्त होगा, जितने साहित्यकारों को इस इस योजना&amp;nbsp;में संम्मिलित किये जाने की योजना बनायीं जाती है | प्रत्येक साहित्यकार का अपना अलग व स्वतन्त्र काम्प्लेक्स&amp;nbsp;होगा , जिसके बीचोबीच उस साहित्यकार की भव्य प्रतिमा होगी और प्रतिमा के नीचे तथा बगल मे साहित्यकार के परिचय सहित उनकी शाश्वत वाणी आकर्षक रूप मे&amp;nbsp;प्रदर्शित की जावेगी | उक्त खण्ड के एक ओर उनके वास्तविक&amp;nbsp;जीवन शैली से मिलता जुलता एक कुञ्ज बनाया जायेगा , जिसमे बैठने की उचित व्यवस्था सहित उक्त साहित्यकार&amp;nbsp;के गीतों के कैसेट निरन्तर बजते रहेंगे | वहाँ बैठने वालों को उक्त साहित्यकार के सानिध्य का अहसास हो, ऐसी व्यवस्था होगी | यह उपवन इतना आकर्षक व उपयोगिता परक होगा कि&amp;nbsp;इस उपवन मे जाने वाला व्यक्ति समस्त काम्प्लेक्स मे होता हुआ कमसे कम तीन घंटे वहा बंधकर रहे और बाहर साहित्यिक बनकर ही&amp;nbsp;निकले |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-6408522274198786948?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/6408522274198786948/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/12/blog-post_1213.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/6408522274198786948'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/6408522274198786948'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/12/blog-post_1213.html' title='शाश्वत वाणी उपवन : एक साहित्यिक उद्यान'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-6538300470425363337</id><published>2010-12-21T11:48:00.002+05:30</published><updated>2010-12-21T11:48:54.626+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कृषि'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीतिक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सामाजिक समस्याएं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रशासन'/><title type='text'>बुंदेलखंड मे खाद- बीज की किल्लत</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; color: #202020; font-family: 'Droid Sans',arial,sans-serif;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;इसे बुंदेलखंड के किसानो का दुर्भाग्य ही&amp;nbsp;कहा&amp;nbsp;जावेगा&amp;nbsp;कि&amp;nbsp;वर्षा&amp;nbsp;पर पूर्णतया आश्रित&amp;nbsp;खेती वाले&amp;nbsp;बुंदेलखंड&amp;nbsp;क्षेत्र&amp;nbsp;का किसान वर्षा ऋतु&amp;nbsp;&amp;nbsp;मे अपने&amp;nbsp;खेतो&amp;nbsp;मे इस कारण खरीफ की फसलें नहीं लेता , क्योंकि&amp;nbsp;यहाँ&amp;nbsp;प्रचलित अन्ना&amp;nbsp;प्रथा&amp;nbsp;यानि&amp;nbsp;छुट्टा&amp;nbsp;पशुओं&amp;nbsp;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;की&amp;nbsp;समस्या&amp;nbsp;के&amp;nbsp;कारण&amp;nbsp;बहुत&amp;nbsp;कम लोग&amp;nbsp;खरीफ&amp;nbsp;की फसल&amp;nbsp;बोते&amp;nbsp;हैं और सामान्यतया खेत खाली रखते हैं&amp;nbsp; | ऐसी स्थिति मे&amp;nbsp;बुंदेलखंड&amp;nbsp;का&amp;nbsp;किसान&amp;nbsp;मुख्यतया रबी&amp;nbsp;की फसल&amp;nbsp;पर ही निर्भर&amp;nbsp;रहता&amp;nbsp;है&amp;nbsp;और&amp;nbsp;वह&amp;nbsp;खरीफ की&amp;nbsp;कमी की&amp;nbsp;भरपायी&amp;nbsp;रबी&amp;nbsp;की फसल से&amp;nbsp;ही कर लेने को आतुर रहता है | इस&amp;nbsp;प्रकार&amp;nbsp;रबी की&amp;nbsp;फसल बुंदेलखंड के किसानो&amp;nbsp;के लिए&amp;nbsp;बहुत अधिक महत्वपूर्ण&amp;nbsp;होती है |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;इसलिए&amp;nbsp;रबी बुंदेलखंड की मुख्य फसल होतो है , अतयव रबी में खाद-&amp;nbsp;बीज आदि&amp;nbsp;कृषि&amp;nbsp;निवेशो&amp;nbsp;की उपलब्धता&amp;nbsp;सर्बाधिक&amp;nbsp;महत्वपूर्ण&amp;nbsp;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;हो&amp;nbsp;जाती&amp;nbsp;है, जिसके लिए किसान सरकार&amp;nbsp;व&amp;nbsp;कृषि&amp;nbsp;एजेंसियों&amp;nbsp;पर पूर्णतया निर्भर रहता है&amp;nbsp;| पर सरकार तथा कृषि संस्थाओं की सोची समझी चल व कुचक्र के कारण बुंदेलखंड में खाद - बीज आदि कृषि निवेशों की निरंतर किल्लत बनी रहती है और यह स्थिति बुंदेलखंड के किसान की कमर तोड़ देती है और रबी उत्पादन , जो बुंदेलखंड के किसानो का एकमात्र सहारा होता&amp;nbsp;है , प्रतिकूल ढंग से प्रभावित होता है | यह प्रत्येक वर्ष का रोना है और इसे&amp;nbsp; दोहराने की परंपरा सी बन गयी है |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; खाद- बीज- सिचाई- कीटनाशको&amp;nbsp;का प्रबंधन&amp;nbsp;ही&amp;nbsp;खेती&amp;nbsp;है और इन&amp;nbsp;सबके&amp;nbsp;लिए उसे&amp;nbsp;सरकार तथा कृषि सस्थाओं पर ही निर्भर रहना&amp;nbsp;पड़ता&amp;nbsp;है&amp;nbsp;|&amp;nbsp;वैसे&amp;nbsp;खेती मे समयबद्धता&amp;nbsp;का बहुत बड़ा&amp;nbsp;महत्व होता&amp;nbsp;है, परन्तु रबी फसल के&amp;nbsp;सन्दर्भ&amp;nbsp;मे यह समयबद्धता अपेक्षाकृत सर्वाधिक महत्वपूर्ण&amp;nbsp;घटक सिद्ध&amp;nbsp;होती&amp;nbsp;&amp;nbsp;है और इस&amp;nbsp;दृष्टि&amp;nbsp;से&amp;nbsp; तनिक&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;लापरवाही व बिलम्ब बड़ा घातक सिद्ध होता है और सम्पूर्ण रबी की&amp;nbsp; व्यवस्था&amp;nbsp;को&amp;nbsp;ही&amp;nbsp;छिन्न&amp;nbsp;भिन्न&amp;nbsp;कर&amp;nbsp;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;देता है&amp;nbsp;| सरकारी&amp;nbsp;तंत्र&amp;nbsp;एवं&amp;nbsp;एग्रो एजेंसियां&amp;nbsp;इस&amp;nbsp;समयबद्धता&amp;nbsp;के प्रति&amp;nbsp;बिलकुल&amp;nbsp;लापरवाह&amp;nbsp;होती&amp;nbsp;हैं&amp;nbsp;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;और प्रायः&amp;nbsp;ऐन मौके पर और कभी कभी जानबूझ&amp;nbsp;कर लापरवाही व&amp;nbsp; उदासीनता बरतने की स्थिति उत्पन्न कर देते हैं | इसी&amp;nbsp;कारण&amp;nbsp;समय&amp;nbsp;पर निवेशों&amp;nbsp;कीअपरिहार्य&amp;nbsp;उपलब्धता सुनिश्चित&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp;हो&amp;nbsp;पाती&amp;nbsp;और रबी के पूरे&amp;nbsp;कृषि&amp;nbsp;प्रबंध&amp;nbsp;को ही चौपट&amp;nbsp;कर देता&amp;nbsp;है&amp;nbsp;| ऐसा&amp;nbsp;करना&amp;nbsp;रबी के लिए&amp;nbsp;घातक&amp;nbsp;तो होता&amp;nbsp;ही&amp;nbsp;है&amp;nbsp;और कभी&amp;nbsp;कभी किसान की कमर&amp;nbsp;ही&amp;nbsp;तोड़&amp;nbsp;देता है |&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-6538300470425363337?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/6538300470425363337/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/12/blog-post_21.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/6538300470425363337'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/6538300470425363337'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/12/blog-post_21.html' title='बुंदेलखंड मे खाद- बीज की किल्लत'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-4276094180731725484</id><published>2010-12-13T16:38:00.000+05:30</published><updated>2010-12-13T16:38:34.293+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विज्ञान'/><title type='text'>न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत पूर्णतया गलत , तो फिर क्या</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: small;"&gt;यह विश्व ब्रह्माण्ड सार्बभौम नैसर्गिक नियमो से संचालित होता है और  रहस्यों का अपूर्व भंडार&amp;nbsp; है , जिसको समझने- समझाने मे अनेकानेक दार्शनिक व  वैज्ञानिक अपना जीवन समर्पित करते रहते हैं | अपनी&amp;nbsp; बौद्धिक एवं बोधिक  क्षमता&amp;nbsp;के&amp;nbsp;सीमान्तर्गत&amp;nbsp;&amp;nbsp;कतिपय रहस्यों से पर्दा उठाने मे वे कभी&amp;nbsp;कभार&amp;nbsp;&amp;nbsp;सफल  भी हो जाते हैं | मानव बुद्धि की क्षमता देश- काल- पात्र गत सापेक्षिकता से  प्रतिहत और तदनुसार बहुत अधिक&amp;nbsp;सीमित होती&amp;nbsp;&amp;nbsp;है | मनुष्य अपनी सापेक्ष  स्थिति तथा सीमित बौद्धिक &amp;nbsp;क्षमता के अनुसार सापेक्षिक अंश तक ही विभिन्न  रहस्यों का भेदन कर पाता है | इस सापेक्षिक बुद्धिमता&amp;nbsp;के&amp;nbsp;स्तर मे&amp;nbsp;&amp;nbsp;परिवर्तन  की स्थिति मे पूर्ब स्थापित तथ्य निरूपण&amp;nbsp;सामान्यतया असत्य साबित होते जाते  रहते&amp;nbsp;हैं | यही चिंतन के विकास का क्रम एवं प्रक्रिया&amp;nbsp;है, जो अनवरत &amp;nbsp;चलता  रहता&amp;nbsp; है और आगे भी चलता रहेगा |&lt;/span&gt;     &lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;सापेक्षिक बुद्धिमता के एक रतर पर सेव के पृथ्वी पर  गिरने&amp;nbsp;से&amp;nbsp;&amp;nbsp;संबंधित रहस्य को सबसे पहले समझने वाले प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर  आइजक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि पृथ्वी के  भीतर विद्यमान आकर्षण के कारण&amp;nbsp;सेव पृथ्वी की ओर खिचता चला आता है | यह एक  अत्यधिक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज थी , जिसपर अनेकानेक वैज्ञानिक अवधारणाएँ  व सिद्धांत आधारित हुए |&amp;nbsp;प्रकृति के इस रहस्य को तत्कालीन देश काल पात्र  गत सापेक्षिक&amp;nbsp;बुद्धिमता&amp;nbsp;के अनुसार&amp;nbsp;सुलझाने का&amp;nbsp;यह&amp;nbsp;एक अत्यधिक महत्वपूर्ण व  सफल&amp;nbsp;प्रयास&amp;nbsp;था&amp;nbsp;| आज&amp;nbsp;की परिष्कृत बुद्धिमता का स्तर इस&amp;nbsp;सम्बन्ध&amp;nbsp;मे&amp;nbsp;एक&amp;nbsp;  प्रश्न&amp;nbsp;अवश्य&amp;nbsp;उठाएगा&amp;nbsp;&amp;nbsp;कि यह गुरुत्वाकर्षण&amp;nbsp;वास्तव&amp;nbsp;मे  कहाँ&amp;nbsp;से&amp;nbsp;व&amp;nbsp;किस&amp;nbsp;प्रकार&amp;nbsp;उत्पन्न होता&amp;nbsp;है&amp;nbsp;और यह&amp;nbsp;किस प्रकार कार्य&amp;nbsp;करता है |  प्रयोगभौमिक&amp;nbsp;आधार&amp;nbsp;पर&amp;nbsp;इसका&amp;nbsp;समुचि&lt;/span&gt;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;त उत्तर&amp;nbsp;मिल&amp;nbsp;पाना कदाचित&amp;nbsp;संभव&amp;nbsp;न&amp;nbsp;हो&amp;nbsp;,  परन्तु&amp;nbsp;आज का न्यूटनबादी वैज्ञानिक&amp;nbsp;इतना अवश्य&amp;nbsp;&amp;nbsp;स्पष्ट करेगा कि यह एक  पूर्बनिर्धारित सत्य और मान्यता है&amp;nbsp;| कोई&amp;nbsp;यहाँ तक&amp;nbsp;कह&amp;nbsp;सकता&amp;nbsp;है कि&amp;nbsp;यह एक  प्राकृतिक&amp;nbsp;नियम&amp;nbsp;है , जिसे&amp;nbsp;सिद्ध करने की न तो&amp;nbsp;कोई आवश्यकता है और न ही&amp;nbsp;इसे  सिद्ध किया&amp;nbsp;जाना&amp;nbsp;संभव ही है | जबकि&amp;nbsp;प्रयोगभौमिक तत्व&amp;nbsp;निरूपण  ऐसी&amp;nbsp;&amp;nbsp;किसी&amp;nbsp;पूर्ब&amp;nbsp;मान्यता, पूर्वाग्रह&amp;nbsp;,तथा&amp;nbsp;पूर्वधारणा को स्वीकार नहीं&amp;nbsp;करता  |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; उपरोक्त&amp;nbsp;के&amp;nbsp;परिप्रेक्ष्य&amp;nbsp;मे&amp;nbsp; मैं यहाँ शेव के पृथ्वी पर  गिरने&amp;nbsp;से संबंधित&amp;nbsp;रहस्व&amp;nbsp;के सम्बन्ध मे न्यूटन के उपरोक्तानुसार&amp;nbsp;तथ्य निरूपण  के क्रम मे मैं यह अवश्य स्पष्ट&amp;nbsp;करना चाहूँगा कि सार्बभौम नैसर्गिक  नियम&amp;nbsp;और&amp;nbsp;आज&amp;nbsp;की&amp;nbsp;बुद्धिमता&amp;nbsp;का स्तर&amp;nbsp;न्यूटन&amp;nbsp;के गुरुत्वाकर्षण&amp;nbsp;सिद्धांत को  पूर्णतया नकारता&amp;nbsp;&amp;nbsp;और इसे पूर्णतया&amp;nbsp;असत्य सिद्ध करता हुआ&amp;nbsp; प्रतीत&amp;nbsp;होता&amp;nbsp;है |  प्रयोगभौमिकता&amp;nbsp;किसी&amp;nbsp;पूर्व&amp;nbsp;मान्&lt;/span&gt;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;यता&amp;nbsp;एवं&amp;nbsp;पुर्बाग्रह की  अपेक्षा&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp;करता&amp;nbsp;| अतः&amp;nbsp;मैं अपने&amp;nbsp;विश्लेषण&amp;nbsp;मे किसी पूर्वमान्यता अथवा  पूर्वाग्रह&amp;nbsp; का आलंबन&amp;nbsp;नहीं लूँगा&amp;nbsp;| केवल&amp;nbsp;प्रारंभ&amp;nbsp;करने&amp;nbsp;के लिए&amp;nbsp;एक  पूर्वमान्यता की सहायता&amp;nbsp;अवश्य लूंगा जो&amp;nbsp;कालांतर मे स्वतः&amp;nbsp;सिद्ध&amp;nbsp;होकर&amp;nbsp;पूर्ब  मान्यता नहीं रह&amp;nbsp;जावेगी&amp;nbsp;|&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; किसी पदार्थ&amp;nbsp;के सृजन&amp;nbsp;की व्याख्या करने पर यह ज्ञात होता है  कि&amp;nbsp;प्रत्येक&amp;nbsp;पदार्थ किसी मूल&amp;nbsp;पदार्थ से&amp;nbsp;अलग&amp;nbsp;हुआ&amp;nbsp; किन्तु मूल पदार्थ से  सम्बद्ध रहकर उसके अंश&amp;nbsp;रूप&amp;nbsp;मे ही विद्यमान रहता है | सूर्य&amp;nbsp;से  निकली&amp;nbsp;पृथ्वी&amp;nbsp;तथा&amp;nbsp;पृथ्वी से निकला&amp;nbsp;चन्द्रमा&amp;nbsp;आदि इसके उदाहरण हो&amp;nbsp;सकते है |  मूल पदार्थ से अलग हुए इस&amp;nbsp; पदार्थ पर चतुर्दिक&amp;nbsp;पड़ने&amp;nbsp;वाला वायुमंडलीय &amp;nbsp;दबाव  संतुलन की स्थिति&amp;nbsp;मे एक ऐसे&amp;nbsp;स्थान&amp;nbsp;पर केन्द्रीभूत&amp;nbsp; होकर अवस्थित हो जाता  है, जहाँ&amp;nbsp;चतुर्दिक वायुमंडलीय &amp;nbsp;दबाव एक समान&amp;nbsp;अथवा संतुलित&amp;nbsp;हो जाता है |  चतुर्दिक पड़ने वाले &amp;nbsp;वायुमंडलीय&amp;nbsp;&amp;nbsp;दबाव की यही&amp;nbsp;संतुलित&amp;nbsp;स्थिति उक्त&amp;nbsp;पदार्थ  की स्थिति तथा कक्षा निर्धारित कर&amp;nbsp;देती&amp;nbsp;है | परिणामस्वरूप उसी&amp;nbsp;स्थान  व&amp;nbsp;स्थिति मे उक्त पदार्थ अपने मूल&amp;nbsp;पदार्थ (उदगम) के अंश&amp;nbsp;(उपग्रह) के रूप मे  उसकी&amp;nbsp;परिक्रमा करने लगता है |&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; उपरोक्तानुसार परिस्थिति मे उक्त पदार्थ पर&amp;nbsp; चतुर्दिक  पड़ने वाला वायु मंडलीय दबाव उक्त पदार्थ के भीतर&amp;nbsp;एक केंद्र&amp;nbsp;बिंदु पर  शुन्य&amp;nbsp;प्रभावी&amp;nbsp;हो जावेंगा और एक प्राण&amp;nbsp;केंद्र&amp;nbsp;(नयूक्लियस&amp;nbsp;)&amp;nbsp;का श्रृजन करेगा  जो वायु मंडलीय दबाव के बराबर व प्रतिरोधी दबाव देकर उक्त पदार्थ को  सुरक्षा व स्थायित्व प्रदान करेगा | ऐसी स्थिति मे&amp;nbsp;ही उक्त पदार्थ का  संरचनात्मक अस्तित्व&amp;nbsp;व स्थायित्व संभव&amp;nbsp;होता है | अर्थात&amp;nbsp;किसी पदार्थ की  संरचनात्मक स्थिति इसी बात पर निर्भर&amp;nbsp;करेगा&amp;nbsp;&amp;nbsp;कि उक्त पदार्थ पर पड़ने वाला  वायु मंडलीय दबाव और उक्त पदार्थ के प्राणकेंद्र जन्य&amp;nbsp;दबाव मे  पूर्ण&amp;nbsp;साम्य&amp;nbsp;की स्थिति हो |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; उपरोत से यह प्रमाणित होता है कि प्रत्येक पदार्थ  का&amp;nbsp;प्राणकेंद्र कर्षण के बजाय अपकर्षण का कार्य करता है | उसकी प्रकृति  किसी अन्य पदार्थ को अपनी&amp;nbsp;ओर खीचने की न होकर अपने से दूर धकेलने की होती  है |&amp;nbsp;इस प्रकार किसी प्रकार&amp;nbsp;के&amp;nbsp;कर्षण&amp;nbsp;का&amp;nbsp;अस्तित्व&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;तक&amp;nbsp;उक्त&amp;nbsp;पदार्थ मे नहीं होता&amp;nbsp;है&amp;nbsp;, उक्त पदार्थ का प्राणकेंद्र&amp;nbsp;पदार्थ की&amp;nbsp;सतह&amp;nbsp;अथवा&amp;nbsp;उससे&amp;nbsp;दूर&amp;nbsp;वायुमंडल मे अवस्थित&amp;nbsp;बिभिन्न&amp;nbsp;पदार्थों&amp;nbsp;को&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;अपनी&amp;nbsp;अपकर्षण&amp;nbsp;शक्ति&amp;nbsp;द्वारा&amp;nbsp;दूर  धकेलने&amp;nbsp;का ही कार्य&amp;nbsp;करता है | इस&amp;nbsp;प्रकार ब्रह्माण्ड मे पृथ्वी&amp;nbsp;अथवा किसी  स्वतन्त्र&amp;nbsp;पदार्थ मे गुरुत्वाकर्षण&amp;nbsp;या&amp;nbsp;कर्षण का अस्तित्व&amp;nbsp;होने  का&amp;nbsp;प्रश्न&amp;nbsp;ही&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp;उठता&amp;nbsp; |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;     &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अब&amp;nbsp;यहीं&amp;nbsp;हमें&amp;nbsp;वायु मंडलीय&amp;nbsp;दबाव&amp;nbsp;से&amp;nbsp;संबंधित&amp;nbsp;अपनी  पूर्वमान्यता&amp;nbsp;को सिद्ध&amp;nbsp;करने&amp;nbsp;का&amp;nbsp; अवसर&amp;nbsp;&amp;nbsp;मिलता हुआ&amp;nbsp;प्रतीत&amp;nbsp;होता&amp;nbsp;है |  जैसाकि&amp;nbsp;ऊपर&amp;nbsp;&amp;nbsp;स्पष्ट&amp;nbsp;कर&amp;nbsp;चुका&amp;nbsp;हूँ&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;कि प्रत्येक&amp;nbsp;स्वतन्त्र&amp;nbsp;पदार्थ का  प्राण केंद्र अपकर्षण का कार्य करता है और&amp;nbsp;यह&amp;nbsp;अपकर्षण तरंग&amp;nbsp;अपनी तरंग  दैर्घ्य&amp;nbsp;के अनुसार&amp;nbsp;काफी&amp;nbsp;दूर तक प्रभावी होती&amp;nbsp;&amp;nbsp;है | परन्तु&amp;nbsp;प्राण केंद्र से  दूरी के अनुसार इसकी&amp;nbsp;प्रभाव&amp;nbsp;शीलता&amp;nbsp;मे उत्तरोत्तर&amp;nbsp;ह्राश की स्थिति  दृष्टिगोचर होती प्रतीत होती है&amp;nbsp;| श्रृष्टि&amp;nbsp;मे अवस्थित असख्य&amp;nbsp;पदार्थों का  प्राणकेन्द्रीय&amp;nbsp;अपकर्षण असंख्य तरंगो के प्रतिफलन&amp;nbsp;के  फलस्वरूप&amp;nbsp;ऐसी&amp;nbsp;तरंगे&amp;nbsp;उद्भूत करती&amp;nbsp; हैं&amp;nbsp;, जो&amp;nbsp;पारस्परिक&amp;nbsp;दबाव के रूप मे  प्रत्येक पदार्थ को प्रभावित करने लगती है&amp;nbsp;| स्थूलतः इसी को हम वायुमंडलीय  दबाव के रूप समझ&amp;nbsp; सकते&amp;nbsp;हैं | पर&amp;nbsp;इसे ब्रह्मान्दिक अपकर्षण शक्ति के रूप मे  अभिहत&amp;nbsp;करना&amp;nbsp;अधिक&amp;nbsp;यथेष्ट होगा&amp;nbsp;| क्योंकि&amp;nbsp;यह शक्ति वायुमंडल&amp;nbsp;से  परे&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;विद्यमान&amp;nbsp;एवं कार्यरत&amp;nbsp;रहती है | इस प्रकार पृथ्वी&amp;nbsp;से ऊंचाई पर  जाने&amp;nbsp;पर बैरोमीटर&amp;nbsp;के पारे&amp;nbsp;&amp;nbsp;का कम&amp;nbsp;होना वायु मंडलीय दबाव की कमी&amp;nbsp;को  दर्शाने&amp;nbsp;के बजाय&amp;nbsp;पृथ्वी के प्राण केन्द्रीय अपकर्षण  शक्ति&amp;nbsp;&amp;nbsp;का&amp;nbsp;घटना&amp;nbsp;&amp;nbsp;दर्शाता है | इस प्रकार वायुमंडलीय दबाव का सिद्धांत&amp;nbsp;भी  गलत मान्यता&amp;nbsp;पर आधारित हुआ&amp;nbsp;प्रतीत होता&amp;nbsp;हैं | प्रकृति के अन्य रहस्यों तथा  विज्ञानं&amp;nbsp;के अन्य&amp;nbsp;सिद्धांतों&amp;nbsp;की भी उपरोक्तानुसार पुनर्समीक्षा&amp;nbsp;किया&amp;nbsp;&amp;nbsp;जाना  अपेक्षित&amp;nbsp; एवं अपरिहार्य प्रतीत होती है&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-4276094180731725484?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/4276094180731725484/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/12/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/4276094180731725484'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/4276094180731725484'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत पूर्णतया गलत , तो फिर क्या'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-3322554922952237523</id><published>2010-10-23T13:09:00.001+05:30</published><updated>2010-10-23T13:09:59.757+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सम्पादकीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्य'/><title type='text'>खुद अपने को बचाना : एक घातक कदम</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;font color="#000000"&gt;सामान्यतया लोग असफलताओं, दुर्घटनाओं या गलतियों के लिए स्वयं को कभी दोषी नहीं मानते और अपने प्रति पक्षपाती रवैये के कारण अपने को साफ साफ बचा जाते हैं | प्रत्येक दुर्घटना व गलती होने की स्थिति मे दूसरों पर दोष मढ़ने की प्रवृति प्रायः सबमे दिखाई पड़ती है | यह निःसंदेह अत्यधिक&amp;nbsp;&amp;nbsp; घातक और अस्वस्थ स्थिति व प्रक्रिया होती है और इससे किसी का भला होने की बिलकुल सम्भावना नहीं होती | &lt;/font&gt; &lt;p&gt;&lt;font color="#000000"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति का अपने ऊपर ही पूरा- वश होता है और वह अपने बारे मे ही पूरी पूरी जिम्मेदारी ले सकता है | शराब पीकर खतरनाक ढंग से वाहन चलाता हुआ व्यक्ति यदि आप से टकरा जाता है अथवा&amp;nbsp; अचानक आई खराबी के कारण वह अपने वाहन पर नियंत्रण न रख सकने के कारण दर्घटना कर देता है,&amp;nbsp; तो ऐसी स्थिति मे हम सभी सामान्यतया उक्त वाहन चालक को दोषी मान बैठते हैं और अपने को इस सम्बन्ध मे दायित्व बोध से पूरा- पूरा मुक्त साबित करते अथवा&amp;nbsp; समझ लेते हैं | ऐसी सोंच ही दुर्घटनात्मक और अत्यधिक घातक होती है |&lt;/font&gt; &lt;p&gt;&lt;font color="#000000"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; वस्तुतः प्रत्येक दुर्घटना के सन्दर्भ मे हर हाल मे व्यक्ति को दूसरों पर दोषारोपण दोषी समझने के बजाय स्वयं अपने आप को ही दोषी व जिम्मेदार मानना चाहिए कि हमने इस सम्भावना को ध्यान मे रखकर वाहन क्यों नहीं चलाया कि दूसरा वाहन चालक शराब पीकर वाहन चला रहा हो सकता है और&amp;nbsp; उसके वाहन मे अचानक आई तकनीकी खराबी की सम्भावना के दृष्टिगत रखते हुए&amp;nbsp; हमें स्वयं सतर्क रहना चाहिए था | अर्थात दूसरे वाहन चालकों की गलतियों के लिए भी स्वयं को ही जिम्मेदार समझना चाहिए | ऐसी भावना और मनोवृति हमें हमेशा दुर्घटनाओं से बचाती रहेगी | &lt;/font&gt; &lt;p&gt;&lt;font color="#000000"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; ऐसी परिस्थियों मे हमें सोचना चाहिए कि हमारा उद्देश्य वाहन चलते समय दुर्घटना से बचना है और यह तभी संभव है,&amp;nbsp; जब हम प्रत्येक दुर्घटनात्मक परिस्थियों के लिए खुद अपने को ही जिम्मेदार माने और&amp;nbsp; दूसरों पर दोषारोपण करने की प्रवृति छोड़ें | अन्यथा हम दुर्घटनाओं से नहीं बच सकते | अर्थात वाहन चलाते वक्त विचार करना चाहिए कि हमने क्यों नहीं सोंचा कि अन्य वाहन चालक ने शराब पी रखी हो या उसके वाहन मे अचानक ब्रेक फेल होने जैसी तकनीकी खराबी भी आ गयी हो | इन सभी सम्भावनाओं का पूर्वानुमान करके वाहन चलाने की जिम्मेदारी खुद आपकी अपनी ही है , तभी आप दुर्घटनाओं से बच सकेगें | अच्छा चालक वही है जो प्रत्येक आसन्न या घटित दुर्घटना के लिए दूसरे को दोषी ठहराने के बजाय अपने को ही जिम्मेदार समझता है, क्योंकि दूसरों की गलती का खामियाजा तो आपको ही भुगतना होता है&amp;nbsp; | ऐसी सोंच वाला व्यक्ति हमेशा दुर्घटना से बचा रहता है और जीवन मे कभी भी दुर्घटना का शिकार नहीं होता |&lt;/font&gt; &lt;p&gt;&lt;font color="#000000"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; दुर्घटना के अलावा अन्य सभी क्षेत्रों मे भी यह मनोवृति काफी लाभदायक सिद्ध हो सकती है और हम जीवन की अनेकानेक दुर्घटनाओं से बच सकते हैं | ऐसी परिस्थियों मे व्यक्ति दूसरों को उत्तरदायी मानने के बजाय सबसे पहले यदि खुद अपने बारे मे सोंचने लगे कि वह प्रकरण मे कहीं वह स्वयं तो जिम्मेदार नहीं है अथवा वह स्वयं किस अंश तक जिम्मेदार है ? इसके बाद दूसरों की जिम्मेदारी के सम्बन्ध मे विचार करना चाहिए | इस मनोवृति से जीवन की तमाम समस्याएं खेल खेल मे सुलझ जावेंगी और तनाव मुक्त जीवन का लक्ष्य भी प्राप्त करना संभव हो सकेगा |&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-3322554922952237523?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/3322554922952237523/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/10/blog-post_23.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3322554922952237523'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3322554922952237523'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/10/blog-post_23.html' title='खुद अपने को बचाना : एक घातक कदम'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-6538747191426446522</id><published>2010-10-16T09:58:00.001+05:30</published><updated>2010-10-16T10:00:18.877+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीतिक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खेल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रशासन'/><title type='text'>राष्ट्रमंडल खेलों की सफलता तथा इससे मिलती सीख व अनुभव</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;img style="display: inline; float: left" align="left" src="http://t2.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcSucqeYYxWTV6sCwNA3rbdV5v8skuwJ_2NHWnq1C91jZZratYc&amp;amp;t=1&amp;amp;usg=__RObpQkNrMQgXj9f25JaBXDtyx1Q="&gt; राष्ट्रमंडल खेलो की सफलता व गौरवपूर्ण परिसमाप्ति के तुरंत बाद इसका श्रेय लेने की राजनेताओं मे होड़ मची हुई है | राजनेता भले ही अपने मुह मिया मिट्ठू बनकर खुद अपनी पीठ थपथपा लें , देश की जनता किसी राजनेता को इसका श्रेय देने से रही , क्योकि लोगो को बखूबी पता है कि राजनेताओं ने खेलों तथा खेल आयोजनों के सम्बन्ध मे न तो समय से निर्णय लिए और इसकी तैयारियों मे काफी घपलेबाजियां की गयी थी, भ्रष्टाचार का नंगा नाच हुआ और पूरे देश की साख को बट्टा लगाया | इन नेताओं और व्यवस्थाकारों ने खिलाडियों को अभ्यास के लिए आवश्यक साजो समान तक समय से नहीं मुहैया कराया , उदाहरणार्थ निशानेबाजों को अभ्यास के लिए समय से&amp;nbsp; कारतूस तक नहीं उपलब्ध कराये गए थे | ऐसी स्थिति मे राजनेताओं को श्रेय देने का प्रश्न नहीं उठता | आज की जनता बहुत होशियार हो गयी है और देश की जनता को यह भली भांति पता है कि इस सम्बन्ध मे किसी भी प्रकार का श्रेय राजनेताओं , खेल प्रशासन , खिलाडियों , प्रशिक्षकों तथा कोच मे से किसको मिलना चाहिए |&amp;nbsp; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; इस गौरवशाली सफलता मे सबसे पहला श्रेय खिलाडियों को मिलना चाहिए, जिन्होंने जी तोड़ मेहनत करके इतने अधिक पदक जीते | यदि खिलाडियों को समय से प्रचुर सुविधाएँ उपलब्ध करायी जाती, तो स्वर्ण पदकों तथा जीते गए पदकों की कुल संख्या काफी अधिक होती | इस खेल महाकुम्भ के आयोजन का&amp;nbsp; सर्बाधिक लाभ यही रहा है कि देश मे खेल पुनर्जागरण के अभिनव युग का सूत्रपात हो चुका है और अब खेल यात्रा विश्व विजय के बाद ही थमेगी , जिसका प्रमाण एक माह बाद ही आयोजित होने वाले एशियन खेलों से मिलना शुरू हो जावेगा और अगले ओलम्पिक तथा राष्ट्रकुल खेलों मे व्यापक प्रभाव परिलक्षित होगा, ऐसी उम्मीद बनी है | &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; खेल के क्षेत्र का सबसे बड़ा कार्य यही है कि प्रारंभिक स्तर पर खेल प्रतिभाओं की&amp;nbsp; पहचान करने की धरातल स्तर की व्यावहारिक योजना बनायीं जाय और इसका पूरी ईमानदारी से कार्यान्वित किया जाय | राजनीति को कमसे काम इस स्तर पर पूर्णतया अलग थलग रखा जाय , क्योंकि राजनीति और भाई भतीजाबाद वस्तुतः खेल को बिगाड़ते हैं और प्रारंभिक स्तर पर हुई गड़बड़ी को आगे किसी तरह ठीक नहीं किया जा सकता | प्रारंभिक चयन के बाद उनका सर्बश्रेष्ट&amp;nbsp; प्रशिक्षण देकर उनकी क्षमता तथा कौशल का सुधार करना और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाडियों के साथ खेलने का अवसर दिलाना काफी लाभदायक हो सकता है | उपयुक्त स्तरों पर तत्क्रम पर समीक्षा करना भी आवश्यक होगा | राज्यों को इस सम्बन्ध मे सर्बाधिक दिलचस्पी लेने का बहुत अच्छा लाभ मिलेगा , जैसा कि हरयाणा सरकार ने करके अनुकरणीय उदाहरण अन्य राज्यों के समक्ष रखा है , जिसके चलते छोटे से हरयाणा राज्य के खिलाडियों ने हर राज्य से अधिक पदक जीते | इसके अलावा&amp;nbsp; खेल को कैरियर के रूप अपनाने&amp;nbsp; का अवसर उपलब्ध कराने के आशय से तकनीकी संस्थानों की तर्ज पर बड़े पैमाने पर खेल संस्थान खोलने की भी जरुरत होगी | तत्क्रम मे सरकारी नीति निर्धारण की&amp;nbsp; भी आवश्यकता होगी |&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;   &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-6538747191426446522?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/6538747191426446522/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/10/blog-post_16.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/6538747191426446522'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/6538747191426446522'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/10/blog-post_16.html' title='राष्ट्रमंडल खेलों की सफलता तथा इससे मिलती सीख व अनुभव'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-2542488743675016365</id><published>2010-10-08T12:24:00.000+05:30</published><updated>2010-10-08T12:24:04.772+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सम्पादकीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्य'/><title type='text'>समाज एवं सामाजिक प्रगति</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif;"&gt;&amp;nbsp;नैतिकता के प्रथम अभिप्रकाशन से समाज का जन्म होता है और यही समाज यात्रा का प्रारंभ बिंदु होता है | जंगल मे अकेले पूर्णतया स्वेच्छाचारी&amp;nbsp; जीवन व्यतीत कर रहे&amp;nbsp;आदि&amp;nbsp;मानव के मन मे जब पहले पहल&amp;nbsp; समूह हित मे निजी स्वार्थ को त्यागने का विचार उत्पन्न हुआ होगा&amp;nbsp; , वह समाज यात्रा का प्राम्भ विन्दु था और तभी समाज का जन्म भी हुआ था | वसुधैव कुटुम्बकम, जहाँ सारी संकीर्णताओं से रहित होकर&amp;nbsp;मन का कोण ३६० डिग्री का बन जाता है , समाज यात्रा का चरम विन्दु होता है | यह सामाजिक पूर्णता का परिचायक और समाज का अंतिम लक्ष्य बिंदु भी होता है |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;नैतिकता के प्रथम अभिप्रकाशन से प्रारंभ होकर&amp;nbsp;वसुधैव कुटुम्बकम के चरम लक्ष्य की ओर गतिमानता ही सामाजिक प्रगति होती है | इस सार्बभौम लक्ष्य&amp;nbsp;के बिपरीत गत्यात्मकता&amp;nbsp; को हम सामाजिक अवनति या समाज विरोधी भावधारा समझ सकते हैं | सामाजिक प्रगति मार्ग मे तरह तरह के प्रलोभनों और आकर्षणों के साथ अलग अलग खेमा जमाये बैठे हुए अनेक समूह लोगो को अपने खेमे मे लेने हेतु प्रयासरत रहते हैं | उनका कहना होता है कि वही ईश्वर के सबसे खास और प्रिय जन हैं और केवल&amp;nbsp;वे ही&amp;nbsp;ईश्वर के बताये रास्ते पर चलने वाले लोग हैं | उक्त समूह विशेष के कतिपय&amp;nbsp;के विधि निषेध भी होते हैं , जिनका अनुपालन सदस्यों को अवश्यमेव&amp;nbsp;करना पड़ेगा , जिसके एवज मे उन्हें कतिपय संरक्षण व लाभ की गारंटी भी दिया जाता है&amp;nbsp;| इन विशिष्ट समूहों को हम मजहब के&amp;nbsp; नाम से जान सकते हैं | अब प्रश्न&amp;nbsp;उठता है कि कहीं मजहब सामाजिक प्रगति मे बाधक तो नहीं होता&amp;nbsp; हैं ? इसका उत्तर निःसंदेह&amp;nbsp; नकारात्मक है | मजहब व्यक्ति को अनेकानेक अच्छाइयों का बहुमूल्य तोहफा तो देता है , पर इसके साथ ही&amp;nbsp;उनकी सोंच को संकुचित भी&amp;nbsp; कर देता है , जिसके फलस्वरूप उनके मन का कोण ३६० डिग्री कभी नहीं बन पाता | &amp;nbsp;ऐसी दशा मे&amp;nbsp;समाज बसुधैव कुटुम्बकम के&amp;nbsp;अपने चरम लक्ष्य यानि पूर्णता&amp;nbsp; को कभी&amp;nbsp; नहीं प्राप्त कर सकेगा &amp;nbsp;| इस प्रकार मजहब निश्चित रूप से सामाजिक प्रगति का विरोधी है |&lt;/div&gt;&lt;div style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;व्यक्तियों का वह समूह , जो समाज को उसकी पूर्णता व लक्ष्य बिंदु की ओर ले जाने और समाज के प्रारंभ व पूर्णता के अन्तराल को कम करने&amp;nbsp;हेतु सक्रिय व प्रयासरत होते हैं , समाज के नाम से जाने जावेगे |&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-2542488743675016365?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/2542488743675016365/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/10/blog-post_7030.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/2542488743675016365'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/2542488743675016365'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/10/blog-post_7030.html' title='समाज एवं सामाजिक प्रगति'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-3529076712414752119</id><published>2010-10-08T12:22:00.000+05:30</published><updated>2010-10-08T12:22:26.797+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सम्पादकीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रशासन'/><title type='text'>गति और प्रगति</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif;"&gt;हर गति प्रगति नहीं है | गति के बहुत अधिक या सर्वाधिक होने के बावजूद यह आवश्यक&amp;nbsp; नहीं कि यह प्रगति ही हो | &amp;nbsp;किसी गति की दिशा और दशा के आधार पर ही आकलन करके यह कहा जा सकता है कि अमुक गति प्रगति है अथवा नहीं ? लक्ष्य की ओर गतिमानता ही वस्तुतः प्रगति है | गति लक्ष्याभिमुखी अथवा लक्ष्याविमुखी&amp;nbsp; दोनों ही प्रकार की हो सकती है | सामान्य से दस या सौ गुना रफ़्तार वाला वाहन भी , यदि उसका रुख लक्ष्य की विपरीत दिशा मे है , तदनुरूप रफ़्तार मे लक्ष्य से दूर होता जायेगा |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif; text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; विश्व के पश्चिमी देशों की गति तो बहुत है , पर लक्ष्य विहीन अथवा लक्ष्य के बिपरीत रुख होने के कारण उतनी ही तेज रफ़्तार से वे जीवन के वास्तविक लक्ष्यों से दूर होते जा रहे हैं | जीवन का वास्तविक लक्ष्य है प्रफुल्लता , आनंद , नीद , संतोष और मानसिक शांति | जिसे पश्चिमी देशों के लोग खोते जा रहे हैं | प्रफुल्लता और आनंद की विचारधारा&amp;nbsp;से ही वे सर्वथा अनभिग्य हैं और इनसे उनका नाता एकदम टुटा हुआ है , उनके जीवन मे मानसिक शांति तो बिलकुल है ही&amp;nbsp;नहीं &amp;nbsp;और संतोष से उनका पूर्ण अपरिचय ही होता है | नीद की गोलियों के बिना वहां &amp;nbsp;किसी को नीद नहीं आती | उनके पास तो होती है बस मानसिक अशांति और फ्रस्ट्रेशन | ऐसी स्थिति मे पश्चिम की अति तीव्र गति को&amp;nbsp; हम प्रगति कदापि नहीं&amp;nbsp; कह सकते हैं ? तभी तो पश्चिम के लोग भारत के अध्यात्म , योग और भारतीय दर्शन की ओर झुक रहे हैं और भारत को एक बार पुनः विश्व गुरु बनने का वातावरण बन गया है | परन्तु यहाँ एक बड़ा खतरा भी उत्पन्न हो गया है कि बाबा रामदेव सरीखे कतिपय अपवादों को छोड़कर भारत के बहुत सारे योग व अध्यात्म गुरु विदेशियों की इस भावना का भरपूर शोषण व दोहन भी कर रहे हैं और भारत की छवि धूमिल करने कर सकते हैं |&lt;/div&gt;&lt;div style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif; text-align: left;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; इस प्रकार प्रत्येक क्षेत्र मे लक्ष्य का निर्धारण किया जाना अत्यावश्यक है तभी प्रत्येक क्षेत्र यथा शिक्षा , स्वास्थ्य , विकास , राजनीति , विज्ञानं आदि क्षेत्र&amp;nbsp; की गति को प्रगति अथवा अन्यथा समझने की स्थिति बन सकेगी और तदनुसार प्रत्येक क्षेत्र के क्रिया कलापों का सम्यक मूल्याकन करना भी संभव हो सकता है | &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; यह तो एक पक्ष है | केवल पश्चिमी देशों का जीवन दर्शन एवं जीवन शैली ही दोषपूर्ण है और भारत के लोग सही व दूध के धुले हैं | यह एक अर्धसत्य है | भारत के लोग भी उतने ही गलत हैं , जितने कि पश्चिमी देशों के लोग | भारत के लोग पश्चिम का अन्धानुकरण करके उनके जैसा बनते जा रहे हैं | पश्चिम के लोग जिन बातों को बहुत पहले छोड़ चुके हैं , भारत के लोग उन्हें ही अपनाने मे गर्ब महसूस करते हैं | उनकी भाषा , रहन सहन व संस्कृति को अपनाने मे हम बहुत आतुर रहते हैं और अपनी अच्छाइयों , जिन्हें आज&amp;nbsp;विदेशी लोग अपनाना चाह रहे हैं , हम उन्ही अच्छाइयों को भूलते और छोड़ते चले जा रहे हैं&amp;nbsp;| अब हमारी स्थिति भी पाश्चात्य लोगों की तरह होती जा रही है और अब हमें भी नीद के लिए नीद की गोलियों की ज़रूरत पड़ने लगी है और उन्ही की तरह अनिद्रा , मानसिक अशांति तथा फ्रस्ट्रेशन के शिकार होते जा रहे हैं&amp;nbsp;| &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-3529076712414752119?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/3529076712414752119/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/10/blog-post_7246.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3529076712414752119'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3529076712414752119'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/10/blog-post_7246.html' title='गति और प्रगति'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-7903452378573063896</id><published>2010-10-08T12:20:00.000+05:30</published><updated>2010-10-08T12:20:52.173+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सम्पादकीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकास योजनायें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रशासन'/><title type='text'>भारत की सुरक्षा और अस्मिता से जुडी विशिष्ट पहचान संख्या योजना</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif; line-height: normal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;भारत के नागरिको की अस्मिता एवं पहचान की समस्या निरंतर बनी रहती थी , जिसका खामियाजा नागरिको को समय - समय पर भुगतना पड़ता रहा है | संविधान मे प्रदत्त मौलिक अधिकारों के बावजूद इस पहचान के संकट के चलते भारत का नागरिक अपने को पूर्णतया&amp;nbsp;स्वतन्त्र महसूस व साबित&amp;nbsp;करने मे अपने को&amp;nbsp;सक्षम नहीं पाता था | व्यक्ति प्रायः एकाध बार पुलिस के हत्थे अवश्य&amp;nbsp; चढ़ चुका होता है और उसे बेतुके सवालों का सामना करना पड़ चुका होता है अथवा पड़ सकता है | यां सवालात हैं कि&amp;nbsp; तुम कौन हो , कहाँ से आ रहे हो , क्या नाम है , तुम अवश्य कोई चोर हो , तुम्हारे अन्य चोर साथी कहाँ हैं ? ऐसी स्थितियों मे हम अपने को बड़ी असहाय स्थिति मे पाते हैं और पुलिस को पूर्णतया&amp;nbsp;संतुष्ट करने मे समर्थ नहीं महसूस करते | इस पहचान के संकट के कारण हम कभी कभी अपने देश मे ही बेगानापान महसूस करने हेतु बाध्य&amp;nbsp;होते&amp;nbsp; हैं |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;भारत सरकार नागरिकों को पहचान पत्र प्रदान करने की दिशा मे काफी समय से चितित रही है और अंततः वह समय आ ही गया , जब देश&amp;nbsp; के प्रत्येक नागरिक को विशिष्ट पहचान पत्र देने का निर्णय लेकर नागरिकता को सम्मान प्रदान किया जा रहा है | प्रधान मंत्री एवं यु पी ए अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने महाराष्ट्र के नान्दुवर जिले के तेंभली गाँव , जिसकी ९७% जनसँख्या आदिबासी है , मे २९ सितम्बर&amp;nbsp; को विशिष्ट संख्या वाले पहचान पत्र योजना का शुभारम्भ करते हुए&amp;nbsp;उदघाटन कर चुके हैं | सरकार का यह निर्णय स्वागत योग्य है और आजादी के ६३ साल बाद ही सही , इस सबसे जरुरी काम को अंजाम दिया जा रहा है | अब किसी भारतीय को रोककर कोई पुलिस कर्मी कोई ऊल जलूल सवाल नहीं पूछ&amp;nbsp; सकेगा और अब कोई अपने को असहाय स्थिति मे नहीं महसूस करेगा |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;विशिष्ट संख्या वाले पहचानपत्र मिलने के बाद अब किसी को बैंक व अदालतों मे अपनी&amp;nbsp; पहचान के लिए वकीलं तथा गवाहों&amp;nbsp; की जरुरत नहीं होगी | अब प्रत्येक भारतीय संविधान मे प्रदत्त मौलिक अधिकारों का सम्यक एवं पूर्ण उपयोग कर सकेगा तथा सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने से अब कोई बंचित नहीं होगा | यह पूरे विश्व की सबसे अभिनव एवं महत्वाकांक्षी योजना है | अतयव प्रत्येक भारतवासी को चाहिए कि वह इस यूनिक आइ यु डी अर्थात विशिष्ट संख्या वाले पहचान पत्र प्राप्त करने हेतु जागरूक रहकर स्वयं भी प्रयासरत हो जाये | सरकार को भी इस अत्यधिक उपयोगी परियोजना को युद्ध स्तर पर शीघ्रता से पूर्ण कराना चाहिए |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;इस परियोजना मे बायोमीट्रिक डाटा इस्तेमाल किया जावेगा | इस बायोमीट्रिक डाटा मे अँगुलियों के निशान तथा आँख की पुतली का स्कैन किया जायेगा | अपराध नियंत्रण , आतंकबाद तथा देश की सुरक्षा की दिशा मे इससे बहुत मदद मिल सकेगी | इस प्रकार संचार क्रांति तथा आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करते हुए यह विश्व की सबसे बड़ी और अभिनव परियोजना बन गयी है | &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; १२ अंको वाला यह पहचान पत्र पूरे देश एवं पूरी दुनिया में व्यक्ति की पहचान को प्रमाणित करेगा और बिना कुछ बोले बताये इससे जाना जा सकेगा कि अमुक व्यक्ति भारतीय है और भारत के&amp;nbsp;अमुक प्रान्त , अमुक जनपद , अमुक थाना , अमुक गाँव का अमुक नामधारी व्यक्ति है | इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि एक भारतीय विदेश के किसी दूरस्थ स्थान पर यदि वेहोश हो जाता है , तो इस पहचान पत्र से ही यह पता चल जायेगा कि अमुक बेहोश व्यक्ति भारतीय है और भारत के अमुक प्रान्त , अमुक जनपद , अमुक थाने&amp;nbsp; के अमुक गाँव का अमुक नामधारी व्यक्ति है | इससे यह सहज ही समझा जा सकता है कि यह परियोजना&amp;nbsp; व्यक्ति तथा देश के लिए कितना उपयोगी है |r अब कोई विदेशी आतंकवादी द्वारा&amp;nbsp;मुंबई मे ताज होटल जैसी घटना को अंजाम देने की बात दूर है , देश मे घुसकर अपनी पहचान बिलकुल ही&amp;nbsp;नहीं छुपा पावेगा |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-7903452378573063896?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/7903452378573063896/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/10/blog-post_08.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/7903452378573063896'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/7903452378573063896'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/10/blog-post_08.html' title='भारत की सुरक्षा और अस्मिता से जुडी विशिष्ट पहचान संख्या योजना'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-867449338861147895</id><published>2010-10-08T12:19:00.000+05:30</published><updated>2010-10-08T12:19:32.310+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सम्पादकीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्य'/><title type='text'>वृद्ध भ्रान्ति : अंतर्राष्ट्रीय वरिष्ट नागरिक दिवस पर विशेष</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: normal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif; font-size: medium; line-height: normal;"&gt;प्रत्येक वर्ष १ अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वरिष्ट नागरिक दिवस का आयोजन किया जाता है | इस अवसर पर अपने वरिष्ट नागरिको का सम्मान करने एवं उनके सम्बन्ध मे चिंतन करना आवश्यक होता है | मेरी समझ मे&amp;nbsp;एक दिन के सम्मान से अधिक वरिष्ट नागरिकों&amp;nbsp;के बारे मे चिंतन करना अपेक्षाकृत उपयोगी होता प्रतीत होता&amp;nbsp;है | आज का वरिष्ट समाज अत्यधिक कुंठा ग्रस्त है और सामान्यतया इस बात से सर्बाधिक दुखी है कि जीवन का विशद अनुभव होने के बावजूद कोई उनकी राय न तो लेना चाहता है और न ही उनकी राय को महत्व ही देता है | इस प्रकार अपने को समाज मे&amp;nbsp;एक तरह से&amp;nbsp; निष्प्रयोज्य समझे जाने के कारण हमारा वृद्ध समाज सर्बाधिक दुखी रहता है | वृद्ध समाज को इस दुःख और संत्रास से छुटकारा दिलाना आज की&amp;nbsp;सबसे बड़ी जरुरत है | मेरा उद्देश्य इसी दिशा मे प्रयास करना है |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif; line-height: normal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;बृद्ध समाज सामान्यतया&amp;nbsp;एक बीमारी का शिकार है , जिसका इलाज करना आवश्यक है | इस बीमारी का नाम है वृद्ध भांति | प्रत्येक वृद्ध के मन मे यह विचार बैठा हुआ होता है कि उसके बाल धूप मे नहीं सफ़ेद हुए हैं अर्थात अपने सुदीर्घ जीवन मे उन्होंने बहुत सारा अनुभव अर्जित एवं संग्रहीत कर रखा हैं , जो बहुत मूल्यवान एवं उपयोगी है और जिसे वह अपने परिवार तथा समाज को निःशुल्क देना चाहता है | पर वह तब बहुत निराश व दुखी महसूस करता है , जब उसे पता चलता है कि कोई यहाँ तक कि परिवार वाले भी उनके इस अनुभव का कोई लाभ नहीं उठाना चाहता , जबकि अनुभव का यह विशाल आगार घर मे ही संग्रहीत और सहज ही सुलभ होता है &amp;nbsp;| यही प्रत्येक वृद्ध के मन की पीड़ा होती है और इसी पीड़ा से वह आजीवन कुंठाग्रस्त रहता है&amp;nbsp;|&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;इस परिप्रेक्ष्य मे हमें इस प्राकृतिक एवं नैसर्गिक तथ्य का समुचित संज्ञान लेना आवश्यक प्रतीत होता है कि त्रिगुणात्मिका शक्ति की अवधारणा प्रकृति का सबसे बड़ा सिद्धांत है और तदनुसार गुण श्रेष्टता भी स्वतः प्रमाणित &amp;nbsp;है | सत्वगुण श्रेष्टतम , रजोगुण श्रेष्ट्रतर तथा तमोगुण श्रेष्ट होता है | भोजन भी तदनुसार तीन श्रेणियों मे विभक्त किया जा सकता है और भोजन के अनुसार ही गुण विकसित होता है | दूध सात्विक भोजन होता है और दूध का सेवन करने वाला बच्चा सत्वगुण संपन्न यानि श्रेष्टतम होता है | थोड़ा बड़ा होकर वही बच्चा अनाज का राजसिक भोजन करने लगता है और तदनुसार रजोगुण संपन्न&amp;nbsp;यानि क्रियाशील हो जाता है | जवानी तक यही क्रम चलता रहता है , यानि सत्वगुण घटता और रजोगुण बढ़ता जाता है | प्रौढ़ावस्था के बाद तमोगुण यानि निष्क्रियता की स्थितियां प्रारंभ हो जाती है | इस दौरान सत्वगुण तो समाप्तप्राय हो जाता है , रजोगुण उत्तरोतर कम होता जाता है और तमोगुण का वर्चश्व बढ़ता जाता है | बालक , युवा तथा&amp;nbsp;वृद्ध की तदनुसार स्थितियां होती है , जिसे लोग समझ नहीं पाते | &amp;nbsp;इस नैसर्गिक&amp;nbsp;तथ्य से हमें वृद्ध भ्रान्ति को समझने मे सहूलियत होगी | &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;जीवन मे और वरिष्ट नगरको की दृष्टि मे विशेषकर अनुशासन का बहुत महत्व होता है | वरिष्ट के आदेशों व निर्देशों का स्वयमेव कनिष्ट द्वारा पालन करना ही अनुशासन होता है | वरिष्टता क्रम उपरोक्तानुसार नैसर्गिक नियम के अनुसार स्वतः निर्धारित हो चुका है कि बच्चा वरिष्तम , युवा श्रेष्ट्तर तथा वृद्ध श्रेष्ट होते हैं | इस प्रकार निम्न श्रेणी (बृद्ध ) द्वारा उच्च श्रेणी के युवा व बच्चों की भावनाओं व&amp;nbsp;अपेक्षाओं को दृष्टिगत रखते हुए उनके निर्देशों का अनुपालन किया जाना चाहिए , ताकि अनुशासन का वातावरण बन सके और नैसर्गिक नियमो का &amp;nbsp;पालन भी हो सके | अन्यथा अनुशासनहीनता की&amp;nbsp;स्थिति उत्पन्न होगी , जिसका सम्पूर्ण उत्तरदायित्व बृद्ध समाज पर ही होगा | इस प्रकार वृद्धों को युवा तथा बच्चों की भावनाओं तथा अपेक्षाओं को भली भांति समझकर तदनुसार कार्यविधि अपनाना चाहिए | तदनुसार दायित्व बोध से अधिक उन्हें कोई अपेक्षा नहीं करनी चाहिए | तभी अपने को सबसे&amp;nbsp;श्रेष्ट समझने की बृद्ध समाज के त्रुटिपूर्ण चिंतन मे सुधार आ सकेगा और तभी बृद्ध भ्रान्ति समाप्त हो सकेगी | मात्र &amp;nbsp;इससे ही उनकी कुंठा तथा संत्रास का निवारण और अनपेक्षित&amp;nbsp;मनस - विकार भी दूर हो सकेगा | &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;-- &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;इसके साथ साथ अपने अर्जित और संग्रहीत वेशकीमती अनुभवों को कूड़ेदान मे फेकने के बजाय उन्हें उपयोग मे लाने की दिशा मे चिंतन करते हुए क्रियाशील हो जाना चाहिए | बृद्ध समाज अपने आप मे इस दिशा मे अपनी सक्षमता को पहचानना चाहिए और इस नए परिवार को शक्तिसंपन्न करने की दिशा मे सक्रिय हो जाना चाहिए | वृद्ध समाज&amp;nbsp; इसे ही अपने वर्तमान का संकल्प बना लेना चाहिए , तभी यह अति मूल्यवान तबका समाज मे अपना वर्चश्व व उपादेयता&amp;nbsp;पुनः स्थापित कर पायेगा | &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-867449338861147895?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/867449338861147895/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/867449338861147895'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/867449338861147895'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='वृद्ध भ्रान्ति : अंतर्राष्ट्रीय वरिष्ट नागरिक दिवस पर विशेष'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-615001130266030324</id><published>2010-09-30T10:02:00.001+05:30</published><updated>2010-09-30T10:02:55.149+05:30</updated><title type='text'>चिकित्सा का अधिकार बनना चाहिए मौलिक अधिकार</title><content type='html'>&lt;div style="color: black;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; घरेलु कामगरों , मजदूरों तथा ग्रामीणों के संपर्कों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि ९०% जनता का न तो कोई चिकित्सक होता है और न ही उन्हें किसी प्रकार की चिकित्सकीय सुविधा ही मुहैया हो पाती है | यह बेचारे सामान्यतया झोला छाप डाक्टरों तथा नीम हकीमो से अपना इलाज कराने को विवश होते हैं | यही उनके एकमात्र सहारा होते हैं और गंभीर बीमारियों मे यही उनकी जान लेवा भी साबित होते हैं | अधिकांश निजी चिकित्सक शहरों मे ही रहकर इलाज करते हैं और उनकी मरीजों को देखने की फीस भी बहुत अधिक होती है | उनकी फीस देने और उनके परामर्श पर&amp;nbsp;दवा खरीदने की क्षमता इन ९०% लोगों के सामर्थ्य से बाहर होती है | सरकारी अस्पतालों पर लोगो का विश्वास नहीं बन पा रहा है और वे लोगो की अपेक्षाएं पूरी करने मे सफल होते नहीं दिखाई देते हैं |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; अभी कुछ महीनो पहले शिक्षा के अधिकार का अधिनियम बना था और इस समय खाद्य सुरक्षा पर और बड़ी गंभीरता से बहस चल रही है और निकट भविष्य मे&amp;nbsp;खाद्य सुरक्षा पर अधिनियम &amp;nbsp;बन जाने की उम्मीद है | बस्तुतः सबसे ज्यादा जरुरत स्वास्थ्य सुरक्षा की है , क्योकि स्वास्थ्य के लिए व्यक्ति पूर्णतया चिकित्सक पर निर्भर होता है , जबकि उत्पादक होने के कारण&amp;nbsp; खाद्य सुरक्षा के सन्दर्भ मे व्यक्ति काफी हद तक स्वावलंबी होता है | हकीकी यह भी है कि बिमारिओं&amp;nbsp; से मरने वालों की सख्या सबसे अधिक होती है , जबकि भूख से मरने वालों की संख्या नाम मात्र की ही होती है | इस प्रकार खाद्य सुरक्षा से पहले स्वास्थ्य सुरक्षा के सन्दर्भ मे कार्यवाही किये जाने की आवश्यकता है | आम व्यक्ति को सरकार से सबसे बड़ी अपेक्षा स्वास्थ्य सुरक्षा की है , अन्यथा उनके लिए सरकार की कोई खास जरुरात नहीं है | अतयव आम आदमी की सबसे बड़ी जरुरत पर विशेष और सबसे पहले ध्यान देना चाहिए | &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-615001130266030324?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/615001130266030324/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/09/blog-post_30.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/615001130266030324'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/615001130266030324'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/09/blog-post_30.html' title='चिकित्सा का अधिकार बनना चाहिए मौलिक अधिकार'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-8066992510167911096</id><published>2010-09-28T10:24:00.000+05:30</published><updated>2010-09-28T10:24:39.650+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सम्पादकीय'/><title type='text'>रचनाकारों , रचनाधर्मिता तथा हिंदी को नुकसान पहुचाते प्रकाशक</title><content type='html'>&amp;nbsp;&amp;nbsp; आज साहित्यकार विशेषकर कवि हताशा के दौर से गुजर रहा है , क्योंकि उसका लेखन उस तक ही&amp;nbsp;सिमट कर रह जाता है&amp;nbsp;| कोई प्रकाशक कविता संग्रह को प्रकाशित करने को इस कारण&amp;nbsp; तैयार नहीं होता कि कविता का कोई बाज़ार ही&amp;nbsp; नहीं है | उनके कहने मे सत्यता कम बहानेबाजी ज्यादा&amp;nbsp; प्रतीत होती है | क्योकि प्रकाशकों द्वारा सरकारी खरीद के लिए कविता की पुस्तकों का मूल्य बहुत अधिक रख दिया जाता है और अकेले सरकारी खरीद से प्रकाशकों की पुस्तक- प्रकाशन का निहितार्थ पूरा हो जाता है | अतयव प्रकाशकों की रूचि आम पाठक को पुस्तक बेचने मे होनी प्रतीत नहीं होती | इस प्रकार प्रकाशकों के इस कथन से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि कविता का बिलकुल खरीददार नहीं है | वस्तुतः&amp;nbsp; कविता के खरीददार और&amp;nbsp;पाठकों की कमी नहीं है | सत्य यह है कि प्रकाशकों द्वारा व्यावसायिक नज़रिए से पुस्तक का मूल्य अधिक रख देने मात्र के कारण इसे महगा बना देने से कविता की महगी पुस्तकों&amp;nbsp; के खरीदार कम होते जा रहे हैं | इस प्रकार कविता के पाठक कम होने के पीछे कविता की पुस्तकों का महगा होना है और इसके लिए सरकारी खरीद व प्रकाशकों की व्यावसायिक दृष्टि उत्तरदायी है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जयपुर का बोधि प्रकाशन इस दिशा मे अत्यधिक सराहनीय पहल कर रहा है | यह प्रकाशन ८० से १२० पृष्ट की कहानी और कविता की पुस्तक का मूल्य मात्र&amp;nbsp;दस रुपया रखा जाता है | इसी प्रकार अन्य प्रकाशन भी हो सकते हैं | इसके बिपरीत अन्य प्रकाशकों द्वारा&amp;nbsp;इस आकार की पुस्तक का मूल्य सामान्यतया १५० व २०० रुपया रखा जाता है | पुस्तकों के मूल्य मे&amp;nbsp;इतना अधिक अंतर होने की क्या वजह हो सकती है ? बोधि प्रकाशन का यह प्रयास रचनाकारों , साहित्य व हिंदी के लिए बेहद हितकारी तथा पुस्तकों को महगा करके प्रकाशित करने वाला प्रकाशकों&amp;nbsp;का कृत्य रचना , रचनाकार तथा हिंदी को बेहद नुकसान पहुचाने वाला होता है | यदि देश के सभी प्रकाशक छपाई की लागत के अनुसार पुस्तक का मूल्य रखने लगे तो साहित्य की गंगा फिर से बह सकती है | सरकार को भी बोधि प्रकाशन सरीखे सस्ता प्रकाशन करने वालों को प्रोत्साहन देने पर भी विचार करना चाहिए | &amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-size: medium; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif; font-size: 13px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-8066992510167911096?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/8066992510167911096/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/09/blog-post_28.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/8066992510167911096'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/8066992510167911096'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/09/blog-post_28.html' title='रचनाकारों , रचनाधर्मिता तथा हिंदी को नुकसान पहुचाते प्रकाशक'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-623374594594332890</id><published>2010-09-21T09:34:00.000+05:30</published><updated>2010-09-21T09:34:11.623+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सम्पादकीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीतिक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>अयोध्या मे " राम दर्शन " मंदिर का निर्माण</title><content type='html'>&amp;nbsp;&amp;nbsp;इस समय सारा देश सशंकित और स्तंभित है कि २४ सितम्बर को उच्च &amp;nbsp;न्यायालय का क्या फैसला होगा और फैसले के बाद क्या होगा ? यह कुछ दिन बड़े कठिन व &amp;nbsp;संवेदनशील तथा भारत के लिए परीक्षा की घडी के समान है | यह बड़े संतोष की बात है कि संघ परिवार तथा बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी दोनों &amp;nbsp;का &amp;nbsp;अभी तक का रुख सकारात्मक व सुर भी बदले हुए प्रतीत होते हैं | यह भी बड़ा सुखद है कि आम हिन्दू व मुसलमान इस बार भावावेश मे आने वाला नहीं है , इस तथ्य को दोनों वर्गों के नेता समझते हैं कि इस बार अफवाहों का बाज़ार ठंढा रहेगा | पर धर्म व राजनीति की रोटी सेकने वालों तथा अमेरिका मे अँगरेज़ पादरी द्वारा पवित्र कुरान को जलाने की घोषणा के बाद कश्मीर दुनिया भर मे सबसे अधिक &amp;nbsp;प्रतिक्रिया कश्मीर के मुसलमानों मे होने वाली घटना के परिप्रेक्ष्य मे &amp;nbsp;इस विशाल &amp;nbsp;भारत मे कुछ भी होने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;खैर यहाँ मै कुछ और कहने जा रहा हूँ जो प्रासंगिक तो है ही उपयोगी भी है | भगवान राम मर्यादा पुरुषोतम तो थे ही , वे &amp;nbsp;समाज के प्रत्येक क्षेत्र मे आदर्श स्थापित करने वाले एक व्यवस्थाकार भी थे | भगवान राम ने आदर्श पुत्र , आदर्श भाई , आदर्श शिष्य , आदर्श पति , आदर्श शासक , आदर्श मित्र , आदर्श शत्रु के प्रतिमान स्थापित किये थे और व्यावहारिक जीवन मे इन समस्त आदर्शों को चरितार्थ किये थे | ऐसे सैकड़ों प्रसंगों से राम चरित मानस भरा पड़ा है | भगवान राम के जीवन के इन प्रसंगों , जिनसे राम के आदर्श , राम की शिक्षाएं तथा राम के दर्शन की जानकारी लोगों को हो सके , ऐसा प्रयास करने की आवश्यकता है | ताकि अयोध्या , जहाँ कोई युद्ध नहीं होता , मे आने वाले लोगों को राम के दर्शन हो सके और उन्हें राम के दर्शन की वास्तविक जानकारी मिल सके | अयोध्या मे ऐसा राम दर्शन मंदिर निर्मित कराये जाने की अत्यधिक उपयोगिता और &amp;nbsp;आवश्यकता है | यह उपयोगितावाद पर आधारित अवधारणा है और इससे किसी का विरोध हो ही नहीं सकता |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;मै चित्रकूट मे जिलाधिकारी था और संयोगवश नानाजी देशमुख के साथ बैठा था | उसी समय कुछ लोग नाना जी से मिलने आ गए | उन लोगो ने नाना जी से पूछा कि अयोध्या मे राम मंदिर कब बनेगा ? नानाजी ने उनसे पूंछा कि तुम सब चित्रकूट भ्रमण कर चुके हो , तो क्या तुम्हे राम के दर्शन हुए ? मै चाहता हूँ कि चित्रकूट मे आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को राम के दर्शन हों और राम के दर्शन की जानकारी हो सके | अतयव मै ऐसा मंदिर बनवाने जा रहा हूँ , जिसका नाम होगा "राम दर्शन " | राम दर्शन के शिल्पकार थे सुहाश बहुलकर और वास्तुकार थे पुनीत सुहैल | मै तो केवल राम दर्शन के निर्माण का प्रत्यक्षदर्शी मात्र &amp;nbsp;था कि नाना जी कैसे रामायण के महत्वपूर्ण और शिक्षाप्रद &amp;nbsp;प्रसंगों को चयनित करते थे ? उन्होंने अपने कुशल &amp;nbsp;निर्देशन मे विभिन्न पगोडा मंदिरों मे रिलीफ , पेंटिंग और डायोरमा के माध्यम से राम दर्शन को निर्मित कराया था | नाना जी की सोच बहुत व्यापक थी और उसी सोच से प्रभावित होकर मैं इस मत का हूँ कि अयोध्या मे भी विशाल राम दर्शन बनवाये जाने की बहुत बहुत आवश्यकता है , ताकि अयोध्या आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को राम के दर्शन हो सके और उन्हें राम के दर्शन की सम्पूर्ण जानकारी हो सके | यह दक्षिण भारत के मंदिरों की भांति बहुत विशाल और भव्य हो और इसकी व्यवस्था भी तदनुसार हो | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-623374594594332890?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/623374594594332890/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/09/blog-post_2732.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/623374594594332890'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/623374594594332890'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/09/blog-post_2732.html' title='अयोध्या मे &quot; राम दर्शन &quot; मंदिर का निर्माण'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-2629031328996071194</id><published>2010-09-21T09:31:00.000+05:30</published><updated>2010-09-21T09:31:21.518+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पर्यावरण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सामाजिक समस्याएं'/><title type='text'>बाढ़ : दैवी आपदा से अधिक मानव कृत समस्या</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;इधर काफी बड़ा भूभाग तथा क्षेत्र बाढ़ से परेसान चल रहा है | बाढ़ग्रस्त लोगों की तकलीफों की कल्पना केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो ऐसी स्थिति से गुज़र चुका हो | बाढ़ प्रलय की स्थिति का थोड़ा बहुत आभास देता है , क्योकि बाढ़ के दौरान ऐसा लगता है कि अब सब कुछ समाप्त होने ही &amp;nbsp;वाला है , घर -परिवार के लोग तथा जानवरों से नाता छूटने वाला है तथा जीवन लीला बस समाप्त होने वाली है | मुझे भी इस सम्बन्ध मे थोड़ा -बहुत अनुभव इस कारण है कि यस ड़ी यम , ए ड़ी यम , सी ड़ी ओ तथा ड़ी यम के रूप मे मेरी तैनाती गोरखपुर , सिद्दार्थनगर ,कुशीनगर तथा सीतापुर अत्यधिक बाढ़ग्रस्त जनपदों मे रही है और इन सभी जनपदों मे मेरी तैनाती के दौरान भयंकर बाढ़ आई थी और मै बाढ़ राहत व बचाव कार्य से गंभीरता से जुड़ा था | इस प्रकार से बाढ़ की भयावहता , राहत तथा बचाव कार्य का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूँ |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; प्रकृति हमारे ऊपर सदा सर्वदा मेहरबान रही है | यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हम इन मेहरबानियों से अनजान बने हुए रहते &amp;nbsp;हैं | प्रकृति ने पृथ्वी पर इस प्रकार की ढलान रखी है &amp;nbsp;कि कहीं जल भराव की स्थिति न उत्पन्न होने पाये | सर्बे आफ़ इंडिया ने बड़ी मेहनत करके विभिन्न स्थलों की &amp;nbsp;ढलान को दर्शाते हुए कंटूर लाइन मैप बनाया गया है | यदि इस नक़्शे का उपयोग सड़कों , नहरों , भवनों के अलायमेंट के समय किया जाता तो जल निकासी की समस्या से बचा जा सकता था , पर दुर्भाग्य की बात यह है कि किसी के पास सर्वे आफ इंडिया का मैप ही नहीं होता | जिले के अधिशाषी अभियंता लोक &amp;nbsp;निर्माण विभाग के पास ऐसा एकमात्र मैप अवश्य होता है जो उनकी &amp;nbsp;तिजोरी मे सुरक्षित रखा जाता है , ताकि वी आई पी के आगमन &amp;nbsp;के समय हेलीकाप्टर का अक्षांश का पता लगाने के लिए उक्त मैप तिजोरी से बाहर निकाला जाता है और काम के बाद उसे फिर तिजोरी मे रख दिया जाता है | इसके अलावा इस अत्यधिक उपयोगी मैप का कभी भी कोई अन्य उपयोग सड़क &amp;nbsp;, नहर तथा भवन निर्माण हेतु नहीं होता | इसका परिणाम यह होता है कि पूरे देश की ही जल निकासी की व्यवस्था बद से बदतर हो जाती है | यह भी जल भराव तथा बाद की स्थितियां उत्पन्न कर देता है | &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; इस सम्बन्ध मेरा दृढ़ मत रहा है कि बाढ़ दैवी आपदा नहीं है , वरन यह मानवीय कृत्यों का प्रतिफलन है और एक तरह से बाढ़ के लिए मनुष्य ही जिम्मेदार है | पहले भी बाढ़ आती थी , पर शीघ्र ही &amp;nbsp;बाढ़ का पानी उसी रफ़्तार मे उतर जाता था , जिस रफ़्तार मे बाढ़ आती थी | नदियाँ जहाँ एक ओर बाढ़ लाती थी , वही दूसरी ओर नदियाँ ही जल निकासी का श्रोत भी साबित होती थी | पर आज बाढ़ का पानी कई कई दिनों तक ठहरा रहता है और नदियाँ अब जल निकासी का पहले की तरह काम नहीं कर पाती | मानवीय प्रयासों ने इस दृष्टि से भी नदियों को बहुत अक्षम बना दिया है |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; नदियों पर बांध निर्माण करके मनुष्य द्वारा &amp;nbsp;नदी को पालतू बनाने जैसा कार्य किया जाना प्रतीत होता है | बांध निर्माण का मुख्यतः दो उद्देश्य होता है | बांध बना कर वस्तुतः नदी &amp;nbsp;का अधिकांश जल बांध के जलाशय मे रोक लिया जाता है , जिससे नहरे निकाली जाती है &amp;nbsp;और बिजली पैदा की जाती है | जिससे विकास का मार्ग तो अवश्य प्रशस्त होता है , परन्तु इस प्रकार होने वाले &amp;nbsp; विकास की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;बांध निर्माण से होता यह है कि नदी का अधिकांश जल जलाशय मे रोक लिया जाता है और नदी मे नाम मात्र का ही जल आ पाता है | इसके परिणाम स्वरूप नदी मे तेज प्रवाह व बहाव लायक जल तो आ ही नहीं पाता | इससे नदी का पेटा पटने लगता है | परिणाम स्वरूप दस लाख क्यूसेक धारक क्षमता वाली नदी की धारक क्षमता घटते घटते दस साल मे मात्र दो लाख क्यूसेक रह जाती है | वर्षा काल मे बांध को बचाने के लिए मजबूरन २ ० सी ५ ० लाख क्यूसेक पानी नदी मे छोड़ना पड़ता है | नदी की धारक क्षमता घट जाने के कारण नदी का यह पानी दूर दराज़ क्षेत्रों मे फ़ैल जाता है और काफी देर तक पानी रुका रहता है , क्योकि धारक क्षमता घटने के कारण नदी जल निकासी का काम भी नहीं कर पाती | इस प्रकार हम नहर से सिचाई करके तथा बिजली बनाकर जितना लोगों को लाभान्वित कराते हैं , &amp;nbsp;बाढ़ का हर दृष्टि से तकलीफ झेलकर लोग उक्त लाभ की कई &amp;nbsp;कई गुनी कीमत चुकाते हैं | इस प्रकार बांध &amp;nbsp;निर्माण एक घाटे का सौदा सिद्ध होता है |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;प्रकृति सर्बशक्तिमान एवं सर्बभौम सत्ता है और प्रकृति यह नहीं बर्दास्त कर सकती कि &amp;nbsp;मनुष्य प्रकृति को पालतू बनाये | ऐसा होने पर प्रकृति की प्रतिकूल प्रतिक्रिया का होना स्वाभाविक है | आज अनेक अवसरों पर हम महसूस करते हैं कि प्रकृति हमसे नाराज है और हम प्रायः इसे &amp;nbsp;दैवी आपदा अथवा प्रकृति का कोप समझ बैठते हैं | यह दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति है कि हम अपने को इस बात के लिए दोषी नहीं मानते हैं कि अपने कारनामो की वज़ह से कहीं हमने प्रकृति को कुपित तो नहीं कर दिया &amp;nbsp;है ? बाढ़ , सूखा , अवर्षण , ग्लोबल वार्निंग , सुनामी तथा भूकंप आदि के लिए कदाचित मनुष्य ही जिम्मेदार होते हैं | आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य को &amp;nbsp;तात्कालिक लाभ के लिए प्रकृति का अप्राकृतिक और अनियंत्रित दोहन करके प्राकृतिक संतुलन को बिगड़ कर प्रकृति को &amp;nbsp;कुपित करने का काम नहीं करना चाहिए , ताकि उसके गलत कार्यों की वज़ह से पूरी मनुष्यता को प्रकृति का कहर न झेलना पड़े |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; बांध निर्माण के बाद अब नदियों को जोड़ने की योजना पर विचार हो रहा है जो मनुष्यता के लिए आत्म हत्या करने जैसा कार्य है , क्योकि यह प्राकृतिक व्यवस्था मे बहुत बड़ा हस्तक्षेप माना जाना चाहिए | मनुष्यों को प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव होना चाहिए और प्रकृति का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए और ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए , जो प्रकृति के प्रतिकूल हो | &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-2629031328996071194?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/2629031328996071194/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/09/blog-post_21.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/2629031328996071194'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/2629031328996071194'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/09/blog-post_21.html' title='बाढ़ : दैवी आपदा से अधिक मानव कृत समस्या'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-3958362570700025572</id><published>2010-09-14T17:02:00.000+05:30</published><updated>2010-09-14T17:02:51.048+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिक्षा'/><title type='text'>हिंदी दिवस का आयोजन पितरपक्ष की तरह</title><content type='html'>&lt;div&gt;प्रति वर्ष १४ सितम्बर को हिन्ही दिवस तथा पूरे पक्ष हिंदी पखवारे का आयोजन  किया जाता है | १४ सितम्बर को ही संबिधान सभा मे हिंदी को राष्ट्र भाषा के  रूप मे अंगीकार करते हुए इसे १५ वर्ष तक के लिए&amp;nbsp;संपर्क भाषा बनाया गया था |  इसी उपलक्ष मे हिंदी दिवस मनाया जाता है और पूरे पखवारे तक समस्त  कार्यालयों , विशेषकर केन्द्रीय कार्यालयों व सार्बजनिक उपक्रमों&amp;nbsp;मे अनेक  आयोजन होते हैं | ऐसे आयोजन का मुख्य अतिथि सामान्यतया ऐसा व्यक्ति होता है  जो प्रायः हिंदी बोलने व हिंदी मे काम करने से परहेज करता है और अपने  बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों मे पढ़ाता है | ऐसा लगता है कि हिंदी  दिवस व पखवारा एक रश्म अदायगी के तौर पर मनाया जाता है , जिसमे हिंदी के  पक्ष मे भाषणबाजी&amp;nbsp; व बयानबाजी तो खूब होती है किन्तु हिंदी के हित मे कुछ  भी&amp;nbsp;नहीं होता |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; राष्ट्र भाषा किसी देश मुख होता है , जिसे सजा - संवार  कर रखा जाता है | राष्ट्र भाषा प्रेम का एक सजीव उदाहरण हमारे समक्ष है |  तुर्किस्तान &amp;nbsp;के आजाद होने पर वहाँ के शासक कमाल पाशा ने जब लोगो की इस  सम्बन्ध मे राय ली तो सभी ने तुर्की को १० से ५० वर्ष तक राष्ट्र भाषा बनने  की सम्भावना जतायी थी , परन्तु कमाल पाशा ने अपने मत्री भाषा प्रेम तथा  दृढ़ इच्छा शक्ति के चलते घोषित किया कि कि दूसरे दिन सूर्योदय से ही  तुर्की &amp;nbsp;राष्ट्र भाषा घोषित कर दिया था | इतना ही नहीं उन्होंने एक वर्ष तक  सारे कार्यालय व शिक्षण संस्थाएं बंद सारे देश वासियों को लोगों को तुर्की  परगने के काम मे लगा दिया था | भारत मे भी इसी प्रकार की इच्छाशक्ति की  दरकार थी | तभी तो आज़ादी के ६३ साल बाद भी अशिक्षा का बोलबाला आर अंगूठे  का वर्चश्व बरक़रार है | भारत मे&amp;nbsp; न तो किसी को हिंदी से उतना प्यार ही था  और न ही ऐसी कोई इच्छा शक्ति ही दृष्टिगोचर हुई है&amp;nbsp; | यही कारण है कि&amp;nbsp;  हिंदी की स्थिति डांवाडोल बनी हुई है | बिना संज्ञा के कोई प्रतिष्ठा नहीं  प्राप्त कर सकता और देश की मजबूती के लिए भाषाई एकता बहुत जरुरी है , अतयव  देश हित मे पूरे देश को एकजुट होकर भाषाई एकता को प्रदर्शित करना चाहिए और  अपनी अपनी मातृभाषा का पुरजोर प्रयोग एवं विकास करना चाहिए | हिंदी से किसी  भाषा को न तो कोई खतरा है और न ही कोई प्रतिद्वंदिता | तो फिर आखिर हिंदी  का विरोध क्यों ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; हिंदी को सबसे अधिक खतरा २% अंग्रेजी दा लोगों से है  जो हिंदी को उसका असली हक़ दिलाने के कभी पक्षधर नहीं रहें हैं | आज़ादी के  बाद आज भी हिंदी को सबसे ज्यादा खतरा अंग्रेजी और अंग्रेजों से ही है |  अंग्रेज अंग्रेजी के जरिये भारत मे अब तक अपनी वापसी की उम्मीद लगाये बैठे  हैं | अंग्रेजो का कुत्ता प्रेम प्रसिद्ध है और कदाचित इसी कारण उनमे श्वान  वृति आ गयी प्रतीत होती है | कुत्ते की सूंघने का स्वभाव अद्भुत होता है  और उसकी जीवन वृति इसी गुण से संचालित होता है | इसलिए कुत्ता जब भी कभी  बाहर जाता है तो रास्ते की स्थायी बस्तुओं पर पेशाब करता हुआ जाता है ,  ताकि सूंघते सूंघते वह वापस आ सके | अंग्रेज भी इसी स्वभाव व विचार से लोक  सभा , उच्चतम न्यायालय , लोक सेवा आयोग ,नौकरशाही तथा विश्व विद्द्यालयों  मे अंग्रेजी को स्थापित कर गए थे , ताकि कुत्ते के स्वभानुसार उनका  पुनरागमन संभव हो सके | &amp;nbsp;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;देश के गौरव की स्थापना तथा राष्ट्र -प्रेम का तकाजा है कि  राष्ट्र भाषा को उसके वास्तविक स्वरूप मे स्थापित किया जाय और हर एक  भारतवासी इस दिशा मे अपने दायित्व बोध का प्रदर्शन करे | तभी हिंदी दिवस के  आयोजन की सार्थकता होगी |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-3958362570700025572?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/3958362570700025572/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/09/blog-post_14.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3958362570700025572'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3958362570700025572'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/09/blog-post_14.html' title='हिंदी दिवस का आयोजन पितरपक्ष की तरह'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-6104582588540585115</id><published>2010-09-06T17:20:00.003+05:30</published><updated>2010-09-06T17:23:05.234+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिक्षा'/><title type='text'>शिक्षक दिवस पर विशेष : शिक्षक तथा शिक्षाविदों के दायित्व</title><content type='html'>&lt;div style="color: #444444;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;शिक्षक दिवस एक महत्वपूर्ण अवसर होता है , जब पूरा देश शिक्षकों का सम्मान कर रहा होता है | इस दिन कुछ चयनित शिक्षकों को उनके सराहनीय प्रयासों के लिए राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित भी किया जाता है | विभिन्न स्तरों पर अनेकानेक आयोजन होते हैं , जिसमे डा सर्ब्पल्ली राधाकृष्णन ,जिनके जन्मदिन को ही शिक्षक दिवस के रूप मे मनाया जाता है तथा गुरु शिष्य की गौरवशाली परंपरा का स्मरण करते हुए शिक्षकों के योगदान व उनकी समस्यायों पर चर्चा की जाती है और लम्बे चौड़े भाषण देकर शिक्षा दिवस का समापन कर दिया जाता है ,पर शिक्षा के स्वरूप व अपने मूल उद्देश्यों से भटकी मूल्यविहीन शिक्षा की सार्थकता तथा शिक्षा व शिक्षकों के गिरते स्तर पर कोई चिंता नहीं की जाती है | जबकि शिक्षा दिवस के आयोजन की सर्वाधिक प्रासंगिकता इसी बात की ही है | यहाँ हम कुछ इन्हीं विषयों पर चर्चा करेंगे |&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #444444;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;आज हमारी शिक्षा व्यवस्था अशिक्षा की ओर ले जा रही है ,क्योंकि आज का क्षात्र शिक्षा प्राप्त करता हुआ जैसे जैसे उच्च मानसिक अधिमान को प्राप्त करता जाता है ,वह तदनुसार अपनी भौतिक आवश्यकताओं को भी बढाता जाता है ,परन्तु शिक्षा व्यवस्था उसकी मनो - भौतिक जरूरतों को पूरा करती हुई प्रतीत नहीं होती | इस प्रकार शिक्षा प्राप्ति से उसे समस्या प्राप्त होती है , जिसके लिए उसे जीवन के यथार्थ मूल्यों (अनुशासन ,चरित्र ,नैतिकता ,विश्वास पात्रता&amp;nbsp; आदि मूल्य ) की कीमत चुकानी पड़ती है | इस प्रकार शिक्षा से मिलती है समस्या ,वह भी जीवन के यथार्थ मूल्यों को खोकर | यदि ऐसा है तो शिक्षा व्यवस्था मे कहीं न कहीं कोई खामी तो ज़रूर है और शिक्षक भी इसके लिए उत्तरदायी माने जायेंगे | तो क्या आज शिक्षक दिवस के महत्वपूर्ण अवसर पर इतने जीते जागते मुद्दे के बारे मे नहीं बिचार किया जाना चाहिए ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; हमारी शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष यह है कि यह मानकर चलती है कि बच्चे को पढाया जाता है और सारा पाठ्यक्रम तथा शिक्षण पद्दतियां तदनुसार ही होता हैं | जबकि वास्तविकता इससे बिलकुल भिन्न है | वस्तुतः बच्चा पढाया नहीं जाता वरन वह पढता है | वह सबसे पहले अपनी मा को पढ़ता है , इसके बाद अपने पिता -भाई -बहन -परिवारजनों व संपर्क मे आने वालों को पढता है | इसके बाद वह अपने दोस्तों व पड़ोस को पढ़ता है और स्कूल जाने पर अध्यापक व सहपाठियों को पढ़ता है | सबसे बड़े दुर्भाग्य की बात यह है कि सभी इस तथ्य से अनजान रहते हैं कि बच्चा उन्हें या उनसे निरन्तर पढ़ रहा होता है | इस प्रकार वांछनीय व अवांछनीय जो भी उसके समक्ष आता है , बच्चा उसे पढ़ जाता है | इस परिप्रेक्ष्य मे पढ़ाने की आवश्यकता माता - पिता - अध्यापक - पड़ोसियों को है कि बच्चे के अनवरत पढने की प्रवृति के कारण सभी लोग ,जिन्हें बच्चा पढ़ रहा है , बच्चे के समक्ष कोई अवांछनीय बात व व्यवहार न करें , ताकि बच्चा उनसे अवांछनीयता न पढ़ जाय | वस्तुतः पढ़ाने की आवश्यकता बच्चे को बिलकुल ही नहीं है और अच्छा व स्वस्थ परिवेश मिलने पर वह स्वतः पढ़ जावेगा | व्यक्ति अपने बच्चे के बारे मे इस दिशा मे&amp;nbsp; अवश्य सतर्क रहता है और अपने बच्चे के समक्ष कोई अवांछनीय कार्य व्यवहार नहीं आने देता है ,पर वह अन्य सभी बच्चों के बारे मे बिलकुल उदासीन रहता है | यदि अध्यापक की हस्तलिपि ख़राब है तो ब्लेक्बोर्ड पर उसके लिखने पर बच्चे की हस्तलिपि ख़राब होना स्वाभाविक है | यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि शिक्षा जगत की लाखों सालों की यात्रा के बाद भी हम इतना नहीं समझ पाये हैं कि अध्यापक की ख़राब हस्तलिपि का खामियाजा बच्चा क्यों भुगते ? अभी तक हमारी शिक्षा व्यवस्था इतना निषेध नहीं लगा पायी है कि क्षात्र जब तक लिखना पूर्णतया सीख नहीं जाता है , अध्यापक को ब्लेकबोर्ड पर नहीं लिखना चाहिए |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; शिक्षा जगत मे छात्र - अनुशासन हीनता की बहुत सारी बातें होती रहती हैं , जबकि लोग अनुशासन का सही मतलब ही नहीं जानते | आटोमिक फालोइंग कमांड आफ द सुपीरियर बाई द इन्फीरियर इज अनुशासन | यहाँ जोर जबरदस्ती का कोई स्थान नहीं और स्वयमेव प्रक्रिया का स्थान प्रमुख है | अब यह विचार करना है कि कौन श्रेष्ट व कौन&amp;nbsp; निम्न है | वरिष्टता क्रम मे सत्वगुण&amp;nbsp; श्रेष्टतम , रजोगुण श्रेष्टतर व तमोगुण श्रेष्ट होता है | तदनुसार सत्वगुणी दूध का भोजन करने वाला बच्चा सबसे शक्तिशाली व श्रेष्टतम&amp;nbsp; होता है | राजसिक यानि अनाज का भोजन करने के कारण उसमे रजोगुण यानि क्रियाशीलता का प्रादुर्भाव हो जाता है ,पर वह श्रेष्टतम से श्रेष्ट्तर स्थिति मे पहुँच जाता है | जवानी के बाद रजोगुण यानि क्रियाशीलता मे कमी व तमोगुण मे अभिबृद्धि का दौर शुरू होता है और श्रेष्ट स्थिति को दर्शाता है | इस प्रकार अध्यापक को छात्रों की अपेक्षाओं का पूर्ण संज्ञान लेकर उन्हें पूरा करने का प्रयास करना चाहिए | ऐसा न करने पर अध्यापक को ही अनुशासनहीन माना जावेगा | ऐसी अवस्था मे अध्यापको द्वारा कभी कभी छात्रो पर&amp;nbsp;&amp;nbsp; बलप्रयोग भी किया जाता है और कभी कभी छात्र समूह , जो शक्ति का आगार होता है , द्वारा उक्त बल प्रयोग के बिरुद्ध आक्रोश अभिव्यक्त कर बैठता है | जिसे लोग अनुशासनहीनता की संज्ञा दे बैठते हैं | बस्तुतः यह अनुशासन हीनता न होकर अनुशासनहीन लोगों द्वारा किये बलप्रयोग के बिरुद्ध आक्रोश का अभिप्रकाशन मात्र है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; शिक्षको द्वारा आज शिक्षक दिवस पर डा सर्वपल्ली राधाकृष्णन , चाणक्य , डा कलाम , रविन्द्र नाथ टैगोर , विस्वामित्र ; संदीपनी आदि प्रमुख शिक्षकों का आदर्श अपनाने&amp;nbsp; और चन्द्रगुप्त , राम , कृष्ण सरीखे शिष्य तैयार करने की कोशिश करने का संकल्प लेना चाहिए | &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #444444;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="color: #444444;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&lt;a href="http://apnabundelkhand.com/"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम &lt;/a&gt;के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-6104582588540585115?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/6104582588540585115/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/09/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/6104582588540585115'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/6104582588540585115'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='शिक्षक दिवस पर विशेष : शिक्षक तथा शिक्षाविदों के दायित्व'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-578252223355904861</id><published>2010-08-19T12:07:00.002+05:30</published><updated>2010-08-19T12:08:43.266+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय'/><title type='text'>स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का अपमान : जगन्नाथ सिंह</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt; राष्ट्रकुल खेलों के परिप्रेक्ष्य मे नई दिल्ली तथा आसपास के क्षेत्रों को चमकाया जा रहा है, ताकि इस आयोजन के दौरान भ्रमण आने वाले विदेशी भारत के बारे मे अच्छी धारणा लेकर अपने देश वापस जांय | राष्ट्रीय गौरव और आत्म सम्मान के लिए ऐसा करना बहुत आवश्यक और औचित्यपूर्ण है | परन्तु इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि विदेशियों को अपनी गौरवशाली विरासत वाले&amp;nbsp; स्मारकों ही दिखाया जाना और गुलाम भारत के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के कारनामो और उपलब्धियों को दिखाने से परहेज किया जाना चाहिए | यदि आजादी से पहले के&amp;nbsp; ब्रिटिश शासनकाल की गौरव गाथा व उपलब्धियों को दिखाया जाता है तो यह हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का घोर अपमान होगा |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; भारत मे इंडिया गेट एक ऐसा ही स्थल है, जिसे हम प्रत्येक विदेसी को सबसे पहले दिखाते हैं, क्योंकि स्थापत्य कला की दृष्टि से यह अत्यधिक सुन्दर एवं महत्वपूर्ण स्थल है | इंडिया गेट की दीवारों पर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध मे शहीद हुए जवानो के नाम अंकित हैं जो गुलामी के दौरान अंग्रेज शासन की गौरव गाथा के अतिरिक्त कुछ नहीं कहते | इसे सबसे बड़ी गौरव गाथा के रूप मे दर्शाना स्वतन्त्र भारत मे कहाँ तक औचित्यपूर्ण है ? इस समय इंडिया गेट की दीवार पर अंकित नामो को और अधिक चमकाने और उभारने का काम भी चल रहा है जो निःसंदेह उचित नहीं प्रतीत होता है | वस्तुतः इंडिया गेट की दीवारों पर हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नाम प्रदर्शित किया जाना चाहिए था | हमारे स्वतन्त्र भारत के लिए यह बड़े गौरव की क्या बात होती यदि इसपर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद , राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक, राजेंद्र लाहिड़ी, मदन लाल धींगरा, खुदी राम बोस तथा १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, मंगल पाण्डे, नाना फंडनवीश, गॉस खान आदि समस्त स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नाम अंकित होता | यह हमारी अस्मिता, राष्ट्रीयता और देश प्रेम का तकाजा भी है | तब इंडिया गेट पहुँच कर इसे देखकर तथा विदेशियों को इंडिया गेट दिखाकर उन्हें इस सम्बन्ध मे बताने मे प्रत्येक भारतीय को गर्व होता | तभी हम राम प्रसाद बिस्मिल की इस ऐतिहासिक कविता को सही अर्थों मे सम्मानपूर्बक स्थापित कर सकते हैं :&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br clear="all" /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; " शहीदों&amp;nbsp; की मजारों पर&amp;nbsp; लगेंगे&amp;nbsp; हर बरस&amp;nbsp; मेले,&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशाँ होगा "|&amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इंदिरा गाँधी द्वारा इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति की शुरुवात करके अज्ञात शहीदों की स्मृतियों को श्रधान्जली देने का सराहनीय प्रयास किया था , पर बिस्मिल की कविता को सार्थकता प्रदान करने के लिए इंडिया गेट से अच्छी दूसरी कोई जगह नहीं हो सकती है |&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-578252223355904861?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/578252223355904861/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post_1160.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/578252223355904861'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/578252223355904861'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post_1160.html' title='स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का अपमान : जगन्नाथ सिंह'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-1893350975415958487</id><published>2010-08-19T12:05:00.000+05:30</published><updated>2010-08-19T12:05:09.451+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय'/><title type='text'>नेताजी सुभाष के बलिदान का अपमान : जगन्नाथ सिंह</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-size: medium; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif; font-size: 13px;"&gt;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&lt;/span&gt;नागालैंड की राजधानी कोहिमा मे एक अत्यधिक एवं महत्वपूर्ण स्मारक है, पर्यटक जिसे देखने मे काफी रूचि लेते हैं | यह स्मारक बहुत सुन्दर तो है ही, इसके रख रखाव की व्यवस्था बहुत उत्तम कोटि की है | कोहिमा मे यह स्मारक दिल्ली के इंडिया गेट की तरह ही है | यहाँ एक बहुत बड़ी दीवार पर पीतल की बड़ी चादर पर इंडिया गेट की तरह शहीदों का नाम अंकित है, जिसे बराबर चमकाए रखा जाता है | इस स्मारक पर शहीदों के रूप मे उन सैनिकों के नाम अंकित हैं, जिन्होंने नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिंद फ़ौज से हुई अंतिम लडाई मे लोहा लेकर उन्हें हराया था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; यह बड़े दुःख और लज्जा का विषय है कि हमारी ही धरती पर नेताजी को उनके आखिरी युद्ध मे शिकश्त मिली थी और उन्हें पराजित करने वाले कोई और नहीं अपने ही भारतीय सैनिक थे, जिन्होंने अंग्रेज आकाओं के हुक्म पर&amp;nbsp; नेताजी से युद्ध किया था | आज अपने स्वतन्त्र भारत मे ऐसे स्मारक का होना नेताजी सुभाष चन्द्र बोस तथा उनकी आज़ाद हिंद फौज के क्रांतिकारियों के बलिदान का घोर अपमान तो है ही, भारतीयों के दिलों पर राज्य करने वाले नेताजी के बलिदान और योगदान को ही मुह चिढ़ाता हुआ सा प्रतीत होता है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; यह भी जानकारी मे आया है कि इस स्मारक का रखरखाव आज भी ब्रिटेन द्वारा ही होता है और इसके रख रखाव हेतु इंग्लॅण्ड से पौंड मे धन सीधे आता है | इससे यह भी प्रमाणित होता है कि आज़ादी से पूर्व अंग्रेजो द्वारा स्थापित परम्पराएँ आज भी यथावत निभायी जा रही है | ऐसी स्थिति मे इस सम्बन्ध मे संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि क्या हम वास्तविक अर्थों मे पूर्णतया स्वतन्त्र हो गए हैं अथवा नहीं ? कुछ भी हो एक स्वतन्त्र नागरिक के रूप मे हमारी सोंच अभी तक विकसित नहीं हो पाई है |&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय सेना की बिभिन्न इकाईयों मे ऐसे अनेक विजय चिन्ह अनुरक्षित अथवा प्रदर्शित हैं जो ब्रिटिश शासनकाल मे उनके नज़रिए से गौरव के प्रतीक हो सकते थे , पर आज स्वतन्त्र भारत मे उक्त विजय चिन्ह राष्ट्रीय विरासत के रूप मे माने जायेंगे और उन्हें राष्ट्रीय संग्रहालयों मे होना चाहिए | एक उदाहरण से मै इसे स्पष्ट करना चाहूँगा |&amp;nbsp; गोरखा रेजीमेंट की रानीखेत इकाई मे रानी लक्ष्मीबाई की शिकस्त एवं अंग्रेजो के झाँसी विजय के प्रमाणस्वरूप झाँसी का राजदंड अनुरक्षित और प्रदर्शित है | यह रानी&amp;nbsp; लक्ष्मीबाई और समस्त क्रान्तिकारियों का घोर अपमान है |&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; इस दर्द को समझाने के लिए भारत के देश भक्त नागरिकों से पूछना चाहता हूँ कि जलियांवाला बाग मे जनरल डायर के हुक्म से चली गोलियों से मरने वालो के नामो का उल्लेख अब तक क्यों नहीं हुआ है ? यदि वहाँ जनरल डायर की भव्य मूर्ति बनवाकर उस पर फूल माला पहनाया जावे, तो भारत के राष्ट्र भक्तो को कैसा महसूस होगा | ऐसी स्थिति मे कोहिमा जैसे स्मारकों का ब्रिटिश सरकार के धन से रखरखाव हमारे देशवासियों को कैसे स्वीकार हो सकता है | राष्ट्र भक्तों को इस दिशा मे गंभीरता पूर्बक विचार करके सक्रिय होना आवश्यक है |&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-1893350975415958487?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/1893350975415958487/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post_19.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/1893350975415958487'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/1893350975415958487'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post_19.html' title='नेताजी सुभाष के बलिदान का अपमान : जगन्नाथ सिंह'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-4885466055650543348</id><published>2010-08-10T10:34:00.000+05:30</published><updated>2010-08-10T10:34:22.546+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्य'/><title type='text'>शाकाहार बनाम मांसाहार : जगन्नाथ सिंह</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: normal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;सभ्यता के प्रारंभ से  ही यह सवाल उठता आया है कि मनुष्य को शाकाहारी होना चाहिए अथवा मांसाहारी ?  दोनों मे से सही क्या है ? यह प्रारंभिक तथा आदि&amp;nbsp;प्रश्नों मे से एक रहा है  | अलग अलग देश काल पात्रगत सापेक्षिक परिवेश मे इसके अलग अलग उत्तर आते  रहें हैं | वैसे सापेक्ष जगत मे भी सार्बभौम उत्तर होते हैं ,जिनका भिन्न  भिन्न देश काल पात्रगत परिवेश मे मतलब व व्याख्याएँ बदल जाती है |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; "जीव जीवस्य भोजनम " अर्थात जीव ही जीव का भोजन है | यह सृष्टि  ही उपयोगितावाद पर अवस्थित है | सृष्टि मे कुछ भी अनपेक्षित नहीं है | एक  का त्याज्य दूसरे का भोज्य है | प्रत्येक जीव एक दूसरे का भोजन है | मनुष्य  केवल वही खाता है , जिनमे जीवन होता है और निर्जीव वस्तु को नहीं खाया  जाता | जीव भी तीन श्रेणी मे आते हैं |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; पहले श्रेणी मे वे जीव आते हैं , जिनमे केवल भौतिक अभिप्रकाशन  होता है | अनाज इसी श्रेणी मे आता है | दूसरी श्रेणी मे वे जीव आते हैं ,  जिनमे भौतिक और मानसिक अभिप्रकाशन होता है | पशु इसी श्रेणी का जीव होता है  | तीसरी श्रेणी मे वे जीव आते हैं , जिनमे भौतिक और मानसिक के अतिरिक्त  आध्यात्मिक अभिप्रकाशन भी होता है | इस श्रेणी के जीव मे मनुष्य आता है |  इन जीवो का वरिष्टताक्रम भी तदनुसार ही निर्धारित होता है , यानि मनुष्य  श्रेष्ठ, जानवर निम्न तथा अन्न निम्नतर श्रेणी मे आते है | श्रृष्टि मे कोई  जीव निकृष्ट व बेकार मे नहीं होता | इस प्रकार प्रत्येक जीव की कोई न कोई  उपयोगिता अवश्य है |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;अब प्रश्न उठता है कि अमुक श्रेणी का जीव किस श्रेणी के जीव  को खाए और प्रकृति व श्रृष्टि का सिद्धांत इस सम्बन्ध मे क्या कहता है&amp;nbsp;?&amp;nbsp;इस  प्रश्न का सीधा और सरल सा उत्तर है कि अस्तित्व रक्षा के लिए भोजन आवश्यक  होता है और यह शरीर का धर्म भी है | वस्तुतः उच्च श्रेणी का जीव अपने से  निम्नतर श्रेणी के जीव को खा सकता है बशर्ते उससे निम्नतर&amp;nbsp;श्रेणी  का जीव उपलब्ध न हो&amp;nbsp;| इस प्रकार जब तक निम्नतम श्रेणी का जीव यानि अन्न  उपलब्ध रहता है, तब तक किसी मनुष्य को जानवर नहीं खाना चाहिए | किन्तु जहाँ  अन्न पैदा ही नहीं होता या बिलकुल उपलब्ध ही नहीं होता, वहाँ अस्तित्व  रक्षण के लिए मनुष्य&amp;nbsp;पशु को खा सकता है | भोजन की आवश्यकता अस्तित्व रक्षण  के लिए ही है और अपने अस्तित्व रक्षण के लिए यदि अपरिहार्य हो जाय तो  एक&amp;nbsp;मनुष्य दूसरे मनुष्य को भी खा सकता है | युद्धों के दौरान बहुधा ऐसा  देखने मे आ चुका है कि जनरल सिपाही को खा गया और यह पूर्णतया औचित्यपूर्ण  भी ठहराया गया था , क्योंकि ऐसा न करने से जनरल , जिसका जीवन अधिक मूल्यवान  होने के कारण श्रेष्ट्तर है, का जीवित रहना अपेक्षाकृत आवश्यक था |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; इस प्रकार भोजन के सम्बन्ध मे उपरोक्तानुसार सार्वभौम उत्तर व  सिद्धांत मे इतना लचीलापन है&amp;nbsp;कि विभिन्न देश काल पात्रगत सापेक्षिकता से  इसका स्वतः&amp;nbsp;समायोजन हो जाता है | इस प्रकार हमारे अनुत्तरित चले आ रहे इस  आदि प्रश्न का उत्तर मिल जाता है | &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-4885466055650543348?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/4885466055650543348/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post_3476.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/4885466055650543348'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/4885466055650543348'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post_3476.html' title='शाकाहार बनाम मांसाहार : जगन्नाथ सिंह'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-309884944791842214</id><published>2010-08-10T10:32:00.000+05:30</published><updated>2010-08-10T10:32:01.268+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्य'/><title type='text'>हिंसा बनाम अहिंसा : जगन्नाथ सिंह</title><content type='html'>मानव सभ्यता के  आदि प्रश्नों मे से एक प्रश्न यह भी रहा है कि मनुष्य को किसे मारना चाहिए  और किसे नहीं मारना चाहिए | अर्थात जीवन मे हिंसा का क्या स्थान होना चाहिए  ? इस दिशा मे उत्तर खोजने के बहुत सारे प्रयास हुए ,पर सफलता नहीं मिलने  से यह प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है |  &lt;br /&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; इस प्रश्न का उत्तर तलाश करने की प्रक्रिया मे हम सबसे  पहले&amp;nbsp;समस्त जीवों को तीन श्रेणियों मे वर्गीकृत करते हैं | पहली श्रेणी मे  वे सभी जीव आवेंगे जो मनुष्यों के मित्र हैं , जिन्हें हम&amp;nbsp;जातिमित्र कह  सकते हैं | जातिमित्र&amp;nbsp;श्रेणी मे मनुष्य के अलावा वे पशु भी आ जावेंगे जो  मनुष्य के लिए प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उपयोगी हैं | दूसरी श्रेणी के  जीव जातिशत्रु कहलायेगे , क्योकि ये मनुष्य जाति के लिए खतरनाक होते हैं और  जिनसे मनुष्य जाति को कभी व कही भी नुकसान पहुँच सकता है | इसके उदाहरण  सांप ,शेर आदि जानवर तो है ही ,युद्धों मे दुश्मन भी इसी श्रेणी मे आते हैं  | तीसरी श्रेणी के जीवों को हम निरपेक्ष जीव कह साकते हैं | ऐसे जीव  सामान्यतया हमारे मित्र होते हैं , पर उनके कभी कभार हमारे शत्रु &amp;nbsp;बन जाने  की सभावना बराबर बानी रहती है | ऐसे जीव जब तक हमारे लिए उपयोगी बने रहते  हैं और जब तक मनुष्य जाति&amp;nbsp; को उनसे किसी प्रकार की हानि&amp;nbsp; होने की सम्भावना  नहीं रहती , तब तक वे मनुष्य जाति के मित्रवत माने जावेंगे और जिस क्षण वे  मनुष्य जाति को नुकसान पहुँचाने को उद्धत होते हैं तो उन्हें शत्रुवत माना  जावेगा | कुत्ता जब तक पागल होकर लोगों को काटने की स्थिति मे नहीं होता  ,वह जातिमित्र कहलायेगा ,इसके बिपरीत स्थिति मे वही कुत्ता जातिशत्रु माना  जावेगा |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;अब इस प्रश्न का उत्तर स्वतः आ जाता है कि जातिमित्र को कभी और  किसी भी&amp;nbsp; दशा&amp;nbsp; मे नहीं मारा जाना चाहिए | इसके अलावा जातिशत्रु को प्रत्येक  दशा मे मार डालना चाहिए और किसी भी दशा मे उसे जीवित नहीं छोड़ना चाहिए ,  क्योकि उदासीनता या दयावश अपने को बचाते हुए जाति शत्रु को जीवित छोड़ दिए  जाने पर वह जतिशत्रु आपकी जाति के किसी व्यक्ति को हंज पहुँचा सकता है | पर  जातिशत्रु को उसके घर , जहाँ रहकर वह निरपेक्ष जीव की भांति रहकर न तो  हमें नुकसान पहुँचाता है और न ही उससे किसी प्रकार के&amp;nbsp;नुकसान की संभावना  नही होती है | कहने का अर्थ यही है कि जंगल मे जाकर सारे शेरों को नहीं मार  डालना चाहिए और न ही सपेरों की मदद से सारे साँपों को उनकी&amp;nbsp; बिलों से बाहर  निकलवाकर मारना चाहिए | निरपेक्ष जीवों पर सतर्क दृष्टि रखते हुए उनका  भरपूर लाभ लिया जाना चाहिए और उनके शत्रु रूप अख्तियार करते ही उन्हें मार  देना चाहिए |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;यह एक सार्बभौम उत्तर है जो सर्बकालिक ,सर्बदेशिक तथा सर्बपात्रिक है और हिंसा व अहिंसा का वास्तविक मर्म स्पष्ट करता है | &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-309884944791842214?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/309884944791842214/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post_10.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/309884944791842214'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/309884944791842214'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post_10.html' title='हिंसा बनाम अहिंसा : जगन्नाथ सिंह'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-3543319333013604466</id><published>2010-08-06T16:09:00.000+05:30</published><updated>2010-08-06T16:09:39.963+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सामाजिक समस्याएं'/><title type='text'>दहेज़ प्रथा के खात्मे की ओर पहल : जगन्नाथ सिंह</title><content type='html'>दहेज़ प्रथा भारतीय जनमानस का एक बहुत बड़ा अभिशाप है और इसके चलते हर बेटी के माता&amp;nbsp;पिता  परेशान एवं चिंताग्रस्त रहते हैं |सभी इसे सामाजिक कुरीति यहाँ तक कि इसे  समाज का कोढ़ मानते हैं ,पर कोई इसके खिलाफ जेहाद छेड़ने का संकल्प लेने की  हिम्मत कोई&amp;nbsp;नहीं करता | भारत का प्रत्येक व्यक्ति इस परिप्रेक्ष्य मे  दोहरा चरित्र जीता है | लड़की का बाप होने&amp;nbsp;की हैसियत से वह दहेज़ प्रथा का  घोर विरोधी होता है ,किन्तु लड़के के पिता के रूप मे वही व्यक्ति दहेज़  लेने से बिलकुल भी&amp;nbsp;परहेज नहीं करता ,वरन दहेज़ लेने के सम्बन्ध मे वही पहल  करता हुआ नज़र आता है&amp;nbsp;| इस दहेज़ का वास्तविक अभिशाप महिलाओं को ही सबसे  अधिक झेलना पड़ता है और इसका सीधा प्रभाव स्त्रियों पर ही होता है ,पर इस  कुप्रथा के मूल मे स्त्रियाँ ही होती हैं | यदि गहराई से मंथन किया जाय ,  तो इस कुप्रथा के लिए सर्वाधिक यहाँ तक कि ८० % स्त्रियाँ ही जिम्मेदार हैं  | इसी प्रकार महिला उत्पीडन के क्षेत्र मे भी पुरुषों के बजाय&amp;nbsp;महिलाएं ही  सर्वाधिक जिम्मेदार होती हैं | अतयव महिला वर्ग को ही सबसे पहले निर्णय  लेना पड़ेगा कि उन्हें किसी महिला के उत्पीडन का कारण व माध्यम नहीं बनना  है और स्वयं सहित किसी भी महिला के उत्पीडन को किसी दशा मे बर्दास्त नहीं  करना है | केवल&amp;nbsp;&lt;span style="font-size: 13.8889px;"&gt;यही एक कदम दहेज़  प्रथा पर अंकुश लगाने हेतु पर्याप्त है | यदि ऐसा संभव हुआ तो इस कुप्रथा  पर लगाम कसने के लिए कुछ और करने की जरुरत ही नहीं होगी |&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;  &lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;वैसे गहराई से बिचार करने से स्पष्ट होता है कि दहेज़ का मूल  कारण आर्थिक है | इस वैश्य (captalist) युग मे भारतीय समाज भी पूर्णतया&amp;nbsp;  व्यावसायिक बन गया है | यहाँ लड़के को एसेट और लड़की को लाइबिलिटी समझा  जाता है | कमाने के कारण लड़के को कमाऊ पूत अर्थात एसेट और लड़की को गृहणी  होने के फलस्वरूप तथा पति के ऊपर आर्थिक रूप पर&amp;nbsp;पूर्णतया निर्भर रहने के  कारण बोझ स्वरूप यानि लाइबिलिटी माना जाता है | यदि लड़कियां पढ़ लिखकर  आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन जाती हैं तो वे स्वतः एसेट बन जाएँगी और तब  दहेज़ की सम्भावना नहीं होगी | इस दृष्टि से स्त्री शिक्षा और आर्थिक  आत्मनिर्भरता से दहेज़ की बुराई&amp;nbsp;को समूल नष्ट किया जा सकता है | ऐसा देखा  भी जाता है कि लड़की जब पढ़ कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाती है तो  उसकी शादी बिना दहेज़ के संपन्न हो जाती है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 13.8889px;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; दहेज़ की इस कुरीति के  विरुद्ध वातावरण बनाये जाने के उद्देश्य से इसे एक जनांदोलन के रूप मे&amp;nbsp;  चलाये जाने की बहुत&amp;nbsp;बड़ी आवश्यकता है | युवा शक्ति को एकजुट होकर दहेज़ के  विरुद्ध &amp;nbsp;जेहाद छेड़ने का काम अपने हाथ मे लेना चाहिए | युवा पीढ़ी के ऊपर  लगने वाले कई आरोपों के दाग को वे इस महान काम&amp;nbsp;से मिटा सकते हैं | दहेज़  मागने , दहेज़ लेने , दहेज़ देने , दहेज़ के कारण उत्पीडन तथा दहेज़ हत्या  आदि कार्यों पर युवा व युवती वर्ग समूह बनाकर काम करेगे और दहेज़ की  कुप्रथा का खात्मा करके ही दम लेंगे |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; सामाजिक संगठन व संस्थाएं तथा स्वयं सेवी संस्थाएं अपने द्वारा  किये जाने वाले कार्यों के अलावा इस पुनीत कार्य मे भी&amp;nbsp;अपना योगदान दे |  विभिन्न जाति समाजो द्वारा सामूहिक विवाह आयोजनों तथा दहेज़ लेने व देने  वालों के विरुद्ध जाति व समाजगत प्रतिबंधों द्वारा दहेज़ प्रथा पर प्रभावी  ढंग से नियंत्रण पाया जा सकता है | &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; मीडिया के इस काम मे लग जाने से तो सारा काम बड़ी आसानी से हो  जावेगा | तमाम कानूनों के होते हुए सरकारी निष्क्रियता के कारण ही  इस&amp;nbsp;&amp;nbsp;कुरीति ने&amp;nbsp;इतना&amp;nbsp; विकराल रूप धारण कर लिया है | अतः मीडिया , युवा -  युवतियों तथा स्वमसेवी संस्थाओं द्वारा सरकारों को भी इस दिसा मे&amp;nbsp;जाग्रत ;  क्रियाशील तथा मजबूर करना पड़ेगा | तभी लक्ष्यानुसार वांछित परिणाम प्राप्त  हो सकेगा |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-3543319333013604466?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/3543319333013604466/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post_06.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3543319333013604466'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3543319333013604466'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post_06.html' title='दहेज़ प्रथा के खात्मे की ओर पहल : जगन्नाथ सिंह'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-214861563098367735</id><published>2010-08-02T11:27:00.000+05:30</published><updated>2010-08-02T11:27:33.516+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सम्पादकीय'/><title type='text'>झाँसी का राजदंड : जगन्नाथ सिंह</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: small;"&gt;हाल मे ही&amp;nbsp;मेरे एक मित्र ने मुझसे सवाल किया कि आप झाँसी के जिलाधिकारी रह चुके हैं तो आपको पता होगा कि झाँसी का राजदंड कहाँ है ? मेरे द्वारा अनभिज्ञता व्यक्त किये जाने पर उनके द्वारा बताया गया कि झाँसी का राजदंड गोरखा रेजिमेंट की रानीखेत यूनिट मे एक वार मेमोरिअल (विजय चिन्ह&amp;nbsp;)के रूप मे&amp;nbsp;रक्खा है जो यह प्रमाणित करता है कि इस यूनिट ने झाँसी राज्य&amp;nbsp;पर फतह हासिल किया था और झाँसी पर कब्ज़ा किया था | वार मेमोरियल सेना की&amp;nbsp;सबंधित यूनिट के लिए अत्यधिक गर्ब की वस्तु हुआ करती है और उक्त यूनिट के जवान इससे उत्साहित होते हैं , अतयव इसे प्रदर्शन की वस्तु भी माना जाता है | मेरे मित्र को रानीखेत भ्रमण के अवसर पर उन्हें झाँसी का राज दंड इसी रूप मे &amp;nbsp;दिखाया गया था , जिससे वह काफी दुखी हुए थे | &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;आजाद भारत &amp;nbsp;मे अब तथ्यों तथा वस्तुओं के मायने बदल गए हैं | झाँसी राज्य पर विजय प्राप्त करना और राज&amp;nbsp;दंड को कब्जे मे लेकर उसे वार मेमोरियल के रूप मे प्रदर्शित करना तथा इस कारनामे पर सेना की अमुक रेजिमेंट तथा यूनिट को गर्ब करना आज स्वतन्त्र भारत मे अराष्ट्रीय और राष्ट्रद्रोह के समान है | एक अन्य उदाहरण लेते हैं | जलियावाला बाग़ मे गोली चलाने का हुक्म जनरल डायर ने दिया था ,पर गोली चलाने वाले हाथ भारतीय थे | ऐसी बर्बरतापूर्ण कार्यवाही पर भारतीय सेना की संबंधित&amp;nbsp;इकाई को गर्ब करना और वहाँ हासिल हुई&amp;nbsp;वस्तुओं को विजय चिन्ह के रूप मे प्रदर्शित करना कहाँ तक उचित है ? &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; झाँसी के राज दंड की तरह सेना के पास&amp;nbsp;बहुत सारे प्रतीक तथा बस्तुएं हो सकते हैं , जिन्हें आज&amp;nbsp;विजय चिन्ह के रूप मे प्रदर्शित किया जाता है ,जबकि वे आज स्वतन्त्र भारत मे विजय चिन्ह के बजाय&amp;nbsp; कायरता ,बर्बरता ,अत्याचार और राष्ट्रद्रोह के प्रतीक ही माने जावेगे | अतयव सेना तथा संस्कृति विभाग को चाहिए कि वे ऐसे मामलों की गहन छानबीन करके उन्हें तलाशें और ऐसे राष्ट्रीय प्रतीकों को उनके उचित स्थानों पर रखवाने की व्यवस्था करे और संग्रहालयों मे उन्हें ससम्मान&amp;nbsp; प्रदर्शित किया जावे | अतयव&amp;nbsp;यह उचित प्रतीत होता है कि झाँसी के राज दंड को झाँसी &amp;nbsp;संग्रहालय मे शीघ्रातिशीघ्र&amp;nbsp;रखवा दिया जाय | &amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-214861563098367735?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/214861563098367735/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post_02.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/214861563098367735'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/214861563098367735'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post_02.html' title='झाँसी का राजदंड : जगन्नाथ सिंह'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-497329057803035468</id><published>2010-08-02T11:25:00.000+05:30</published><updated>2010-08-02T11:25:52.457+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भक्ति एवं आद्यात्म'/><title type='text'>चित्रकूट का महातम्य</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: small;"&gt;चित्रकूट धर्मावलम्बियों तथा सैलानियों दोनों के लिए सर्वथा उपयुक्त पर्यटन स्थल है | भगवान राम द्वारा चौदह मे से साढ़े ग्यारह वर्ष का बनवास&amp;nbsp;यहीं बिताने के कारण चित्रकूट का महातम्य&amp;nbsp; स्थापित हुआ था | भगवान राम के समक्ष कहीं भी जाकर अपना बनवास&amp;nbsp; बिताने का विकल्प होने के बावजूद उन्होंने चित्रकूट को ही चुना था और चित्रकूट ही आये थे | इस प्रकार चित्रकूट का अपना कोई आकर्षण अवश्य रहा होगा , जिसके कारण भगवान राम चित्रकूट ही आये और अन्यत्र नहीं गए | चित्रकूट नाम मे ही यहाँ की विशेष विशिष्टता निहित है | चित्र से आशय यहाँ की मनोहारी व मनमोहक सुन्दरता से है | यहाँ की चित्रात्मकता हरियाली व मनोरम दृश्यों से रही है | कूट का अर्थ है पर्वत | यहाँ के पर्वत काफी सुगम हैं और उन पर आसानी से चढ़ा जा सकता है | आज का धन लोलुप मानव चित्र और कूट दोनों को नष्ट -भ्रष्ट करने पर अमादा है | &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;राम चरित मानस भारत तथा भारतवासियों की धमनी और भगवान राम आत्मा स्वरूप है | मानस के रचयिता तुलसीदास व कालिदास की कर्मस्थली तथा भगवान राम की क्रियास्थली होने के कारण चित्रकूट की महानता को स्वीकार करना ही पड़ेगा | पूरे चित्रकूट&amp;nbsp;क्षेत्र मे&amp;nbsp;भगवान राम की चरण रज बिखरी हुई है , ऐसा आम जनमानस का विश्वास है | कदाचित&amp;nbsp;इसी कारण चित्रकूट भ्रमण पर आने वाला अधिकांश श्रद्धालु चित्रकूट क्षेत्र मे प्रवेश करते ही अपने जूते उतार कर अपने झोले मे रख लेता है | शायद उसकी सोंच यही होती है कि उनके आराध्य भगवान राम जब यहाँ नंगे पांव चले थे तो वे यहाँ जूता पहनने का पाप कैसे कर सकते हैं ? &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;br clear="all" /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;देश निकाला होने पर रहीम भी चित्रकूट आये थे &amp;nbsp;| यहाँ वह गुमनामी का जीवन बिताते हुए जीवन यापन हेतु भाड़ झोकने का काम करते थे | एक बार राजा रीवाँ को&amp;nbsp;चित्रकूट भ्रमण करते समय रहीम भाड़&amp;nbsp;झोकते नज़र आये | रहीम की&amp;nbsp;मर्यादा का ध्यान लिहाज करते हुए कवि रूप मे वह रहीम से&amp;nbsp;बोले " जा के अस भार है सो कत झोंकत भाड़ " इस पर रहीम मुस्कराए और कविता मे ही उत्तर दिया " भार झोंक कर भाड़ मे रहिमन उतरे पार "| रहीम की यह उक्ति भी जन जन मे व्याप्त है :&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; ' चित्रकूट मे रमि रहे रहिमन अवध नरेश , जापर बिपदा पडत है सोई आवत यहि देश |'&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रहीम और तुलसीदास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण&amp;nbsp;प्रसंग और भी&amp;nbsp;है | चित्रकूट मे एक हाथी पागल हो गया था और उसे मारने का आदेश हो गया था | उस समय रहीम और तुलसीदास दोनों चित्रकूट मे ही थे और वे दोनों हाथी मारने सम्बन्धी फरमान से दोनों बहुत दुखी थे | उसी समय राजा का वहाँ आगमन हुआ | तभी इन पंक्तियों को सुनकर राजा द्वारा हाथी को मारने का फरमान वापस ले लिया गया था |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; " धूरि उछारत सिर धरत केहि कारन गजराज ,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; जा रज से मुनि तिय तरी सोई ढुंढत गजराज |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; चित्रकूट मे रहकर भगवान राम ने त्याग ,तपस्या ,बलिदान ,दुष्टदलन ,जनसेवा तथा समाजसेवा का दृष्टान्त रक्खा था जो मनुष्यता के लिए अनुकरणीय है | भगवान राम ने साधन विहीनता की स्थिति मे सबसे रामराज्य स्थापित किया था और दुष्टदलन करके यहाँ के निवासियों को निर्भय किया था | भगवान राम समाज सेवियों के प्रथम पूर्बज भी थे | हिन्दुओं की चित्रकूट मे अपार श्रद्धा है | चित्रकूट मे प्रतिदिन हजारों तथा अमावस्या के मे लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं और परिक्रमा व दर्शन कर&amp;nbsp;लाभ उठाते हैं | दीपावली की अमावस्या को यहाँ सबसे बड़ा मेला लगता है और कई दिन चलता है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-497329057803035468?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/497329057803035468/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/497329057803035468'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/497329057803035468'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='चित्रकूट का महातम्य'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-3940268390167693416</id><published>2010-07-26T10:57:00.000+05:30</published><updated>2010-07-26T10:57:46.390+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भक्ति एवं आद्यात्म'/><title type='text'>मोक्ष की अवधारणा ; प्रास्थिति और प्रक्रिया</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;मोक्ष मानव जीवन  यात्रा&amp;nbsp;की अंतिम मंजिल और अध्यात्मिक क्षेत्र की चरम स्थिति है | इसे अलग  अलग स्थानों पर अलग अलग नामो से समझा और पुकारा गया है| इसे निर्वाण ,  कैवल्य , ब्रह्मलीन ,परम गति ,मुक्ति और मोक्ष नामो से जाना जाता है | पर  मोक्ष को समझना और समझाना दोनों ही&amp;nbsp; बहुत ही&amp;nbsp;दुष्कर कार्य है | ब्रह्माण्ड  मे सब कुछ तरंगवत है और ब्रह्म तरंग सबसे बड़ी तरंग है | प्रत्येक तरंग की  तीन स्थितियां होती है | एक सामान्य तरंग की निम्नतम एवं प्रथम स्थिति है  ठहराव | ठहराव की यह स्थिति क्रिया विहीनता का कालखंड होता है और इसी  क्रिया विहीनता या ठहराव की स्थिति मे शक्ति संचयन होता है | क्रिया  विहीनता की अवधि तथा इसकी सघनता यह निर्धारित करती है कि कितना शक्ति संचयन  होता है | इस ठहराव के बाद तरंग का ऊर्ध्वगामी होना दूसरी स्थिति है |  प्रथम चरण यानि ठहराव की स्थिति मे हुआ शक्ति संचयन यह तय करेगा कि&amp;nbsp;यह&amp;nbsp;ऊर्ध्वगामी  क्रम कितनी दूरी और देर तक रहेगा | जहाँ यह संचित शक्ति समाप्त हो जाएगी  ,वही से तीसरा&amp;nbsp;अवरोही क्रम प्रारंभ होकर ठहराव की स्थिति तक चलेगा |  तत्पश्चात तरंग का दूसरा क्रम पहले की तरह चलेगा और अनवरत तीसरी चौथी  पांचवी .....तरंगो का क्रम चलता रहेगा |&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; एक उदाहरण से इसे  भलीभांति&amp;nbsp;समझा जा सकता है | इस देश मे इमरजेंसी के बाद जनता दल&amp;nbsp;सरकार  द्वारा सत्ता से बाहर किये जाने के बाद इंदिरा गाँधी के लिए यह कालखंड  ठहराव यानि क्रिया विहीनता का समय था | सौभाग्य से क्रिया विहीनता या शक्ति  संचयन का यह&amp;nbsp;कालखंड थोड़ा बड़ा हो गया था | इस दौरान हुए शक्ति संचयन के  फलस्वरूप इंदिरा गाँधी और तेजी से उभरी और इस दौरान ही&amp;nbsp;उन्होंने कई बड़े  काम किये |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; ब्रह्म तरंग की स्थिति सामान्य तरंग से थोड़ी भिन्न है ,किन्तु  ठहराव , अवरोह तथा आरोह की तीनो स्थितियां वहाँ भी विद्यमान रहती हैं |  अंतर बस इतना ही है कि ब्रह्म तरंग मे&amp;nbsp; ठहराव की स्थिति के बाद अवरोह यानि  परम सूक्ष्म (परम पुरुष ) से परम स्थूल (पृथ्वी तत्व ) तक&amp;nbsp;का क्रम चलता है  ,जबकि अन्य समस्त तरंगो मे ठहराव के बाद आरोह&amp;nbsp;का क्रम पहले आता है | आरोह  क्रम मे परम स्थूल (पृथ्वी) से परम सूक्ष्म (मोक्ष )तक&amp;nbsp;का क्रम चलता है |  इसे ही श्रृष्टि चक्र एवं ब्रह्मस्पंदन कह सकते हैं |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;मोक्ष को समझने के लिए विज्ञानं के नियमो का सहारा लेना पड़ेगा  जो प्रकृति का भी नियम&amp;nbsp;है | विज्ञानं का नियम है कि हर क्रिया की समान व  बिरोधी प्रतिक्रिया होती है | जीवन मे क्षण प्रतिक्षण क्रियाओं का क्रम  चलता रहता है | बिना क्रिया किये एक सेकण्ड भी&amp;nbsp;हमारा अस्तित्व नहीं रह सकता  | &amp;nbsp;जहा क्रिया संपन्न होती है , वहा प्रतिक्रिया का होना अवश्यमभाबी है |  हम रोजमर्रा के जीवन मे देखते हैं कि कतिपय और सामान्यतया अधिकांश क्रियाओं  के समक्ष समान और बिरोधी प्रतिक्रियाएं तत्काल&amp;nbsp;अभिव्यक्त न&amp;nbsp;होकर भविष्य के  लिए स्थानांतरित हो जाती हैं | यह स्थगित प्रतिक्रियाएं अवचेतन स्तर  पर&amp;nbsp;बीज रूप में विद्यमान&amp;nbsp;रहती हैं और अपने स्वभावानुसार&amp;nbsp;धीरे धीरे परिपक्व  होती रहती हैं | पूर्णतया परिपक्व होने पर यह तत्समय घटित होने वाली किसी  समानांतर क्रिया की प्रतिक्रिया को समान व विरोधी प्रतिक्रिया नहीं रहने  देता ,वरन अभिव्यक्त होकर&amp;nbsp;उक्त प्रतिक्रिया के साथ सायुज्य स्थापित कर लेता  है और&amp;nbsp;इसमें घनात्मक अथवा ऋणात्मक प्रतिफलन ला देता है | अर्थात थोड़ा  कर्म करके बहुत अधिक प्रतिक्रिया और बहुत अधिक क्रिया करके बहुत कम  प्रतिक्रिया होने की स्थितियां बहुधा देखने को मिलती रहती हैं | प्रत्येक  व्यक्ति स्वयं अपने व अपनों के सदर्भ मे ऐसा होते देख चुका होता&amp;nbsp; है ,  क्योंकि ऐसा अक्सर होता रहता है और ऐसा पहले स्तगित प्रतिक्रिया के परिपक्व  होने के बाद अभिव्यक्त होने के कारण होता है | स्थगित प्रतिक्रियाओं का कई  जन्मो का संचित एक बहुत बड़ा स्टाक जमा रहता है और इस प्रतिक्रिया कोष को  अभिव्यक्त करने के लिए अनेको जन्म लेने की आवश्यकता होगी | जीवित रहने तक  प्रतिपल क्रिया संपन्न होते रहने के कारण प्रतिक्रिया का&amp;nbsp;यह संचित स्टाक  निरन्तर बढ़ता रहता है | जब तक यह पूरा स्टाक समाप्त नहीं होता ,हम  सापेक्षिकता की स्थिति मे ही&amp;nbsp;बने रहेगे और मुक्त&amp;nbsp;नहीं हो सकेगे |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;मोक्ष की दिशा मे दो समस्याओं का सामना करना&amp;nbsp;होता है | पहली  समस्या यह है कि जीवित रहने तक तथा जीवित रहने के लिए हमें कर्म करना ही  पड़ेगा और कर्मफल भी भोगना पड़ेगा जो बंधनकारी होता है | अतयव कर्म की एक  ऐसी तकनीक अपनानी होगी , जिसमे कर्म तो हो पर यह बंधनकारी न हो और हमें  कर्मफल न भोगना पड़े | भगवान कृष्ण ने इसी समस्या के निराकरण के लिए ही  गीता मे &amp;nbsp;कर्मयोग का उपदेश दिया था | ब्राह्मी भाव से कर्म करने यानि  निष्काम कर्म करने से कर्मफल के सम्बन्ध मे चिंता करने की आवश्यकता नहीं  होनी चाहिए , क्योकि निष्काम कर्म की स्थिति मे कर्मफल ब्रह्म को ही स्वतः  समर्पित हो जावेगा | दूसरे रूप मे&amp;nbsp;इसे ही ब्रह्मचर्य भी कहा जा सकता है |  ब्रह्मचर्य का तात्पर्य है&amp;nbsp;ब्रह्म को चरना | चरने का मतलब होता है खाते  खाते चलते रहना अर्थात ब्राह्मी भाव से कर्म करना&amp;nbsp;| इस ब्रह्मचर्य की  प्रक्रिया मे प्रत्येक कार्य मे ब्राह्मी भाव आरोपित करके &amp;nbsp;कार्य करना  चाहिए | अर्थात कर्म समय यह भाव होना चाहिए कि ब्रह्म ही कर्ता हैं ,अतयव  कर्मफल भी ब्रह्म के लिए ही&amp;nbsp;होगा |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;इसे दूसरी तरह से भी समझा जा सकता है | अभिव्यक्ति प्रतीकीकरण  (symbalisation) के अलावा कुछ भी नहीं है | यह प्रतीकीकरण तीन स्तरों पर  संपन्न होता है | प्रथम स्तर पर भौतिक प्रतीकीकरण है | समस्त घटित होने  वाले&amp;nbsp; कर्म अथवा क्रियाएं इसी स्तर की मानी जावेगी | दूसरा स्तर मानस  प्रतीकीकरण का है , जहाँ प्रतिक्रिया&amp;nbsp; या संस्कार जगत अवस्थित होता है | इस  स्तर पर जन्म जन्मान्तरों की स्थगित प्रतिक्रियाएं अर्थात संस्कार संचित  रहता है | तीसरा स्तर अध्यात्मिक प्रतीकीकरण है जो निरपेक्ष होने के कारण  दुबारा अभिव्यक्ति नहीं पाता है | भौतिक प्रतीकीकरण का मानस प्रतीकीकरण  होना अनिवार्यता है | कालांतर मे मानस प्रतीकीकरण का पुनः भौतिक  प्रतीकी&amp;nbsp;करण होना भी अपरिहार्यता है | गीता के उपदेश&amp;nbsp;निष्काम कर्म अर्थात  ब्रह्मचर्य के पालन द्वारा हम भौतिक प्रतीतीकरण को बिना&amp;nbsp;मानस  प्रतीकीकरण किये सीधे अध्यात्मिक प्रतीकीकरण मे स्थानांतरित कर दिया जाता  है | सापेक्षिकता से परे इस अध्यात्मिक प्रतीकीकरण के पुनः अभिव्यक्त होने  की सम्भावना नहीं होगी |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;मोक्ष की दिशा मे दूसरी समस्या है , अनगिनत जन्मो की संचित  प्रतिक्रियाओं अर्थात संस्कारों&amp;nbsp;के विपुल भंडार को समाप्त करना | यह सबसे  कठिन काम है और इसमें कोई शार्टकट नहीं है&amp;nbsp;| तीन तरह की&amp;nbsp; प्रक्रियाओं को  अपनाकर यह अति दुष्कर कार्य संपन्न किया जा सकता है | सबसे पहले मनो  आध्यत्मिक समानान्तरण प्रक्रिया अर्थात आध्यात्मिक साधना&amp;nbsp;द्वारा मानस  प्रतीकीकरण को आध्यात्मिक प्रतीकीकरण मे स्थान्तरण करने से उनका पुनः&amp;nbsp;भौतिक  प्रतीकीकरण संभव नहीं होगा | इसी साधनात्मक&amp;nbsp; प्रक्रिया के&amp;nbsp;द्वारा ही&amp;nbsp;मानस  प्रतीकीकरण के भौतिक प्रतीकीकरण की प्रक्रिया को त्वरण देने से यह&amp;nbsp;कार्य  शीघ्रता से संपन्न होगा | तीसरा कदम विपस्सना को अपनाना होगा | इन तीनो  कदमो का यह प्रतिफल होगा कि एक दिन स्थगित&amp;nbsp;प्रतिक्रिया व संस्कार का  सम्पूर्ण संचित कोष समाप्त हो चुका होगा | निष्काम कर्म योग से नई  प्रतिक्रिया के सृजन व स्थगित होने की सम्भावना पर पहले ही सफलता प्राप्त  की जा चुकी है | अतयव अब ऐसी स्थिति आ चुकी है ,जहाँ कुछ भोगने को शेष नहीं  बचता और व्यक्ति&amp;nbsp;सापेक्षिकता से ऊपर पहुँच चुका होता है&amp;nbsp;| यही कैवल्य ,  निर्वाण , मुक्ति ,मोक्ष तथा ब्रह्मलीन होने की स्थिति है , जो व्यक्ति की  परम गति तथा अंतिम मंजिल&amp;nbsp;है |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br clear="all" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-3940268390167693416?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/3940268390167693416/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_26.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3940268390167693416'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3940268390167693416'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_26.html' title='मोक्ष की अवधारणा ; प्रास्थिति और प्रक्रिया'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-5897265166023562260</id><published>2010-07-22T17:25:00.000+05:30</published><updated>2010-07-22T17:25:40.366+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय'/><title type='text'>राजनीति और धन की वापसी ; समस्या का स्थायी समाधान</title><content type='html'>&lt;div&gt;व्यक्ति  ,समाज तथा देश की अधिकांश समस्याएं राजनीति और धन के अत्यधिक प्रभाव व  वर्चस्व के कारण है | साधन के रूप मे&amp;nbsp;इन दोनों की जरुरत अवस्य है , पर आज  धन व राजनीति का वर्चस्व अत्यधिक बढ़ गया है और दोनों साधन से&amp;nbsp;साध्य बनकर  प्रत्येक क्षेत्र मे बुराइयाँ व समस्याएं ही&amp;nbsp; उत्पन्न कर रहें हैं | इससे  आम आदमी तथा किसान सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है और किंकर्तव्यमूढ़ बना हुआ  है | वह आज महगाई से सर्बाधिक प्रभावित &amp;nbsp;तथा त्रस्त है और इस किसान व आम  आदमी को महगाई से राहत दिलाना मेरा विशेष प्रयोजन है | वस्तुतः महगाई को  बढ़ाने मे यही धन व राजनीति ही मुख्यतया जिम्मेदार है | अतयव महगाई और  अधिकांश समस्याओं का समाधान पाने के लिए धन व राजनीति के प्रभाव को&amp;nbsp;कम करने  तथा इनकी साध्य से साधन के स्तर तक वापसी अत्यावश्यक है |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;बढ़ते मुद्रा प्रसार ,नकली नोटों का बड़े पैमाने पर प्रचलन ,  काले धन की सामानांतर अर्थ व्यवस्था ,गलत आर्थिक नीतियाँ ,गैर  ज़िम्मेदाराना राजनीतिक बयानबाजियां तथा शासको के अहम् व सनक भरी योजनाओं  का कार्यान्वयन महगाई बढ़ाने वाले प्रमुख&amp;nbsp;कारक सिद्ध हो रहे हैं | महगाई का  कोई खास असर अमीरों पर नहीं होने के कारण वे तत्क्रम मे उदासीन रहते हैं |  महगाई से सबसे ज्यादा&amp;nbsp;परेशान आम आदमी और किसान असंगठित होने के कारण महगाई  के बिरुद्ध एकजुट होकर अपना विरोध दर्ज नहीं करा पाते | विपक्ष  द्वारा&amp;nbsp;महगाई को सरकार के विरुद्ध प्रयोग किया जाने वाला केवल एक हथियार ही  समझा जाता है | जिसके कारण महगाई निरन्तर&amp;nbsp;बढती जा रही है और इस पर  नियंत्रण किये जाने के विषय मे कोई कारगर एवं परिणामदायक&amp;nbsp;उपाय नहीं हो रहे  है | इसी कारण महगाई सर्बाधिक चिंता का विषय बनी हुई है |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; आम आदमी और किसान हमारी प्राथमिकता का केंद्र बिंदु होने के  कारण सर्बप्रथम हम ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेते हैं | अभी तक सरकारे अमीन  के माध्यम से लगान नगद वसूलती हैं और छोटे किसानो को लगान से छुट दी जाती  है | ग्रामीण क्षेत्रों मे सीलिंग भी लागू है और किसानो&amp;nbsp;को एक&amp;nbsp; निश्चित  सीमा से अधिक भूमि रखने पर पाबन्दी है ,पर खेत के सदुपयोग न&amp;nbsp;करने पर कोई  प्रतिबन्ध नहीं है | सीलिंग का यह तरीका सही नहीं है | सीलिंग मे अधिकतम  भूमि रखने की सीमा रखने के बजाय प्रति मानक बीघा न्यूनतम उत्पादन करने का  प्रतिबन्ध लगाया जाना अधिक उचित है | इसका परिणाम यह होगा कि न्यूनतम  उत्पादन का लक्ष्य प्राप्त करने हेतु कृषि उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने का  एक स्वाभाविक&amp;nbsp;वातावरण बनेगा और सकल कृषि उत्पादन मे बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी  होने की सम्भावना होगी | इससे सीलिंग को एक कारगर एवं तर्कसंगत आधार मिल  सकेगा ,क्योकि जो न्यूनतम उत्पादन नहीं करेगा ,उसकी कृषि भूमि सरकार द्वारा  अपने कब्जे मे लेकर भूमिहीनों तथा खेतिहर मजदूरो मे बाँट दी जावेगी और  खेतो पर वास्तविक किसानो का ही कब्ज़ा होगा&amp;nbsp;| जब प्रति मानक बीघा न्यूनतम  उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित हो जावेगा तो लगान व गल्ला वसूली भी उक्त आधार  पर आसानी से हो सकेगी जो सामान्यतया न्यूनतम उत्पादन १० प्रतिशत होगा बिना  किसी भेदभाव के सभी किसानो से वसूल किया जावेगा | इस प्रकार लगान तथा  गल्ला वसूली स्वतः हो जाएगी | इस वसूल किये गए गल्ले से लगान सहित अन्य  सरकारी देयों का समायोजन&amp;nbsp;करने के बाद जो धन देय होगा उसे नकद न देकर खाद  बीज आदि निवेश प्राप्त करने हेतु कूपन दे दिया जावेगा | इसके बाद का अवशेष  नकद भुगतान कर दिया जावेगा | मानक बीघा का न्यूनतम उपज निर्धारण ,बोये गए  फसल का व्योरा तैयार करने सहित लगान व गल्ला वसूली तथा गल्ले का भण्डारण  आदि कार्य सरकारी कर्मचारियों के बजाय गाँव के ही एक ठेकेदार द्वारा किये  जायेगे | इसके लिए इसे १ या २ प्रतिशत कमीशन भी दिया जावेगा | यह गाँव का  सबसे महत्वपूर्ण व इमानदार व्यक्ति होगा | अतयव इसी व्यक्ति को ग्राम स्तर  का राजनीतिक अधिकार भी&amp;nbsp;सौंप दिया जावेगा | ऐसी स्थिति मे प्रधान का अलग से  चुनाव कराने की आवश्यकता नहीं होगी और ग्राम स्तर पर राजनीति की स्वतः  वापसी संभव हो जाएगी | यही सभी प्रधान मिलकर&amp;nbsp; क्रमशः न्याय पंचायत , ब्लाक  ,जिला,राज्य तथा देश का प्रतिनिधि भी&amp;nbsp;चुनेगे और सरकार बनाने का महत्वपूर्ण  दायित्व निभायेगे&amp;nbsp;| इससे चुनाव बिहीन राजनीतिक तथा धन विहीन आर्थिक  व्यवस्था लागू हो सकेगी | तभी प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जे के मेहता के  आवश्यकता विहीनता की ओर ले जाने सम्बन्धी आर्थिक सिद्दांत पर अमल हो सकेगा|  इससे मानव सच्चे अर्थों मे खुशहाली के रास्ते पर चल पड़ेगा और वास्तविक  प्रजातंत्र तथा रामराज्य का सुख भोगेगा | &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-5897265166023562260?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/5897265166023562260/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_22.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/5897265166023562260'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/5897265166023562260'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_22.html' title='राजनीति और धन की वापसी ; समस्या का स्थायी समाधान'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-7669923411090577262</id><published>2010-07-21T16:59:00.000+05:30</published><updated>2010-07-21T16:59:47.303+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीतिक'/><title type='text'>सम्यक राजनीति एवं अर्थ बोध</title><content type='html'>आजकल धन और राजनीति का वर्चस्व  बहुत अधिक बढ़ गया है | धन के बढे हुए वर्चस्व के कारण आज यह युग वैश्य युग  बन गया प्रतीत होता है ,क्योंकि आज धन ही मूल्यांकन की कसौटी बन गयी है और  धनवान की ही समाज मे सर्बाधिक प्रतिष्ठा है | परिवार मे भी कमाऊ पुत्र का  ही वर्चस्व रहता है | यहाँ तक मा का स्नेह भी निस्वार्थ न रहकर पैसे की  तराजू मे ही&amp;nbsp;तुलता है अर्थात मा भी उसी बच्चे को सर्बाधिक प्यार करती है जो  सबसे ज्यादा पैसा कमाकर लाता है&amp;nbsp;| कहने का तात्पर्य यही है कि यह अर्थ युग  बन गया है और इसी कारण लोगो मे धन कमाने की होड़ सी लगी हुई प्रतीत होती  है | आज धन मानवीय मूल्यों ,मानवीय संबंधों तथा सामजिक स्तरीकरण का स्थापित  आधार बन गयाहै | इसके कारण व्यक्तिगत ,सामाजिक और नैतिक मूल्यों मे बहुत  अधिक गिरावट देखने को मिल रही है | प्रत्येक क्षेत्र मे मे इसके बिस्तार  एवं प्रभाव के कारण पूरी की पूरी व्यवस्था ही संक्रमित एवं दूषित हो गयी है  |&lt;span style="font-size: 13.8889px;"&gt;राजनीति का भी प्रभाव व प्रभुत्व धन  की ही तरह सर्ब&amp;nbsp;व्याप्त है | प्रत्येक क्षेत्र मे राजनीति ने अपनी पैठ  बनाकर अपना वर्चस्व कायम कर रखा है | इससे कोई क्षेत्र अछूता नहीं रह गया  है | यहाँ तक पति पत्नी के शयन कक्ष तक इसकी पहुँच संभव&amp;nbsp;हो चुकी है |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;      &lt;span style="font-size: 13.8889px;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; उपरोक्त से यह स्वतः&amp;nbsp;स्पष्ट है  कि धन और राजनीति बर्तमान समय की सबसे बड़ी बुराईयां हैं और&amp;nbsp;इन दोनों  बुराईयों पर नियंत्रण पाना बहुत आवश्यक है | यह भी एक नंगा सच है कि  व्यक्तिगत व सामाजिक क्षेत्र मे धन और राजनीति की साधन के रूप मे जरुरत  होती है | जब तक यह दोनों साधन के रूप मे हैं हैं ,तब तक यह दोनों उपयोगी  हैं | परन्तु धन व राजनीति जब साधन के बजाय साध्य बन जाती हैं ,तो  ये&amp;nbsp;व्यक्ति व समाज के लिए हितकर नहीं रह जाती हैं | अतयव आज इन पर नियंत्रण  करना इस दृष्टि से&amp;nbsp;आवश्यक है कि यह दोनों साधन के रूप मे इनकी उपयोगिता  बनी रहें और यह&amp;nbsp;साध्य न बनने पायें |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 13.8889px;"&gt;&lt;/span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;व्यष्टि और  समष्टिगत क्षेत्र से धन व राजनीति की वापसी लोकहित मे बहुत जरुरी है | पर  यह अत्यधिक कठिन और चुनौतीपूर्ण&amp;nbsp;काम है ,क्योंकि इन दोनों की जड़े बहुत  गहरी हैं और सम्पूर्ण व्यवस्था को ही जकड रखा है |अतयव इन दोनों के विरुद्ध  कार्यवाही होने पर व्यवस्था ही इनके साथ खड़ी हो जाएगी&amp;nbsp;| अतयव इस प्रयोजन  से एक नई व्यवस्था का प्रावधान करना होगा | &lt;br /&gt;&lt;div&gt;वैसे इस समस्या का वास्तविक समाधान है | राजनीति और धर्म की वापसी तथा  साधन के रूप मे उनकी प्रतिष्ठा करना&amp;nbsp;| यह एक अत्यधिक दुरूह कार्य है ,  क्योकि जब बुराइयों की जड़े काफी गहराई तक चली जाती हैं तो उन्हें जड़ समेत  उखाड़ना बहुत कठिन हो जाता है |&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-7669923411090577262?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/7669923411090577262/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_1296.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/7669923411090577262'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/7669923411090577262'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_1296.html' title='सम्यक राजनीति एवं अर्थ बोध'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-8674625101435518228</id><published>2010-07-21T16:54:00.000+05:30</published><updated>2010-07-21T16:54:45.433+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>बिवाह की प्रास्थिति तथा बैवाहिक सामंजस्य</title><content type='html'>&lt;div&gt;प्रेम संसार की  अमूल्य निधि है जो ईस्वरीय विधान के अनुसार एक ईश्वर का सबसे अनुपम उपहार  है | कहते हैं की स्त्री पुरुष के जोड़े स्वर्ग मे बनते हैं और बिवाह  द्वारा वे एक दूसरे से मिलते हैं | बिवाह की संस्था प्रेमी युगल को साधिकार  प्रेम की अनुज्ञा प्रदान करता है और परिवार की संस्था मे पूर्ण व वास्तविक  प्रवेश दिलाता है | मनुष्य का अस्तित्व स्पंदनयुक्त अर्थात तरंगवत है  ,दूसरे शब्दों मे मनुष्य वस्तुतः मनो भौतिक आत्मिक तरंगो व स्पंदन का एक  स्वरूप मात्र होता है | एक स्त्री व पुरुष के मनो भौतिक आत्मिक तरंगो के  समानान्तरीकरण अर्थात पूर्णरूपेण विलय कराने वाली प्रक्रिया को बिवाह&amp;nbsp; कहते  हैं | विश्व के समस्त देशों एवं समाजों मे बिवाह&amp;nbsp; की अवधारणा  तथा&amp;nbsp;प्रक्रिया अलग अलग है | प्रत्येक देश व समाज मे बिवाह एक संस्कार एवं  उत्सव के रूप मे मनाया जाता है और यह सभी लोगो को अपनी खुशियों&amp;nbsp;को  अभिव्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी होता है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;पहले माता पिता तथा परिवार लड़की के लिए लड़का ढूंढते &amp;nbsp;और फिर  बिवाह संपन्न कराते थे | तब लड़की लड़के को शादी से पहले मिलकर एक दूसरे को  समझने बूझने तथा पसंद नापसंद करने का कोई अवसर नहीं होता था | आज भी भारत  मे अधिकांश शादियाँ इसी प्रकार तय और संपन्न होती हैं | पढ़े लिखे व  प्रगतिशील समाज मे प्रेम विवाह अधिक होते हैं और ऐसे अधिकांश बिवाहों मे  परिवार भी सामिल होता है | मुस्लिम &amp;nbsp;समाज मे बिवाह एक समझौता व अनुबंध होता  है और बिवाह&amp;nbsp; के वक्त लड़के व लड़की की रजामंदी अवश्य पूंछी जाती है |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; सही मायनो मे देखा जाय तो भारत सहित विश्व के प्रत्येक देश मे  बिवाह की संस्था को सही तथा&amp;nbsp;मजबूत बनाने का कोई प्रयास किया गया नहीं  प्रतीत होता | तभी वैवाहिक सामंजस्य की कमी प्रायः दिखाई पड़ती है | होना  यह चाहिए कि शादी के बाद लड़का व&amp;nbsp;लड़की दोनों का अस्तित्व विलीन होकर  एकाकार&amp;nbsp; हो जावे | इस प्रकार बिवाह का वास्तविक मतलब एक दूसरे मे विलय हो  जाना ही है | यही सर्वथा वांछनीय भी है | तभी पूर्ण वैवाहिक व पारिवारिक  सामंजस्य की स्थितियां बन सकेगी | जबकि वास्तविकता यह है कि विलय होने की  स्थिति बन ही नहीं पाती और पति व पत्नी अपने अपने अहम् को सेते रहते हैं |  जिससे बैवाहिक सामंजस्य का परिवेश बन ही नहीं पाता | इतना ही नहीं आज  राजनीति का&amp;nbsp;प्रदूषण इतना अधिक&amp;nbsp;बढ़ गया है कि पति पत्नी के शयन कक्षों तक  राजनीति ने अपना&amp;nbsp;स्थान बना लिया है और दाम्पत्य जीवन मे कूटनीतिक हथियार का  प्रयोग बहुत बढ़ गया है | यह काफी&amp;nbsp;खतरनाक स्थिति को उजागर करता है और इसका  समाधान ढूँढना आज की बहुत बड़ी&amp;nbsp;आवश्यकता है क्योंकि आजकल वैवाहिक असंतुलन  एवं पारिवारिक बिघटन की स्थितियां&amp;nbsp;चहु ओर दृष्टिगोचर हो रहीं हैं | यह  परिवार ,समाज व देश सभी के लिए घातक है | परिवार व समाज मे अपवाद स्वरूप  घटित घटनाओं को ही प्रमुखता देकर बनाये जा रहे टेलीविजन सीरियल भी वैवाहिक  सम्बन्ध ,परिवार व समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम कर रहे हैं |  सरकार द्वारा जनहित मे ऐसे टी बी सीरियल के प्रदर्शन पर प्रतिबन्ध लगाने का  काम किया जाना चाहिए |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;यह प्रश्न दिमाग मे उठाना स्वाभाविक है कि क्या बैवाहिक  सामंजस्य स्थापित करने तथा पारिवारिक व सामाजिक &amp;nbsp;बिघटन को रोकने की दिशा मे  कुछ किया जा सकता है अथवा नहीं ? सौभाग्य बश&amp;nbsp;इसका उत्तर सकारात्मक है | इस  दिशा मे सर्बप्रथम बिवाह की संस्था को सही व उपयुक्त स्थिति मे स्थापित  करनी पड़ेगी | जब बिवाह&amp;nbsp; दो मन दो शरीर व दो आत्मा के सायुज्य की स्थिति है  तो विवाह की शैली भी तदनुसार होनी चाहिए | बिवाह से पहले लड़का लड़की  द्वारा एक दूसरे को खूब समझ लेना चाहिए और शादी के बाद अपने अहम् को  दरकिनार करके एक दूसरे का&amp;nbsp;भरपूर ध्यान रखना चाहिए | इसे प्रोलांग कोर्टशिप  मैरेज कह सकते हैं | इसमें लड़का लड़की साल छः महीना एक दूसरे से मिलते हुए  एक दूसरे की भावना व बिचार को समझने बूझने का प्रयास करेगे और एक दूसरे की  माता पिता से भी मिलते रहेंगे | इस दौरान एक दूसरे से जुड़ने के सम्बन्ध  मे लड़का लड़की तथा उनके माता पिता&amp;nbsp;सुविचारित व उचित&amp;nbsp;फैसला ले सकेगे | इस  प्रकार लिए गए&amp;nbsp; फैसले के फलस्वरूप शादी करके बाद मे पूरी जिन्दगी पछताने  तथा घुट घुट कर जीने की स्थितियों से बचा जा सकता है | &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-8674625101435518228?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/8674625101435518228/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_21.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/8674625101435518228'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/8674625101435518228'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_21.html' title='बिवाह की प्रास्थिति तथा बैवाहिक सामंजस्य'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-8221009831020693160</id><published>2010-07-20T17:47:00.002+05:30</published><updated>2010-07-20T17:47:38.965+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्य'/><title type='text'>सम्यक काल बोध</title><content type='html'>देश काल पात्र गत सापेक्षिकता ही वास्तव मे सापेक्षिकता का सिद्धांत है | देश काल पात्र गत सापेक्षिक पृष्ठभूमि मे काल का महत्व सर्बाधिक है | देश और पात्र इतने गतिमान व परिवर्तनशील नहीं हैं जितना कि काल | काल निरंतरता मे अबाध गति से बहता जा रहा है | परन्तु देश और पात्र सामान्यतया इस गति से सामंजस्य नहीं रख पाते हैं और इसी अन्तराल जन्य समस्या के कारण काल तत्व सर्बाधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हो जाता है | काल मीमांसा से स्पष्ट होता है कि काल निरन्तर गतिमान है और यह किसी देश व पात्र की न तो प्रतीक्षा करता है और न ही किसी के लिए रुकता ही है | अतः सम्यक काल बोध से ही काल समायोजन सहित सम्यक जीवन यापन तथा सही जीवन दर्शन का अपनाना संभव हो सकता है |&amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-size: medium; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif; font-size: 13px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;प्रायः लोग यह कहते हुए पाये जाते हैं कि हम समय गुजार रहे हैं अथवा समय काट रहे हैं | जबकि वास्तविकता यह है कि समय स्वयं गुजर रहा होता है और वह निरन्तर सबको गुजारता तथा काटता हुआ चलता जाता है | यह अवश्य संभव हो सकता है कि इस गुजर रहे समय के साथ हम अपने आप को भी गुजर जाने दें | यही सहज जीवन है और यही अभीष्ट भी होता है | सतत प्रवाहमान समय और देश व पात्र की स्थिरता जन्य अन्तराल की स्थिति मे हम गुजरते समय के साथ अपने को नहीं गुजार पाते हैं और सिनेमा ,कहानी ,उपन्यास ,टेलीविजन व गप शप आदि द्वारा समय गुजारने का कृत्रिम प्रयास करते हैं | यह स्वाभाविकता न होकर अपने को गुमराह करने जैसा कृत्य है | यदि समय गुजारने के लिए उपरोक्तानुसार कार्यकलापो&amp;nbsp;का आलंबन लेने की जरुरत महसूस होने लगे तो निश्चित समझिये कि आप समय के साथ नहीं चल पा रहे हैं और उपरोक्तानुसार अन्तराल की स्थिति उत्पन्न हो गयी है | अतः सर्बप्रथम हमें&amp;nbsp;काल के साथ साथ चलने अर्थात काल से&amp;nbsp;समायोजन की कला सीखनी होगी | समय के साथ गुजरना एक अनवरत बह रही धारा मे बहने जैसी स्थिति है | काल धारा के बिपरीत जाने मे होने वाली श्रम हानि व परेशानी ही इस अन्तराल की स्थिति है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;समय न कभी रुकता है और न ही किसी की प्रतीक्षा ही करता है | अतः प्रत्येक पात्र को काल की प्रतीक्षा करते हुए इसके गुजर जाने से पहले पकड़ने का प्रयास करना चाहिए | इसको ही अवसर कहते हैं , जिसके पकड़ मे आ जाने की स्थिति मे सफलता हाथ लगती है | अन्यथा स्थिति मे व्यक्ति हाथ मलता और पछताता हुआ रह जाता है | जब हम जानते हैं कि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता और यह सर्बाधिक महत्वपूर्ण तत्व है , हमें स्वयं समय की इस प्रकार प्रतीक्षा करनी होगी कि यह गुजरने न पावे और समय के&amp;nbsp;पास आते ही इसे पकड़ लेना चाहिए | इसके लिए सही पात्र बनना पड़ेगा और सही देश यानि स्थान पर अवस्थित होना होगा | तभी सम्यक कालबोध की स्थिति मे देश काल पात्र सायुज्य की स्थिति मे सफलता का वरण कारण&amp;nbsp;संभव हो सकेगा |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; सही देश तथा सही पात्र तभी अपना लक्ष्य भेद कर पाते हैं जब सही काल (अवसर )का सम्यक अभिज्ञान कर उसके&amp;nbsp; गुजर जाने से पहले पकड़ लिया जावे | चूँकि काल निरन्तर प्रवाहमान है , यह न तो किसी के पास जाता है और न ही चेतावनी देकर किसी को इंतजार करने का अवसर&amp;nbsp;ही देता है | अतयव हमें स्वयं समय के पास जाकर उसका इंतजार करना होगा | यदि एक बार समय गुजर गया तो बीता हुआ कालखंड दुबारा हाथ नहीं आता | इस प्रकार हम पाते हैं कि जिन्हें सम्यक कालबोध है , वे कभी असफलता का मुह नहीं देखते |सम्यक देश तथा पात्र सम्यक कालबोध के अभाव मे कुछ हासिल नहीं कर पाते |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; समय के प्रभाव मे अपने को डालकर उसके साथ साथ बहना जीवन को सहज और सुखमय बनता है , यह स्थिति अन्यथा नहीं होती | अतः सफल होने के लिए अपने को समय के प्रवाह मे डालकर बहते रहना चाहिए और सही पात्र बनकर सही स्थान पर सम्यक कालखंड (अवसर )को मजबूती से पकड़ लेना चाहिए | यही सफलता की कुंजी है और यही सफलता का काल भी होता है | सम्यक काल अभिज्ञान ,काल परीक्षण और काल नियंत्रण अत्यावश्यक होता है | काल को समुचित महत्व न देने वालों के हाथ कुछ नहीं आता है और वह हाथ मलता रह जाता है | काल को समुचित महत्व देने वाले किन्तु अपेक्षाकृत अकुशल पात्र को बहुत कुछ प्राप्त हो जाता है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; टेलीविजन देखना ,कहानी उपन्यास आदि मनोरंजन के साधनों मे लिप्त व्यक्ति का मन काल अभिज्ञान व काल साक्षित्व हेतु उपलब्ध नहीं होता | इसी दौरान काल प्रवाह मे कोई सही कालखंड यानि उपयुक्त अवसर भी गुजर जाता है और ऐसे मे हम हाथ मलते रह जाते हैं | काल बोध एक शिकार करने जैसा होता है | तनिक सी चूक और लापरवाही से शिकार हाथ से जाता रहता है | ऐसी स्थिति मे पछताने के अलावा कुछ नहीं बचता और कभी कभी उसी काल यानि अवसर के लिए सदियों तक इंतजार करना पड़ सकता है | यहाँ तक सम्यक कालबोध व काल अभिज्ञान नहीं कर सकने के कारण हम काल कवलित भी हो सकते हैं | अर्थात यदि सही समय पर हम सही पात्र नहीं बन सके तो सफलता से बंचित होना हमारी नियति होगी |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; अब तक हम समझ चुके हैं कि देश काल पात्र के संयोजन पर ही किसी घटना का घटित होना संभव होता है और काल तत्व सर्बाधिक महत्वपूर्ण और गतिशील है | इसके अनुसार चलना चाहिए और समय से आगे रहने की चेष्टा करनी चाहिए | कहने का यही तात्पर्य है कि इससे पहले कि समय आप पर सवार हो , समय पर आप हावी हो जाय | &amp;nbsp;समय पूर्ब सुचना के बगैर आता और चला जाता है | इस प्रकार किसी कार्य को संभाव्य बनाने के लिए समय को यथेष्ट महत्व देकर समय के अनुसार चलना चाहिए | इस सम्बन्ध मे पर्याप्त सजगता अपेक्षित है | समय का अभिज्ञान एवं प्रतीक्षा एक तपस्या है जो कठिन परिश्रम व चौकन्ना रहने से ही पूरी हो सकती है | यही लगो को निश्चित समय पर मनवांछित प्रतिफल देता है |&lt;span class="Apple-converted-space"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; समय हमेशा&amp;nbsp;घडी के अनुसार ही नहीं चलता है , वरन समय का कभी कभी मानसिक मापन भी होता है | ऐसा कई बार होता है कि किसी अत्यावश्यक कार्यवश यदि किसी स्थान पर पहुचना आवश्यक होने या किसी महत्वपूर्ण व संवेदनशील क्षण पर किसी की प्रतीक्षा करने का कालखंड बहुत लम्बा लगने लगता है | ऐसी स्थिति मे घडी से लगने वाला १५ मिनट का समय साल से अधिक&amp;nbsp;लगने लगता है | ऐसी स्थिति मे मन प्रति पल समय&amp;nbsp;&lt;span style="font-size: 13.8889px;"&gt;साक्षीत्व&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 13.8889px;"&gt;&amp;nbsp;करता रहता है | अतः १५ मिनट की दुरी सदियों जितनी लगने लगती है |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; समय के साथ गुजरना एक कला है ,किन्तु काल अभिज्ञान , काल प्रतीक्षा एवं काल साक्षीत्व आवश्यकता व महत्व को कभी भी नहीं भूलना चाहिए | काल देश व पात्र सापेक्ष्य भी है , क्योंकि २५०० प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित ग्रह पर भगवान बुद्ध आज पैदा हो रहे होंगे |&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span class="Apple-converted-space"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-8221009831020693160?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/8221009831020693160/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_3719.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/8221009831020693160'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/8221009831020693160'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_3719.html' title='सम्यक काल बोध'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-4083281568788727136</id><published>2010-07-20T17:45:00.000+05:30</published><updated>2010-07-20T17:45:46.204+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्य'/><title type='text'>श्रृष्टि संरचना  , श्रृष्टि चक्र , श्रृष्टि नियंत्रण  तथा ब्रह्म बोध</title><content type='html'>संरचना बिधान मे प्रत्येक संरचना का प्राण केंद्र यानि न्यूक्लियस का होना अनिवार्यता है अर्थात प्राण केंद्र विहीन किसी संरचना की हम कल्पना नहीं कर सकते हैं | प्रत्येक संरचना के&amp;nbsp;प्राण केंद्र की धुरी से आबद्ध होकर उस संरचना&amp;nbsp;का अंश इलेक्ट्रान - प्रोटान अथवा उपग्रह के रूप मे निरन्तर उसकी&amp;nbsp;परिक्रमा करता रहता है | परमाणु श्रृष्टि की सबसे छोटी संरचना है | पदार्थ पर चारो ओर से पड़ने वाला वायु&amp;nbsp;मंडलीय दबाव उसके भीतर एक प्राण केंद्र , जो &amp;nbsp;पदार्थ की संरचना की स्थिरता बनाये रखने हेतु वायु मंडलीय दबाव&amp;nbsp;के बराबर बहिर्मुखी दबाव देने का कार्य करता है , को उत्पन्न करता है | &amp;nbsp; इलेक्ट्रान व प्रोटान इस संरचना के अंश के रूप मे परमाणु&amp;nbsp;के प्राण&amp;nbsp;केंद्र की परिक्रमा करते रहते हैं | पृथ्वी समस्त परमाणुओं का समेकित स्वरूप है और चन्द्रमा पृथ्वी के प्राण केंद्र से आबद्ध होकर इसकी परिक्रमा करता है | सौर मंडल मे सूर्य की प्राण केन्द्रीय स्थिति है और सारे ग्रह व उपग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे होते हैं | महा सौर मंडल मे महा सूर्य की प्राण केन्द्रीय स्थिति है और अनेकानेक सौर मंडल महा&amp;nbsp; सूर्य की ग्रहों की भाति परिक्रमा कर रहे होते हैं | इसी प्रकार महा महा सौर मंडल मे&amp;nbsp;महा महा सूर्य की प्राण केन्द्रीय स्थिति है और अनेकानेक महा सौर मंडल ग्रहों&amp;nbsp;की भाति इस महा महा सौर मंडल की परिक्रमा कर रहे होते हैं | इसी प्रकार महानतम सौर मंडल मे महानतम सूर्य की प्राण केन्द्रीय स्थिति है | अनेकानेक&amp;nbsp; महा महा सौर मंडल और&amp;nbsp; ब्रह्माण्ड की समस्त संरचनाये इस परम प्राण केंद्र की परिक्रमा&amp;nbsp;कर रही होती हैं |&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-size: medium; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif; font-size: 13px;"&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;इस परम प्राण केंद्र की तरंग दैर्घ्य ( बेब लेंथ ) ब्रह्माण्ड की हरेक संरचना तक होने के कारण यह सर्ब व्याप्त है | सर्बाधिक तरंग दैर्घ्य वाली यह&amp;nbsp;शक्ति&amp;nbsp;ब्रह्माण्ड की समस्त संरचनाओं को परिचालित , संचालित एवं नियंत्रित करने वाली होने के कारण यह सर्ब शक्तिमान है | यही परम प्राण केंद्र ब्रह्माण्ड की समस्त संरचनाओं को शक्ति प्रदान करता है और उनकी गत्यात्मकता को नियंत्रित करता है | इस प्रकार सर्ब व्यापकता , सर्ब शक्ति मानता और सर्ब नियंता होना इसका प्रमुख गुण है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; सर्ब नियंता , सर्ब व्यापकता एवं सर्ब शक्तिमानता इस परम प्राण केंद्र अथवा परम सिद्धांत के गुण बोध मात्र को स्पष्ट करता है , पर इससे इस सत्ता के&amp;nbsp;स्वरूप का आभास नहीं होता | सापेक्ष जगत मे समस्त सीधी रेखा लगने वाली समस्त तरंगें वस्तुतः सीधी रेखाएं न होकर किसी बड़े बृत&amp;nbsp;की त्रिज्याएँ मात्र होती हैं | केवल अनंत तरंग दैर्घ्य वाली त्रिज्या&amp;nbsp; ही सीधी रेखा मे&amp;nbsp;हो सकती है | इस प्रकार यह परम प्राण केंद्र , परम सिद्धांत एक सीधी रेखा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | इस प्रकार निरपेक्ष तरंग दर्घ्य वाली सत्ता ही सीधी रेखा मे हो सकती है | अब प्रश्न उठता है कि सीधी रेखा मे क्या&amp;nbsp;हो सकता&amp;nbsp; है ? कोई भी भौतिक , मानसिक सापेक्ष&amp;nbsp;संरचना सीधी रेखा मे नहीं हो सकती | सीधी रेखा मे केवल संचेतना अथवा पुरुष ही हो सकता है | &amp;nbsp;अतयव&amp;nbsp;इस अनंत शक्ति सत्ता&amp;nbsp;को हम&amp;nbsp;परम पुरुष अथवा ईश्वर का नाम &amp;nbsp;दे सकते हैं | &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; यह परम चेतना , परम पुरुष तथा परम सिद्धांत बिना किसी परम कारक तत्व के कार्य नहीं कर सकता है | सत-राज-तम की त्रिगुणात्मकता शक्ति स्वरूपा प्रकृति ही वह परम कारक व परम परिचालक के रूप मे पुरुष को शक्ति प्रदान करते हुए संचालित&amp;nbsp;करती है | यह प्रकृति अपने त्रिगुणात्मक स्पन्दंयुक्त कार्य विधान द्वारा सदैव क्रियाशील रहती है | प्रारंभ मे प्रकृति के आन्तरिक त्रिगुणात्मक स्पंदन के बावजूद परम&amp;nbsp;पुरुष अप्रतिहत रहता है | यह प्रकृति की निष्क्रियता की वह स्थिति है , जहाँ परम पुरुष से अलग प्रकृति&amp;nbsp;का कोई अलग तथा उद्भासित अस्तित्व नहीं होता है | दूसरे शब्दों मे परम पुरुष की देह मे प्रकृति सुषुप्ति की स्थिति मे विद्यमान रहती है | यहाँ प्रकृति और परम पुरुष की स्थिति कागज के दो पृष्ठों या सिक्के के दोनों भाग की तरह संपृक्त होती है और जिसका बिलगाव नहीं होता | इसे निर्गुण ब्रह्म की स्थिति कही जा सकती है जो श्रृष्टि स्पंदन के ठहराव की स्थिति है | &amp;nbsp;&lt;br clear="all" /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; परम पुरुष की इच्छा जागने पर प्रकृति का&amp;nbsp;त्रिगुणात्मक स्पंदन सक्रिय हो उठता है और तरंग सायुज्य की प्रक्रिया द्वारा परम पुरुष सगुण रूप धारण करना प्रारंभ करता है | सर्बप्रथम परम पुरुष प्रकृति के सत गुण स्पंदन से सायुज्य करके सगुण ब्रह्म का स्वरूप धारण करेगा | बाद में रज गुण और अंत में तम गुण सायुज्य स्थापित करेगा | यह भूमा मन की स्थिति होगी जो सगुण ब्रह्म की सूक्ष्म तम स्थिति होगी | इसके उपरांत तमो गुण का प्रभाव निरंतर बढ़ता जाता है और शेष दोनों गुण उत्तरोतर सुसुप्त होते जाते हैं | इस स्थूलीकरण की प्रक्रिया में सर्बप्रथम आकाश तत्व (ध्वनी स्पंदन ) वायु तत्व (स्पर्श स्पंदन ) ,अग्नि तत्व (दृश्य स्पंदन ) ,जल तत्व (घ्राण स्पंदन )तथा छिति तत्व (स्वाद स्पंदन )अतिरिक्त रूप मे स्थान पाते हैं | परम सिद्धांत ( परम पुरुष )पर परम कारक (प्रकृति )के परम स्थूलीकरणकी अंतिम&amp;nbsp;स्थिति छिति तत्व की है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; इस परम सूक्ष्म से स्थूल तक की यात्रा की अंतिम परिणति छिति तत्व है , जिस&amp;nbsp;पर चारो ओर से वायु मंडलीय दबाव पड़ता है जो पृथ्वी के भीतर एक बिंदु पर प्रतिफलित होकर प्राण केंद्र यानि न्यूक्लियस का निर्माण करता है जो पृथ्वी के ढांचागत स्थायित्व के लिए वायु मंडलीय दबाव के बराबर बहिर्मुखी दबाव उत्पन्न करता है | तभी एक पदार्थ का ढांचागत स्थायित्व बना रहना&amp;nbsp;संभव होता है |एक अन्य स्थिति की परिकल्पना कीजिये ,जहाँ पदार्थ के प्राण केंद्र का बहिर्मुखी दबाव वायु मंडल &amp;nbsp;के अंतर्मुखी दबाव से अधिक है | ऐसी स्थिति मे पदार्थ का&amp;nbsp;संरचनात्मक अस्तित्व बनाये रखने के उद्देश्य से उक्त पदार्थ का एक अंश अलग होकर इतना दूर चला जाता है ,जहाँ उसके पहुचने से पदार्थ के संरचनात्मक संतुलन मे सामंजस्य स्थापित हो जाताहै | पदार्थ का उक्त अंश पदार्थ के प्राण केंद्र से ही आबद्ध होकर उसी पदार्थ के&amp;nbsp;उपग्रह व ग्रह के रूप मे उसकी परिक्रमा करने लगता है | इस प्रक्रिया को जदास्फोत कहते&amp;nbsp; हैं और विखंडन की इसी प्रक्रिया से श्रृष्टि मे विकास और&amp;nbsp; गुणन प्रभाव देखने को मिलता है | एक से अनेक होने की यह&amp;nbsp;प्रक्रिया ब्रह्माण्ड मे निरन्तर चलती रहती है |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; अब एक ऐसी स्थिति की परिकल्पना कीजिये ,जहाँ वायु&amp;nbsp;मंडलीय दबाव पदार्थ के प्राण केंद्र के बहिर्मुखी दबाव से काफी अधिक है | ऐसी स्थिति मे पदार्थ के संकुचन की प्रक्रिया मे अणुकर्षण व अणुसंघात की स्थिति उत्पन्न&amp;nbsp;होगी | जिसके फलस्वरूप पहले छिति चूर्ण तत्पश्चात छिति तत्व मे अवस्थित पांच महाभूतो का सुप्त स्पंदन जागृत हो उठेगा और उपयुक्त संयोजन के फलस्वरूप जीव उत्पन्न होने की सम्भावना होगी | सर्बप्रथम प्रकृति के तम गुण से सायुज्य होगा | तत्पश्चात जड़ संघात के फलस्वरूप एककोशीय अमीबा बहुकोशीय होकर जैविक विकास का मार्ग प्रशस्त्र करेगा | जीव विकास की इस प्रक्रिया मे पहले वनस्पति फिर जलचर फिर पशु और सबसे बाद मे मनुष्य उत्पन्न होगा | यही जैविक विकास की प्रक्रिया और क्रम है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;इस जड़ संघात की प्रक्रिया के पश्चात्&amp;nbsp;मनस संघात की परिस्थितियां उत्पन्न होंगी | मनस संघात की इस प्रक्रिया मे सर्बप्रथम वनस्पति मन फिर पशु मन फिर मानव मन उत्पन्न होगा | कालांतर मे विकसित बुद्धि का मानव बोधि और आध्यात्म का आलंबन लेकर सापेक्षिकता के बंधन से मुक्त होकर ब्रह्म लींन हो जायेगा | यह पूर्ण स्थूल से परम सूक्ष्म (पुरुष) तक की आरोही यात्रा का क्रम है |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;निर्गुण ब्रह्म की स्थिति ठहराव (pause) की स्थिति है | इस क्रिया विहीनता की स्थिति मे ही शक्ति संचयन होता है | इसके पश्चात् चरम बिंदु से चरम स्थूल छिति तत्व की अवरोही क्रम और छिति तत्व के स्थूलीकरण से ब्रह्मलीन होने की आरोही क्रम की यात्रा चलती रहती है | इसे ही श्रृष्टि चक्र या ब्रहास्पंदन समझ सकते हैं | &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-4083281568788727136?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/4083281568788727136/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_20.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/4083281568788727136'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/4083281568788727136'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_20.html' title='श्रृष्टि संरचना  , श्रृष्टि चक्र , श्रृष्टि नियंत्रण  तथा ब्रह्म बोध'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-5303065679628256102</id><published>2010-07-15T15:53:00.000+05:30</published><updated>2010-07-15T15:53:58.738+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय'/><title type='text'>जनसँख्या नियंत्रण पर बेमतलब हंगामा ; विश्व जनसँख्या दिवस पर विशेष</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: small;"&gt;भारत ही नहीं बिश्व स्वास्थ्य संगठन सहित पूरे पश्चिमी देश भारत की जनसँख्या बृद्धि से न जाने क्यों बहुत परेशान है | जब से यह चिंता और उक्त चिंता के फलस्वरूप जनसँख्या नियंत्रण के&amp;nbsp; युद्ध स्तरीय प्रयास चल रहे हैं , तबसे ही जनसँख्या ज्यादा बढ़ी है | तो कही&amp;nbsp;यह सारा प्रपंच भारत की जनसँख्या को ज्यादा बढ़ाने की साजिश तो नहीं है ? वैसे जिस बात&amp;nbsp;की जोर शोर से चर्चाएँ होती है और जिस पर प्रतिबन्ध लगाने हेतु बल दिया जाता है , वह निरन्तर&amp;nbsp;बढता ही चला जाता है जैसे कि एड्स तथा भ्रष्टाचार | इन दोनों को नियंत्रित करने की&amp;nbsp;जितनी ज्यादा कोशिशें की जा रही हैं&amp;nbsp; तथा चर्चाएँ&amp;nbsp;की जा रही है , एड्स और भ्रष्टाचार उससे भी&amp;nbsp;अधिक तेज रफ़्तार मे बढता जा रहा है | जनसँख्या बृद्धि के सबंध मे भी ठीक&amp;nbsp;वैसा ही होना प्रतीत हो रहा है | आखिर विश्व स्वास्थ्य संगठन , अमेरिका सहित सारे पश्चिमी देश इस बारे मे&amp;nbsp;हमसे भी ज्यादा परेशान और चिंतित क्यों हैं ? &amp;nbsp;हम भारतबासी भी बिना सोचे समझे&amp;nbsp;उनके स्वर मे स्वर मिलाने लगते हैं | कहीं यह चिंता भारत मे तेजी से बढ़ रही मुसलमानों की&amp;nbsp;आबादी के सम्बन्ध मे हिन्दुओं तथा गरीबों की बढ़ रही जनसँख्या के सम्बन्ध मे अमीरों की चिंता जैसी तो नहीं है | वस्तुतः हम भारतीयों को हीन भावना से ग्रषित करने की पश्चिमी देशों की यह सोची समझी चाल मात्र&amp;nbsp;प्रतीत होती है | &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial,sans-serif;"&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;अब हम पूरी गंभीरता से जनसँख्या के अन्य पहलुओं पर बिचार करते हैं | जनसँख्या के सम्बन्ध मे माल्थस सबसे बड़ा अर्थशास्त्री हुआ है | जिसका कहना है कि जनसँख्या ज्यामितीय (२ ४ ८ १६ ...) ढंग से और खाद्य सामिग्री गणितीय ( १ २ ३ ४ ५ ...) रूप मे बढती है | अतयव खाद्य उत्पादन से सामंजस्य रखने के लिए जनसँख्या नियंत्रण आवश्यक है | माल्थस की&amp;nbsp;यह अवधारणा अत्यधिक पिछड़ी सोंच पर आधारित था , जिसे भारत मे हुई हरित क्रांति ने ही झुठला दिया था | उस समय नई और वैज्ञानिक खेती ने खाद्य उत्पादन के क्षेत्र मे&amp;nbsp;एक क्रांति ला दिया था | उक्त हरित क्रांति से लगभग ५० साल बाद भी&amp;nbsp;हम नई खेती के तरीको को मात्र २५ - ३० प्रतिशत खेतो तक ही ले जा पायें है | इससे यह स्वतः प्रमाणित है कि इस सम्बन्ध मे प्रकृति न कि माल्थस का सिद्धांत कार्यरत है | प्रकृति हर बच्चे को एक मुह के साथ दो हाथ देकर पैदा करती है और आवश्यकता अविष्कार की जननी है ,का प्राकृतिक नियम व्यक्ति के लिए भोजन जुटता है | अभी&amp;nbsp;तो कृषि के क्षेत्र मे और भी अविष्कार होने हैं और समुद्री भोज्य पदार्थों&amp;nbsp;की ओर अभी ध्यान ले जाने की जरुरत ही नहीं पड़ी है | सिंथेटिक फ़ूड यानि टेबलेट का&amp;nbsp;तो आना शेष है | ऐसे मे&amp;nbsp;भोज्य पदार्थो की संभावित कमी के कारण हमें जनसँख्या की भयावहता &amp;nbsp;से घबराने की कोई जरुरत नहीं है | &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;सृष्टि को प्रकृति चलाती है न कि विश्व स्वास्थ्य संगठन | गोहत्या पर प्रतिबन्ध के बावजूद गायों की सख्या निरन्तर&amp;nbsp;कम होती जा रही है और भैसों की संख्या तेजी से बढ़ रही है , जिनकी हत्या पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है | मुर्गे और बकरे&amp;nbsp;रोज करोडो की संख्या मे कटते हैं , फिर भी | उनकी तादात उससे भी&amp;nbsp; तेज रफ़्तार मे बढ़ रही है | यह भी आश्चर्यजनक है कि घोड़ों की कभी हत्या नहीं हुई , पर उनकी आबादी मे बेतहाशा कमी आई है | ४० -५० साल पहले हर गोंव मे कम से कम एक घोडा होता ही था , पर आज ९९ प्रतिशत गावों से घोड़े गायब हो गए हैं | एक्के तांगे भी बहुत घट गए हैं और आज यह कही दिखाई नहीं देते | फ़ौज मे भी घोड़े बहुत कम कर दिए गए हैं | आखिर घोड़ो की इस आशातीत कमी का क्या कारण है ? वस्तुतः प्रकृति जिन्हें जरुरी समझती है , उन्हें ही रखती है और&amp;nbsp;&amp;nbsp;जिनकी जरुरत नहीं होती . उन्हें कम अथवा समाप्त कर देती है | यदि हम जनसँख्या पर प्रतिबन्ध लगाते हैं तो प्रकृति की इच्छा के बिपरीत जाने पर हमें असफलता ही हाथ लगेगी | प्रकृति द्वारा&amp;nbsp;ऐसा न चाहने पर प्रकृति एक साथ २ - ३ बच्चे पैदा कराएगी और यही हो रहा है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;जनसँख्या नियंत्रण से जरुरी बहुत सारे मुद्दे हैं और इन अत्यधिक जरुरी मुद्दों की ओर ध्यान दिया जाना समय की मांग है | इस प्रकरण मे इतना अवश्य जरुरी है कि हमें अपने परिवार को नियोजित व योजनाबद्ध ढंग से चलने पर ध्यान देना चाहिए | पढ़े लिखे लोगो के कम बच्चे होते हैं तो लोगो का ध्यान पढ़ने लिखने की ओर ले जाना चाहिए | &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;a href="http://apnabundelkhand.com/"&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम&lt;/span&gt; &lt;/a&gt;के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-5303065679628256102?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/5303065679628256102/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_15.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/5303065679628256102'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/5303065679628256102'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_15.html' title='जनसँख्या नियंत्रण पर बेमतलब हंगामा ; विश्व जनसँख्या दिवस पर विशेष'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-1422421787982444261</id><published>2010-07-13T12:17:00.000+05:30</published><updated>2010-07-13T12:17:55.806+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीतिक'/><title type='text'>कक्षीय गणतंत्र यानि कम्पार्टमेंटलाइज्ड डेमोक्रेसी</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;div&gt;शासन प्रणालियों के विद्यमान विभिन्न स्वरूपों मे प्रजातंत्र  सबसे अच्छी एवं जनहितकारी शासन व्यवस्था है | परन्तु मनोवैज्ञानिक दृष्टि  से देखा जाय तो प्रत्येक&amp;nbsp;व्यष्टि&amp;nbsp;एवं&amp;nbsp;समष्टिगत क्षेत्र मे अधिनायकबाद का ही  बोलबाला है | परिवार का उदाहरण लेंने पर हम पाते हैं कि परिवार का मुखिया ,  यदि शारीरिक ,मानसिक व वित्तीय दृष्टि से सक्षम व समर्थ है , पारिवारिक  निर्णयों मे वह प्रजातान्त्रिक न होकर अधिनायकबादी रवैया ही अपनाता है | वह  परिवार के किसी सदस्य से न तो उनकी राय की अपेक्षा करता है और न ही उनके  परामर्श का ही स्वागत करता हुआ प्रतीत होता&amp;nbsp; है&amp;nbsp; | शासकीय क्षेत्र मे भी  तदनुसार स्थिति देखने को मिलती है | शासक यदि हिटलर जैसा&amp;nbsp;अपरिमित शक्ति का  स्वामी है &amp;nbsp;, तो वह सीना तानकर कहेगा कि देखो मै अडोल्फ़&amp;nbsp;हिटलर तानाशाह बोल  रहा हूँ और&amp;nbsp; मै यह तानाशाही हुक्म देता हूँ | कमजोर शक्ति वाला आज का शासक  मध्यम मार्ग अपना कर मधुर संभाषण व सहृदयता का मुखौटा लगाकर&amp;nbsp;&amp;nbsp;छद्म रूप से  अधिनायकबादी मनोवृति से समझौतावादी कार्यशैली  को&amp;nbsp;अपनाता&amp;nbsp;हुआ&amp;nbsp;प्रतीत&amp;nbsp;होता&amp;nbsp;है&amp;nbsp;| वह&amp;nbsp;अपने को शासक बताने&amp;nbsp;&amp;nbsp;के बजाय जनता का  सेवक कहता है , यद्यपि&amp;nbsp;क़ि उनका&amp;nbsp;रहन&amp;nbsp;सहन&amp;nbsp;, सोंच&amp;nbsp;, कार्य&amp;nbsp;शैली&amp;nbsp;तथा&amp;nbsp;कार्य  व्यवहार&amp;nbsp;शासको&amp;nbsp;जैसा&amp;nbsp;ही&amp;nbsp;होता है&amp;nbsp;|&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; प्रजातंत्र&amp;nbsp;के बर्तमान स्वरूप मे काफी कमियां आ गयी प्रतीत  होती हैं और उपरोक्तानुसार तथ्यों के परिप्रेक्ष्य मे उपयुक्त शासन विधा का  प्राविधान करते समय हमें&amp;nbsp; अधिनायकबादी मनोवृति को दरकिनार करना आवश्यक हैं  , क्योकि यह बिलकुल&amp;nbsp;वांक्षित व जनहितकारी&amp;nbsp;नहीं है | वस्तुतः मानव इतिहास  इस बात&amp;nbsp;का साक्षी है कि प्रत्येक देश व काल मे अधिनायकबादी शासक अपने तुच्छ  अहम्&amp;nbsp;, स्वार्थ व&amp;nbsp;सनक&amp;nbsp;&amp;nbsp;के लिए पूरी जनता तथा मानवता को ही&amp;nbsp;दांव पर लगाते  आयें हैं | अतयव अधिनायकबादी मनोवृति का समुचित सज्ञान लेते हुए इस प्रकार  की शासन विधा प्राविधानित करनी आवश्यक&amp;nbsp;&amp;nbsp;होगी , जिसमे इस अनपेक्षित मनोवृति  के होते हुए कोई शासक अपने व्यक्तिगत अहम् , स्वार्थ व सनक&amp;nbsp;भरी&amp;nbsp;इच्छा  पूर्ति हेतु जनता&amp;nbsp;व &amp;nbsp;मानवता का किसी दशा मे अहित न कर सके |&amp;nbsp;&lt;br clear="all" /&gt; &amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; प्रस्तावित शासन विधा की अवधारणा मे निरंकुश तानाशाह के स्थान पर  दयालु तानाशाह (वेनीवोलेंट डिक्टेटर) की अवधारणा को प्रश्रय दिया गया है |  शासक का जनता के प्रति व्यवहार एक पिता की तरह होना चाहिए | माता प्रेम  ,करुणा और दयालुता की&amp;nbsp;प्रतिमूर्ति होती है , परन्तु पिता की स्थिति माता से  थोड़ी&amp;nbsp;&amp;nbsp;भिन्न होती है | पिता मे एक माता का&amp;nbsp; गुण तो होता ही है , उसे  अनुशासनशील बनाने के लिए दयालुता के साथ ही तानाशाह अर्थात अदेशात्मकता&amp;nbsp;का  भी दायित्व निभाना होता है | अतयव पिता की स्थिति एक दयालु तानाशाह के समान  होती है | एक शासक को भी पिता की तरह दयालु तानाशाह की तरह होना चाहिए |  ताकि जनता को पिता का संरक्षण मिल सके , किन्तु उन्हें इस बात का भय  निरन्तर बना रहना चाहिए&amp;nbsp; कि गलत काम अंजाम होने पर उन्हें पिता की तरह शासक  द्वारा दण्डित होना पड़ेगा | शासक और पिता मे&amp;nbsp;अंतर बस इतना ही है कि जनता व  शासक का&amp;nbsp;यह रिश्ता रक्त सम्बन्ध पर आधारित न होकर अर्जित संबंधों पर  आधारित होता है | अतयव इस अर्जित सम्बन्ध बनाये रखने के लिए शासक को  निरन्तर इस दिशा मे प्रयासशील रहना पड़ेगा , तभी पितृवत व्यवहार होने की  दशा मे जनता -शासक का यह अनुबंधित रिश्ता कायम रह सकेगा | अन्यथा स्थिति मे  अर्थात इसके बिपरीत आचरण होने की दशा मे अर्जित सम्बन्ध का यह अनुबंध  स्वतः&amp;nbsp;समाप्त हो जावेगा | इस प्रकार प्रजातान्त्रिक अंकुश द्वारा जनता&amp;nbsp;शासक  को नियंत्रित एवं पदच्युत करने की शक्ति से संपन्न होगी और यह&amp;nbsp;व्यवस्था भी  प्राविधानित होगी |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;अब हम शासन विधा के प्रजातान्त्रिक पहलू पर भी बिचार कर लेते  हैं | विधायिका , कार्यपालिका , न्यायपालिका , सेना , वित्त&amp;nbsp;एवं आडिट शासन  के अंग यानि&amp;nbsp;कक्ष (कम्पार्टमेंट ) हैं | &amp;nbsp;आज की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का  सबसे बड़ा&amp;nbsp;दोष यही है कि उक्त सभी कक्ष स्वतन्त्र व निष्पक्ष रूप से कार्य  नहीं करते हैं , वरन एक कक्ष दूसरे कक्ष व कक्षों को सीधे अथवा परोक्ष रूप  से प्रभावित व नियंत्रित करता है | बस इसमें ही कुछ&amp;nbsp;बड़ा  संशाधन&amp;nbsp;करना&amp;nbsp;पड़ेगा&amp;nbsp;| इस व्यवस्था का नाम होगा कक्षीय गणतंत्र | कक्षीय  गणतंत्र की इस व्यवस्था मे शासन के उपरोक्त&amp;nbsp;सभी कक्ष&amp;nbsp;(अंग ) स्वतन्त्र रूप  मे कार्य करेंगे और हर प्रकार के हस्तक्षेप से पूर्णतया मुक्त होंगे |  प्रत्येक कक्ष के गठन , संरचना ,चयन का कार्य उसी कक्ष द्वारा सम्पादित  होगा और इसमें कोई वाह्य हस्तक्षेप &amp;nbsp;नहीं होगा | इसी प्रकार प्रत्येक कक्ष  अपने समस्त क्रिया कलापों के सम्बन्ध मे पूर्णतया स्वतत्र होगा और इसमें भी  किसी प्रकार का बाह्य हस्तक्षेप नहीं हो सकेगा | समस्त कक्षों के मध्य  स्पष्ट कार्य विभाजन होगा और बिना किसी दखलंदाजी के प्रत्येक  कक्ष&amp;nbsp;स्वतंत्र&amp;nbsp;रूप से अपने कार्यों को सम्पादित करेंगे |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;वर्तमान मे विधायिका की स्थिति ऐसी है कि यह सर्वोपरि बनी हुई  है और इसका प्रत्येक कक्ष पर प्रभुत्व व हस्तक्षेप बना रहता है | विधयिका  के बहुमत का नेता अपना मंत्रिमंडल बनाकर स्वयं&amp;nbsp;&amp;nbsp;कार्यपालिका बन जाता है  और&amp;nbsp;पूरी&amp;nbsp;कार्यपालिका&amp;nbsp;पर&amp;nbsp;नियंत्&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;रण&amp;nbsp;रखती&amp;nbsp;है&amp;nbsp;| इसी मंत्रिमंडल का एक  सदस्य कानून मंत्री बनकर न्यायाधीशों&amp;nbsp;का&amp;nbsp;चयन&amp;nbsp;सहित&amp;nbsp;न्या&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;यपालिका को  संचालित व नियंत्रित करता है | मंत्रिमंडल एक सदस्य रक्षा मंत्री बनकर सेना  की स्वायत्तता को प्रभावित करता है | इसी का एक सदस्य वित्त मंत्री के रूप  मे सभी कक्षों पर प्रभाव व प्रभुत्व बना कर रखता है और आडिट को स्वतन्त्र  नहीं बना&amp;nbsp; रहने देता है|विधायिका&amp;nbsp;व&amp;nbsp;कार्यपालिका  के&amp;nbsp;नियंत्रणाधीन&amp;nbsp;रहने&amp;nbsp;वाली&amp;nbsp;आडि&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;ट&amp;nbsp;मशीनरी&amp;nbsp;से&amp;nbsp;उसी&amp;nbsp;का स्वतन्त्र&amp;nbsp;आडिट करने  कीकैसे&amp;nbsp;उम्मीद&amp;nbsp;कर&amp;nbsp;सकते&amp;nbsp;हैं&amp;nbsp;|&amp;nbsp;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;इतनी सर्ब शक्तिमान बिधायिका की इकाई  सांसद&amp;nbsp;और बिधायक के पद धारक के चुनाव&amp;nbsp;लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं है और  ऐसे पदधारक को जो जो अवगुण नहीं होने चाहिए , वही वही अवगुण निर्योग्यताओं  के रूप मे उन्हें चुनाव जितवाती हैं और इन्ही निर्योग्यताओं के बलबूते वे  अपना बर्चस्व कायम रखते हुए समाज का सिरमौर बने रहते हैं | अतयव इस  सर्बाधिक महत्वपूर्ण&amp;nbsp;कक्ष के सदस्य के चयन के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण एवं  पद के अनुरूप योग्यताएं निर्धारित की जानी चाहिए | न्यूनतम शैक्षिक योग्यता  , निस्वार्थ जनसेवा , समाज सेवा , निर्मल चरित्र एवं अपराधरहित जीवन जैसी  सामान्य योग्यताएं तो ऐसे पदधारक के लिए होनी ही चाहिए |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; कार्यपालिका मे चपरासी से कार्यपालक मंत्री तक सभी का चुनाव एक  चयन आयोग द्वारा होना&amp;nbsp; चाहिए | तभी कार्यपालिका कक्ष स्वतन्त्र व निष्पक्ष  रहकर काम कर सकेगा और इसी से जनता का सर्बाधिक भला होगा | इसी प्रकार  न्यूनतम कर्मचारी से कानून मंत्री तक&amp;nbsp;का चुनाव न्यायिक चयन आयोग ,सिपाही से  रक्षा मंत्री तक&amp;nbsp;का चुनाव रक्षा चयन आयोग ,&amp;nbsp;निम्नतम&amp;nbsp;कर्मचारी&amp;nbsp;से वित्त  मंत्री तक का चयन वित्त चयन आयोग&amp;nbsp; तथा नीचे के कर्मियों&amp;nbsp;&amp;nbsp;से आडिट मंत्री  तक&amp;nbsp;का चयन आडिट चयन आयोग द्वारा होना चाहिए | तभी समस्त कक्ष बिना किसी  बाह्य हस्तक्षेप के स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष रूप से कार्य कर सकेंगे और तभी  वास्तविक प्रजातंत्र स्थापित हो सकेगा और जनता बापू जी के राम राज्य के सुख  का आस्वादन कर सकेगी | &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; , इससे यह स्वतः स्पष्ट है कि बर्तमान शासकीय व्यवस्था मे  हस्त्क्षेपीय गणतंत्र की ही स्थिति दृष्टिगोचर हो रही है | यह स्थिति जनहित  के प्रतिकूल है&amp;nbsp;और वर्तमान&amp;nbsp;&amp;nbsp;व्यवस्था अपेक्षित परिणाम बिलकुल ही नहीं दे  सकती है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;कक्षीय गणतंत्र की व्यवस्था मे विधायिका , कार्यपालिका ,  न्यायपालिका , सेना , वित्त एवं आडिट शासन के अलग अलग कम्पार्टमेंट यानि  कक्ष होंगे जो पूर्णतया स्वतन्त्र एवं सशक्त होंगे | कोई भिन्न कक्ष किसी  कक्ष मे कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकेगा | प्रत्येक कक्ष की संरचना व गठन उसी  कक्ष के अधिकार क्षेत्र मे होगा | विधायिका का कार्य नियम व कानून बनाना है  , जिसे कार्यपालिका लागू करेगी | दो या दो से अधिक कक्षों के बिवादों को  न्यायपालिका निपटाएगी | वित्तीय कक्ष अपना कार्य स्वतन्त्र रूप से सम्पादित  करेगा और वित्तीय अपव्यय को रोकते हुए समस्त कक्षों मे वित्तीय अनुशासन  स्थापित करेगा | आडिट कक्ष बिना किसी दबाव व भय के सभी कक्षों के लेखों का  आडिट करेगा और वित्तीय घोटालों को रोकेगा | सेना अपना कार्य स्वतन्त्र रूप  से करेगी और पूरे विश्व मे अपना वर्चस्व स्थापित करेगी | कहने का तात्पर्य  यह है क़ि सभी कक्षों के मध्य स्पष्ट कार्य विभाजन होगा और गुणात्मक शासन  के एक नए युग का सूत्रपात होगा |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; उपरोक्तानुसार समस्त कक्षों की पूर्णतया&amp;nbsp;स्वतन्त्र  कार्यविधि अपनाने की दशा मे एक महासमन्वयक की भी आवश्यकता होगी ,  जो&amp;nbsp;सामाजिक मथानी से मक्खन की भांति स्वतः उभर कर सर्वोपरि स्थिति प्राप्त  करेगा &amp;nbsp;और यही महा समन्वयक&amp;nbsp;वास्तविक रूप मे दयालु तानाशाह ही होगा | इस  व्यवस्था से राजनीति , जो सबसे बड़ी बुरायी है &amp;nbsp;,को हम बहुत अंश मे कम कर  सकते हैं और मनुष्य के जीवन को बहुत खुशहाल बनाया जा सकता है |&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;&lt;a href="http://apnabundelkhand.com/"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-1422421787982444261?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/1422421787982444261/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_13.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/1422421787982444261'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/1422421787982444261'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post_13.html' title='कक्षीय गणतंत्र यानि कम्पार्टमेंटलाइज्ड डेमोक्रेसी'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-4012183772496511949</id><published>2010-07-02T10:10:00.000+05:30</published><updated>2010-07-02T10:10:31.188+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्य'/><title type='text'>जीवन की वास्तविक उपलब्धियां</title><content type='html'>मनुष्य किसी देश काल खंड का निवासी हो , स्त्री अथवा  पुरुष हो , आस्तिक या नास्तिक हो , अध्यात्मिक&amp;nbsp;अथवा&amp;nbsp;भौतिकबादी&amp;nbsp;हो&amp;nbsp;,  अध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उनके जीवन की  वास्तविक&amp;nbsp;उपलब्धियां&amp;nbsp;ही&amp;nbsp;जीवन की वास्तविक कसौटी के रूप मे होती हैं ,  जिस&amp;nbsp;कसौटी पर खरा उतरने की दशा मे यह सिद्ध होता&amp;nbsp;है&amp;nbsp;&amp;nbsp;कि जीवन की दिशा और  दशा सही है अथवा गलत | कोई भी दर्शन व जीवन पद्धति इसी&amp;nbsp; कसौटी के आधार पर  अपनी सार्थकता तथा उपयोगिता प्रमाणित&amp;nbsp;करती&amp;nbsp;है&amp;nbsp;&amp;nbsp;| इस प्रकार जीवन की  वास्तविक उपलब्धियों की यह कसौटी बहुत प्रासंगिक और उपयोगी है और इसको भली  भांति समझना बहुत आवश्यक है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;जीवन की यह यथार्थ उपलब्धियां केवल तीन हैं | पहली उपलब्धि  है प्रफुल्लता | प्रफुल्लता एक बहुत बड़े मायने वाला शब्द है और यह ख़ुशी व  प्रसन्नता से एकदम भिन्न है | जब मनस पटल , सम्पूर्ण&amp;nbsp;ह्रदय पटल , सारी  धमनियां , सारा स्नायु तंत्र और एक एक रोम खिल उठे और ख़ुशी से नाचने लगे  तो समझिये प्रफुल्लता की स्थिति उत्पन्न हो गयी है&amp;nbsp;&amp;nbsp;|  प्रफुल्लता&amp;nbsp;को&amp;nbsp;एक&amp;nbsp;उदाहरण&amp;nbsp;से&amp;nbsp;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;समझा&amp;nbsp;जा&amp;nbsp;सकता&amp;nbsp;है | एक युद्ध&amp;nbsp;विधवा,  जो&amp;nbsp;अपने&amp;nbsp;पति को बहुत&amp;nbsp;चाहती&amp;nbsp;थी&amp;nbsp;, दस&amp;nbsp;साल&amp;nbsp;&amp;nbsp;से&amp;nbsp;बैधव्य  का&amp;nbsp;जीवन&amp;nbsp;व्यतीत&amp;nbsp;कर&amp;nbsp;रही&amp;nbsp;थी | अचानक एक&amp;nbsp; रात के&amp;nbsp;दो&amp;nbsp;बजे&amp;nbsp;उसके&amp;nbsp;दरवाजे&amp;nbsp;की&amp;nbsp;सां&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;कल&amp;nbsp;बजती&amp;nbsp;है  और&amp;nbsp;वह&amp;nbsp;दरवाजा&amp;nbsp;खोलने&amp;nbsp;पर&amp;nbsp;उनीदी&amp;nbsp;आँ&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;खों&amp;nbsp;से देखती&amp;nbsp;है कि&amp;nbsp;उसका&amp;nbsp;पति उसके  सामने&amp;nbsp;खड़ा&amp;nbsp;है | उस&amp;nbsp;समय&amp;nbsp;उसकी&amp;nbsp;ख़ुशी&amp;nbsp;का कोई&amp;nbsp;ठिकाना&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp;था | उसका मनस&amp;nbsp;पटल ,  ह्रदय , सारी धमनिया&amp;nbsp;तथा&amp;nbsp;एक एक रोम&amp;nbsp;खिल&amp;nbsp;उठता&amp;nbsp;है | इसे&amp;nbsp;ही  प्रफुल्लता&amp;nbsp;कहते&amp;nbsp;हैं और यह प्रफुल्लता की चरम स्थिति मान सकते हैं | वैसे  प्रफुल्लता का एक पल मात्र को पा सकना व्यक्ति&amp;nbsp;&amp;nbsp;के बस मे नहीं होता&amp;nbsp;है और  अरबो खरबों का धन खर्च करके एक सेकण्ड की प्रफुल्लता को नहीं खरीद&amp;nbsp;&amp;nbsp;सकता |  मनुष्य कितना&amp;nbsp; भी यत्न करके प्रफुल्लता को प्राप्त नहीं कर सकता है | अन्य  व्यक्ति ही&amp;nbsp;अनुग्रह करके हमें प्रफुल्लता&amp;nbsp;दे&amp;nbsp;सकता है अथवा प्रफुल्लता छीन  सकता है अर्थात दूसरों की कृपा व अनुग्रह से ही प्रफुल्लता मिल सकती है |  अब प्रश्न उठता है कि क्या व्यक्ति&amp;nbsp;&amp;nbsp;प्रफुल्लता प्राप्त किये जाने की दिशा  मे कुछ कर सकता है ? उत्तर है हाँ | व्यक्ति दूसरों को प्रफुल्लता देकर  प्रफुल्लता की तरंग&amp;nbsp;&amp;nbsp;उत्पन्न कर सकता हैं , उक्त तरंग अपनी तरंग दैर्घ्य पर  अवस्थित उक्त व्यक्ति से टकराकर समान किन्तु बिरोधी प्रतिक्रिया  स्वरूप&amp;nbsp;व्यक्ति विशेष&amp;nbsp;के&amp;nbsp;&amp;nbsp;पास वापस आ जाती&amp;nbsp;है&amp;nbsp;और हमें स्वतः प्रफुल्लता  मिल&amp;nbsp;जाती है&amp;nbsp;| इस&amp;nbsp;प्रकार&amp;nbsp;व्यक्ति यदि&amp;nbsp;निरन्तर&amp;nbsp;लोगों&amp;nbsp;को प्रफुल्लता  देता&amp;nbsp;रहे&amp;nbsp;तो&amp;nbsp;उसे&amp;nbsp;जीवन मे&amp;nbsp;बराबर&amp;nbsp;प्रफुल्लता मिलती&amp;nbsp;रहेगी&amp;nbsp;और उसका एक  तिहाई&amp;nbsp;जीवन सही&amp;nbsp;व&amp;nbsp;सार्थक माना जा सकता है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जीवन की दूसरी&amp;nbsp;वास्तविक&amp;nbsp;उपलब्धि&amp;nbsp;है नीद&amp;nbsp;| यदि  बिना&amp;nbsp;बहरी&amp;nbsp;कोशिश&amp;nbsp;व&amp;nbsp;प्रयास&amp;nbsp;किये&amp;nbsp;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;व्यक्ति को भरपूर&amp;nbsp;और निर्बिघ्न&amp;nbsp;नीद  आ&amp;nbsp;जाती&amp;nbsp;है तो उसकी जीवन शैली&amp;nbsp;एकदम&amp;nbsp;सही मानी जा सकती&amp;nbsp;है |  शुद्ध&amp;nbsp;चित्त&amp;nbsp;एवं&amp;nbsp;आत्मा&amp;nbsp;वाले उक्त व्यक्ति&amp;nbsp;के&amp;nbsp;मन&amp;nbsp;पर बोझ नहीं होता&amp;nbsp;और उसे  भरपुर&amp;nbsp;नीद आ जाती है | इसके बिपरीत&amp;nbsp;गलत&amp;nbsp;व धोखा&amp;nbsp;धरही करने वाले व्यक्ति को  स्वाभाविक व अपेक्षित&amp;nbsp;नीद मुहैया&amp;nbsp;नहीं होती&amp;nbsp;| इस प्रकार नीद की कसौटी  यह&amp;nbsp;तय&amp;nbsp;करती&amp;nbsp;है कि एक तिहाई जीवन पद्धति व रास्ता&amp;nbsp;सही है अथवा&amp;nbsp;नहीं |  इसी&amp;nbsp;प्रकार मानसिक&amp;nbsp;शांति&amp;nbsp;, जो मानसिक संतुलन&amp;nbsp;की स्थिति होती है , यह  निर्धारित करती है कि व्यक्ति की&amp;nbsp;जीवन पद्धति&amp;nbsp;सही है अथवा नहीं | यदि जीवन  सुख व शांति मय है तो इसका मतलब यही है कि जीवन यापन का तरीका एक तिहाई सही  है |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; इस प्रकार यदि व्यक्ति का जीवन इन तीनो कसौतिओं पर खरा उतरता  है तो व्यक्ति को उसी रस्ते का अनुसरण करना चाहिए जिससे उसको यह तीनो  उपलब्धियां प्राप्त हुई थी | इसके अतिरिक्त जीवन मे कुछ नहीं चाहिए | इसके  लिए किसी गुरु की भी जरुरत नहीं होती है | इसे व्यक्ति को स्वयं ही सीखना  पड़ता है और जिसको सीखने मे कई कई जनम लग सकते हैं l जीवन मे इतना ही पाठ  सीख लेना पर्याप्त भी है | यह जितना सरल है उतना कठिन भी है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम &lt;/span&gt;के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-4012183772496511949?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/4012183772496511949/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/4012183772496511949'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/4012183772496511949'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='जीवन की वास्तविक उपलब्धियां'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-3208693908098008815</id><published>2010-06-28T11:32:00.002+05:30</published><updated>2010-06-28T11:32:54.093+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>उपभोक्ता संस्कृति और आम जनमानस</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px;"&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;व्यक्ति यानि उपभोक्ता की&amp;nbsp; जरुरत रोटी , कपडा ,मकान . शिक्षा&amp;nbsp;,  &amp;nbsp;स्वास्थ्य . मनोरंजन , रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा आदि तक ही सीमित होती  है |&amp;nbsp; सामान्य प्रयासों से इन सीमित&amp;nbsp;आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है  |&amp;nbsp;परन्तु मनुष्य इससे भी&amp;nbsp;संतुष्ट नहीं होता | मनोवैज्ञानिक दृष्टि से  विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य की&amp;nbsp; आवश्यकता जीवन मे&amp;nbsp;संतुष्टि  प्राप्त करना ही है | यही संतुष्टि ही&amp;nbsp;मनुष्य के जीवन की वास्तविक उपलब्धि  होती&amp;nbsp;है , जो जीवन को सुखमय अथवा दुखमय बनाती है | यह पूर्णतया  व्यक्तिनिष्ट&amp;nbsp; और मनुष्य की सोंच पर आधारित होती&amp;nbsp;है | इस दृष्टि से मनुष्य  के लिए वही स्थिति व परिवेश अभीष्ट व हितकर होता&amp;nbsp;है जो उसे संतुष्टि दे सके  और वह सब अवांछित होता है जो उसे संतुष्टि से दूर रखता है | कदाचित इसी  कारण प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जे के मेहता ने अर्थशास्त्र को आवश्यकता  विहीनता की ओर ले जाने वाला शास्त्र बताया था | मेरी समझ मे जे के मेहता&amp;nbsp;की  यह अवधारणा भौतिक , मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्णतया सही  प्रतीत होती है | दूसरे शब्दों मे यदि कहा जाय तो&amp;nbsp; आवश्यकताओं की प्रवृति  असीम की ओर जाने की होती हैं और इन असीम आवश्यकताओं से समायोजन करने की कला  सीखने से ही जीवन मे संतुष्टि व सुख&amp;nbsp;प्राप्त हो सकता है | वैसे हमारे चारो  ओर&amp;nbsp;का परिवेश इसके विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न कर रखी है और यही है आज की  उपभोक्ता संस्कृति | आज मनुष्य अपने को&amp;nbsp;वस्तुतः बाजार मे खड़ा हुआ पाता है  और उसके चारो ओर खरीदने&amp;nbsp;और बेचने के अलावा कुछ&amp;nbsp;और होता हुआ&amp;nbsp;&amp;nbsp;नजर नहीं  आता&amp;nbsp;| प्रिंट और इलेक्ट्रानिक&amp;nbsp; मीडिया मे&amp;nbsp; विज्ञापन के अलावा कुछ खास नहीं  होता , जिसमे सब कुछ बेच देने की होड़ लगी हुई सी प्रतीत होती है | मानव  मनोविज्ञान , संवेग , प्रेरणा एवं प्रवृति को दृष्टिगत रखकर  अत्यधिक&amp;nbsp;आकर्षक&amp;nbsp;&amp;nbsp;विज्ञापन बनाये जाते हैं , जिनका उद्देश्य उपभोक्ता को  रिझाने , बरगलाने तथा प्रेरित करना होता है और उनकी कोशिश जरूरतों को  ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने की होती है | &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;स्त्री का आकर्षण चूँकि संसार मे सर्बाधिक होता है , विज्ञापन  की दुनिया मे&amp;nbsp;स्त्री के रूप और सुन्दरता को विज्ञापन की बस्तु समझ कर इसका  भरपूर उपयोग किया गया है | &amp;nbsp;यहाँ तक पुरुषों के रेजर , आफ्टर शेब और कच्छे  के विज्ञापन मे भी स्त्री का ही उपयोग किया गया है | इस प्रकार आज  की&amp;nbsp;उपभोक्ता संस्कृति&amp;nbsp; मे स्त्री को विज्ञापन की बस्तु बनाकर रख दिया है |  आज की&amp;nbsp;पीढ़ी मेहनत सेबचना&amp;nbsp;व&amp;nbsp;शार्टकट &amp;nbsp;&amp;nbsp;अपनाकर&amp;nbsp;एकदम&amp;nbsp;अमीर बनना&amp;nbsp;चाहती&amp;nbsp;है और  बिना परिश्रम किये थोड़े समय मे सब कुछ प्राप्त कर लेना चाहता है  |&amp;nbsp;ज्योतिषी उसकी इसी&amp;nbsp;भावना का लाभ उठाकर जंत्र&amp;nbsp; तंत्र के उपकरण बेंच रहा है  | आज टेलीविजन के सारे चैनल यहाँ तक न्यूज चैनल तक जोर शोर  से&amp;nbsp;स्काई&amp;nbsp;शापिंग&amp;nbsp;की इस&amp;nbsp;बिधा&amp;nbsp;द्वारा&amp;nbsp;&amp;nbsp;मनुष्य को बेवकूफ बनाने के इस धंधे मे  लगे हुए हैं | माल संस्कृति भी उपभोक्ताबाद को बढ़ावा डे रहा है | खरीददारी  के लिए माल मे जाने पर वहाँ&amp;nbsp;&amp;nbsp;तरह तरह के आकर्षण मिलते हैं | वहाँ व्यक्ति  यदि&amp;nbsp;एक सामान खरीदने के इरादे से&amp;nbsp;जाता&amp;nbsp;&amp;nbsp;है तो वहाँ इस तरह&amp;nbsp;का परिवेश मिलता  है कि व्यक्ति ४ या ५ बस्तुएं ख़रीदे | माल मे बड़े बड़े लुभावने आकर्षण  देखने को मिलते हैं | एक कमीज खरीदें पांच कमीजे मुफ्त पायें जैसे विज्ञापन  देखकर उपभोक्ता खुश हो जाता है कि जैसे उसने माल को लूट लिया हो , जबकि  उपभोक्ता ही&amp;nbsp;माल के लूट&amp;nbsp;&amp;nbsp;के चक्रव्यूह मे बस्तुतः फंस कर रह&amp;nbsp;जाता है | इस  प्रकार माल मे भी व्यक्ति को बेवकूफ बनाने का ही गोरख धंधा चल रहा होता है  |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; फिल्मस्टार और क्रिकेट स्टार लाखों करोंड़ों कीमत लेकर  झूंठे किन्तु मनभावन विज्ञापन से लोगों को गुमराह करते&amp;nbsp; हैं और धन लोलुपता  के कारण उनका जमीर शायद मर गया&amp;nbsp;सा प्रतीत&amp;nbsp;होता&amp;nbsp; है | विज्ञापनों&amp;nbsp;&amp;nbsp;के&amp;nbsp;&amp;nbsp;कारण  व्यक्ति&amp;nbsp;फिजूलखर्ची&amp;nbsp;का&amp;nbsp;शिकार&amp;nbsp;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;बन&amp;nbsp;जाता&amp;nbsp;है&amp;nbsp;और&amp;nbsp;प्रायः&amp;nbsp;हीनभावना&amp;nbsp;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;से&amp;nbsp;पीड़ित&amp;nbsp;रहता&amp;nbsp;है  | इस&amp;nbsp;सब&amp;nbsp;का एकमात्र&amp;nbsp;समाधान&amp;nbsp;यही है कि&amp;nbsp;व्यक्ति&amp;nbsp;को&amp;nbsp;अपनी&amp;nbsp;आवश्यकताओं&amp;nbsp;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;पर&amp;nbsp;नियंत्रण&amp;nbsp;करके&amp;nbsp;उन्हें&amp;nbsp;सीमित&amp;nbsp;&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;रखना&amp;nbsp;चाहिए&amp;nbsp;और  पूरे&amp;nbsp;परिवार&amp;nbsp;को यही संस्कार&amp;nbsp;देना&amp;nbsp;चाहिए , ताकि जीवन rकी मूलभुत उपलब्धि  संतुष्टि&amp;nbsp; को&amp;nbsp; वह प्राप्त&amp;nbsp; कर&amp;nbsp; सके&amp;nbsp; | &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Times New Roman'; font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Times New Roman'; font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-3208693908098008815?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/3208693908098008815/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/06/blog-post_28.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3208693908098008815'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3208693908098008815'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/06/blog-post_28.html' title='उपभोक्ता संस्कृति और आम जनमानस'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-3882790531381349496</id><published>2010-06-22T13:20:00.000+05:30</published><updated>2010-06-22T13:20:36.044+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>फादर डे , पिता के दायित्व और अनुशासन हीनता का परिदृश्य</title><content type='html'>&amp;nbsp;२० जून को &amp;nbsp;पिता दिवस यानि फादर् डे मनाया जाना पाश्चात्य संस्कृति की देन है | यह बहुत अच्छी बात है और अच्छी बातों का अनुकरण किया जाना और भी अच्छी बात है | भारत मे भी पितर पक्ष प्रतिवर्ष १५ दिवसों तक मनाया जाता है , जिसमे मृत माता पिता तथा समस्त पूर्बजों को उनकी मृत्यु की &amp;nbsp;तिथियों पर स्मरण करके उनको तर्पण दिया जाता है | अपने पिता को उनके जीवन काल मे एक दिन समर्पित किये जाने की विदेशियों की इस अच्छी परंपरा को अपनाना बहुत अच्छी बात है और अपने बेटे बेटियों द्वारा फादर् डे पर अतिरिक्त प्यार व सम्मान &amp;nbsp;पा कर हर एक पिता को अच्छा लगना भी स्वाभाविक है , पर पितर पक्ष की अपनी गौरवशाली भारतीय परंपरा को पूरी सघनता से याद रखकर अपनाना भी इससे अधिक आवश्यक प्रतीत होता है | मुझे भी आज अपनी बेटी , &amp;nbsp;बेटा व बहू की शुभकामना प्राप्त करके तथा अपने प्रति उनके मनोभाव देख कर काफी ख़ुशी मिली , पर इसके साथ ही यह विचार भी मन मे कौंधा कि काश मेरे बच्चे इस अत्यधिक सुखकारी किन्तु विदेशी परंपरा का अनुसरण करने के साथ साथ पितर पक्ष की अपनी भारतीय किन्तु अत्यधिक गौरवशाली परंपरा को भी स्मरण रखते &amp;nbsp;और उसे भी फादर डे की तरह समझते और अपनाते | यह बात मेरे बच्चों के साथ साथ देश के तमाम बच्चों पर भी लागू होती है | पर इस स्थिति के लिए बच्चों से ज्यादा माता पिता ही अधिक जिम्मेवार हैं , जिन्होंने अपने बच्चों को ऐसे संस्कार नहीं दिए और न ही अपने आचरण द्वारा कोई अनुकरणीय प्रदर्शन प्रभाव ही उत्पन्न किया | अतयव पिता वर्ग को इस सम्बन्ध मे आत्म विवेचन करना चाहिए और इस सम्बन्ध मे अपने दायित्व का संज्ञान लेना चाहिए | ताकि आगामी पितर पक्ष एवं फादर डे को और अधिक सार्थक ढंग से मनाया जा सके |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; फादर डे के दिन को पिता वर्ग को अपने दायित्व के सम्बन्ध मे गंभीरतापूर्वक आत्म विश्लेषण व आत्म चिंतन करने के अवसर के रूप मे लेना चाहिए | आज बच्चों मे अपने पिता के प्रति पहले की पीढ़ियों की तरह सम्मान व आज्ञाकारिता का भाव देखने को नहीं मिलता और बच्चों पर अनुशासनहीनता तथा अवज्ञाकारिता का आरोप अलग से लगा दिया जाता है , जबकि बस्तुस्थिति पूर्णतया इसके बिपरीत है | बस्तुतः अनुशासनहीन बच्चा व क्षात्र नहीं होता ,वरन अनुशासनहीन पिता व अध्यापक होता है | यह बात सभी को कडवी व अटपटी तो जरुर लगेगी , पर यह बात सोलह आने सच है | वरिष्ट के निर्देशों का कनिष्ट द्वारा स्वयमेव अनुपालन किया जाना ही अनुशासन है | यहाँ स्वयमेव शब्द बहुत प्रासंगिक एवं सार्थक है | वरिष्टता का निर्धारण भी आयु के बजाय गुणों के आधार पर होता है | सत , &amp;nbsp;रज , तम &amp;nbsp;के तीनो गुणों मे सतोगुण सर्ब श्रेष्ट है , रजोगुण उससे निम्नतर और तमोगुण निम्नतम है | इन गुणों का सम्बन्ध भोजन से जुड़ा हुआ है , अर्थात जैसा भोजन होगा वैसा ही गुण उप्पन्न होगा | शिशु जब तक दूध यानि सात्विक भोजन लेता है , तब तक वह सत्व गुण संपन्न यानि सबसे शक्तिशाली होता है | इसी कारण लोग उसके कमांड व निर्देशों का स्वयमेव पालन करते हैं और समस्त रजो व तमोगुणी शक्तियां उससे पराभूत रहती हैं | सांप व शेर बच्चे के पास पहुँच कर भी बच्चे को कोई नुकसान पहुंचाए बिना निकल जाता है , क्योंकि बच्चे की सात्विक शक्तियों से उनकी तामसिक शक्तियां पराभूत हो जाती &amp;nbsp;हैं | ऐसा भी होता है कि बच्चे का रोना सुनकर राहगीर स्वचालित ढंग से अनजाने घर मे घुस जाता है , बिना यह परवाह किये कि वह अपने इस कृत्य के कारण अपराधी करार किया जा सकता है | कुछ दिनों के पश्चात् उक्त शिशु दूध के साथ साथ अनाज यानि राजसिक भोजन करने लगता है और उसमे रजोगुण यानि क्रियाशीलता का प्रादुर्भाव होता है , किन्तु धीरे धीरे उसमे सत्व गुण की कमी होती जाती है | इस प्रकार बच्चे मे सत्वगुण कम होकर रजोगुण की उत्तरोत्तर बृद्धि की प्रवृति दृष्टिगोचर होती प्रतीत होती &amp;nbsp;है और बच्चा निरन्तर क्रियाशील किन्तु अध्यात्मिक पैमाने पर शक्तिहीनता की ओर प्रयाण करता &amp;nbsp;हुआ प्रतीत होता है | जवानी तक रजोगुण यानि क्रियाशीलता बढती रहती है और इसके बाद रजोगुण के ह्राश एवं तमोगुण के बढ़ने की प्रवृति का कालखंड आ जाता &amp;nbsp;है | बुढ़ापे मे तो सतोगुण बहुत कम हो जाता है , रजोगुण यानि क्रियाशीलता तो स्वतः कम होती जाती &amp;nbsp;है और जीवन के इस कालखंड मे &amp;nbsp;तमोगुण पूर्णतया हावी रहता है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; उपरोक्त विश्लेषण से यह स्वतः स्पष्ट होता है कि बच्चा व क्षात्र पिता व अध्यापक से अधिक शक्तिशाली होता है और उसके कमांड व निर्देशों का पालन पिता व अध्यापक का स्वाभाविक दायित्व होता है और इसके लिए पिता व अध्यापक को पूर्णतया तैयार एवं तत्पर होना चाहिए &amp;nbsp;| यदि पिता और अध्यापक बच्चे व क्षात्र की अपेक्षाओं को अच्छी तरह समझ कर उस पर ध्यान नहीं देते हैं और उसके बिपरीत आचरण करते हैं &amp;nbsp;तो वे ही अनुशासनहीन माने जायेंगे | वे दोनों उपरोक्तानुसार सही तथ्यों से अनजान रहकर कभी कभी बल प्रयोग का आलंबन तक ले लेते हैं | शक्ति का आगार होने के कारण &amp;nbsp;बच्चा व क्षात्र कभी कभी इस बल प्रयोग के विरुद्ध आक्रोशित हो उठता &amp;nbsp;हैं , जिसे अनजान लोग अनुशासन हीनता का नाम डे देते हैं , जबकि यह अनुशासन हीनता न होकर अनुशासनहीन लोगों द्वारा किये गए बल प्रयोग के बिरुद्ध उनके आक्रोश का अभिप्रकाशन मात्र है | इस तथ्य को शिक्षा जगत एवं परिवार की संस्था को भलीभांति समझाना चाहिए | तभी हम स्वस्थ परिवेश मे जिम्मेदार एवं उपयोगी समाज के निर्माण मे अपनी अपनी भूमिका का सम्यक निर्वहन कर सकेगें और तब जनरेशन गैप , आज्ञाकारिता एवं अनुशासनहीनता की समस्या का सम्यक समाधान हो सकेगा |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;अब हम पिता की स्थिति को लेते हैं | पिता को दयालु तानाशाह के रूप मे होना चाहिए , जबकि मा करुणा , प्रेम &amp;nbsp;व दयालुता की प्रतिमूर्ति होती है , इसीलिए बच्चा मा के आँचल मे मे अपने को पूर्णतया सुखी व सुरक्षित पाता है और वह मा से बिलकुल नहीं डरता | इसके बिपरीत बच्चा पिता से उसकी करुणा व प्रेम का संरक्षण तो पाता ही है , पर उसके कड़े अनुशासन से डरता भी है कि यदि उसने गलत आचरण किया तो पिता उसे दण्डित करेगा | मा बाप मे यही अंतर होता है | शान व्यवस्था को भी पिता की तरह कठोर किन्तु दयालु यानि बेनीवेलेंट डिक्टेटर जैसा होना चाहिए |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;&lt;a href="http://apnabundelkhand.com/"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम&lt;/a&gt; के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-3882790531381349496?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/3882790531381349496/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/06/blog-post_22.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3882790531381349496'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/3882790531381349496'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/06/blog-post_22.html' title='फादर डे , पिता के दायित्व और अनुशासन हीनता का परिदृश्य'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-629816766556372590</id><published>2010-06-01T10:04:00.000+05:30</published><updated>2010-06-01T10:04:37.395+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय'/><title type='text'>सामान्य संवेग से राष्ट्र निर्माण</title><content type='html'>राष्ट्र का आधार क्या होता है - निश्चित भूभाग वाला भौगोलिक क्षेत्र , मजहब &amp;nbsp;, भाषा , पहनावा , रहन सहन आदि | मजहब यदि राष्ट्र का आधार होता तो पूरा यूरोप व अमेरिका सहित इसाई मजहब को मानने वालो का एक ही राष्ट्र होता | इसी तरह मुस्लिम मजहब मानने वाले तमाम लोग अलग अलग देशो के बजाय एक ही राष्ट्र का हिस्सा होते | यदि भाषा राष्ट्र का आधार होता तो अंग्रेजी भाषियों का एक ही और सबसे बड़ा राष्ट्र होता | &amp;nbsp;इसी प्रकार भौगोलिक क्षेत्र , खान पान , पहनावा और रहन सहन भी राष्ट्र का आधार नहीं होता | अब प्रश्न उठता है कि जब उपरोक्त मे से कोई राष्ट्र का आधार नहीं है तो वास्तव मे &amp;nbsp;राष्ट्र का आधार क्या है ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;वास्तव मे सामान्य संवेग (कामन सेंटिमेंट )राष्ट्र का आधार होता है | राष्ट्र तभी होता है , जब यह सामान्य संवेग विद्यमान &amp;nbsp;होता है &amp;nbsp;, अन्यथा राष्ट्र विहीनता की स्थिति &amp;nbsp;होती है | अब हम इस राष्ट्र निर्माण क़ी प्रक्रिया को इतिहास के परिप्रेक्ष्य मे देखना है | बाहर से आने वाले आर्यों ने यहाँ के मूल निवासियों पर आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास किया और मूल निवासियों को उपेक्षा भाव से अनार्य कहा | आर्यो द्वारा अनार्यो पर अत्याचार करना शुरू किया , जिसके फलस्वरूप आर्य विरोधी संवेग उत्पन्न हुआ था और इस सामान्य संवेग के कारण भारत पहली बार राष्ट्र बना था | राष्ट्र निर्माण का यही वह समय होता है जब देश मे चतुर्दिक विकास होता और हुआ है | कालांतर मे आर्य भारतीय समाज का अंग बन गए और अनार्य भी इसी समाज मे संविलीन हो गये और आर्य अनार्य का अंतर भी समाप्त हो गया | अतयव इस पर आधारित आर्य विरोधी सामान्य सामान्य संवेग भी स्वतः समाप्त हो गया था | इससे राष्ट्र विहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है | यह सबसे घातक एवं खतरनाक स्थिति होती है और इस राष्ट्र हीनता के शून्य काल मे विदेशी आक्रमण और अधिपत्य की स्थितिया उत्पन्न होती है | सौभाग्य की स्थिति यह रही कि इस राष्ट्र विहीनता की स्थिति मे विदेशी आक्रमण तो नहीं हुआ , पर देश के भीतर से ही वैचारिक आक्रमण अवश्य हुआ और वह था बौद्ध धर्म का तीव्रता से उदय होना | यह बौद्ध धर्म पूरे देश मे फैला और इसको राज्याश्रय भी प्राप्त हुआ | राज्याश्रय पाने के बाद जोर जबरदस्ती का दौर शुरू हुआ और गैर बौद्धों के ऊपर अत्याचार होने लगा , जिसके फलस्वरूप लोग बौद्ध और गैर बुद्ध दो खेमे मे बट गए | परिणामतः बुद्धबाद विरोधी सामान्य संवेग उत्पन्न हुआ और इस सामान्य संवेग के कारण भारत दुबारा राष्ट्र बना | इस दौरान भारत अत्यधिक शक्ति शाली बन गया था और &amp;nbsp;देश मे पुनः चतुर्दिक प्रगति हुई | कालांतर मे बौद्ध धर्म कमजोर हुआ और इसके साथ राज्याश्रय भी नहीं रहा | ऐसी स्थिति मे बौद्ध धर्म विरोधी सामान्य संवेग बने रहने की सम्भावना नहीं रही और देश मे दुबारा राष्ट्र विहीनता की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी | इस राष्ट्र विहीनता की स्थिति मे विदेसी (मुस्लिम) आक्रमण हुआ और मुस्लिम बर्चस्व कायम हुआ | इन विदेसी आक्रमण कर्ताओं द्वारा यहाँ के निवासियों के ऊपर अत्याचार के कारण मुस्लिम विरोधी सामान्य संवेग की स्थितिया उत्पन्न हुई , जिसके फलस्वरूप देश मे तीसरी बार राष्ट्र बना और शक्ति शाली भारत मे &amp;nbsp;इस दौरान देश का चतुर्दिक विकास हुआ | अकबर की दीन ए इलाही और सर्ब धर्म समभाव की नीति के कारण मुस्लिम विरोधी सामान्य संवेग समाप्त हो गया और इसी कारण राष्ट्र विहीनता की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी | इस सामान्य संवेग की रिक्तता के काल मे अंग्रेज आये और उन्होंने अपना बर्चस्व कायम तो किया ही , शोषण की पराकाष्टा पर पहुँच गए | अतयव ब्रिटिश शोषण विरोधी सामान्य संवेग उत्पन्न हुआ | पूरा देश धर्म , जाति , विचारधारा ,क्षेत्रीयता &amp;nbsp;आदि को भूलकर इस सामान्य संवेग से सम्बद्ध हो गए और यही ब्रिटिश बिरोधी सामान्य &amp;nbsp;संवेग ही पूरे देश की एकता का आधार बना था | यही सामान्य संवेग ने एक बार पुनः भारत को राष्ट्र बनाया था और इसके कारण ही हमें आजादी मिली थी | इस प्रकार भारत को स्वतन्त्र कराने मे इस इस सामान्य संवेग की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका रही थी और इसी सामान्य संवेग ने पूरे देशवासियों को अपने सारे मतभेदों को भुलाकर एक साथ कंधे से कन्धा मिलाकर जोड़ा था और यदि एक ही तथ्य को आजादी की लडाई मे सफलता हेतु जिम्मेदार मानने की बात हो तो वह तत्व सामान्य संवेग ही है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; आजादी मिलने के बाद अंग्रेज भारत से चले गए थे , अतयव अंग्रेजो के विरोध पर आधारित सामान्य संवेग भी समाप्त हो गया | इस प्रकार देश पुनः राष्ट्र विहीनता की स्थिति मे पहुँच गया था | इसके फलस्वरूप १९६२ मे चीन का आक्रमण हुआ था | युद्ध काल मे चीन विरोधी सामान्य संवेग उत्पन्न हुआ था , जिसके फलस्वरूप उत्पन्न भावनात्मक एकता के कारण हमने चीन को मुहकी खाने को मजबूर किया था और हम तीसरी बार गुलाम होने से बच गए थे | चीन युद्ध के बाद चीन विरोध पर आधारित सामान्य संवेग भी स्वतः समाप्त हो गया था | ऐसी स्थिति मे एक बार पुनः राष्ट्र विहीनता की स्थिति उत्पन्न हुई थी और इस स्थिति मे मे हमें १९६५ और १९७१ मे पाकिस्तान का आक्रमण झेलना पड़ा था | उस समय पाकिस्तान विरोधी सामान्य संवेग उत्पन्न हुआ था , जिसने हमें सफलता दिलाई थी | इन युद्धों के बाद पाकिस्तान विरोधी सामान्य संवेग स्वतः समाप्त हो गया था और तभी से हम राष्ट्र विहीनता के गंभीर संकट के दौर से गुजर रहे हैं | यदि हम अपने उपरोक्तानुसार अतीत और इतिहास से सीख लेकर आसन्न संकट बचना चाहते हैं तो हमें कोई न कोई सामान्य संवेग अवश्य ईजाद करना होगा | कमसे कम हमें इस सामान्य संवेग की अपरिहार्यता एवं महत्त्व को तो अवश्यमेव समझना होगा | यह हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य है की हम इस महत्वपूर्ण तथ्य की तह मे नहीं पहुँच पाये हैं | जबकि हमारा पडोसी देश पाकिस्तान इस सामान्य संवेग के महत्व को तो पूरा पूरा समझता है ही , समय समय पर इसका लाभ भी उठाता रहा है | तभी तो दो बार भारत से युद्ध लड़ चुका है और &amp;nbsp;युद्ध की सी स्थिति पैदा कर भारत विरोधी सामान्य संवेग निरन्तर उत्पन्न कर रखा है | वैसे पाकिस्तान की स्थतियाँ इतनी ख़राब है कि भारत विरोधी संवेग के बगैर पाकिस्तान एक दिन भी नहीं रह सकता है और पाकिस्तान &amp;nbsp;को टूटने से कोई नहीं बचा सकता | पाकिस्तान को जब भी अपने अंदरूनी हालात पर खतरा मडराता महसूस होता है और ऐसी दशा मे उसके अस्तित्व पर ही गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाता है , पाकिस्तान जोर शोर से भारत बिरोधी अभियान छेड़ देता है और भारत विरोधी सामान्य संवेग के फलस्वरूप पाकिस्तान लोगो का ध्यान मूल समस्या से हटाने मे सफल हो जाता है | इस प्रकार सोची समझी सुनुयोजित रणनीति के तहत पाकिस्तान ऐसा करता आया है | &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; उपरोक्त विवेचन से यह स्पस्ट है कि हमें भी पाकिस्तान की तरह सामान्य संवेग की महत्ता को समझना चाहिए | इसका यह तात्पर्य नहीं लगाना चाहिए कि हमें पाकिस्तान पर हमला बोल देना चाहिए | भारत और पाकिस्तान की परिस्थितिया भिन्न है और भारत के सामने पाकिस्तान जैसी कोई मज़बूरी भी नहीं है | चूँकि सामान्य संवेग नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह के हो सकते हैं | अतएव भारत को सकारात्मक संवेग की आवश्यकता है , जिसकी तलाश कर लागू किया जाना चाहिए | नकारात्मक संवेग प्रतिक्रियाबादी होते हैं , जिनका प्रभाव क्षणिक होता है और प्रतिक्रिया का तत्व समाप्त होते ही उस पर आधारित सामान्य संवेग स्वतः तिरोहित हो जाता है | सकारात्मक संवेग का प्रभाव स्थायी होता है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;&lt;a href="http://apnabundelkhand.com/"&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम&lt;/a&gt; के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-629816766556372590?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/629816766556372590/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/06/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/629816766556372590'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/629816766556372590'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='सामान्य संवेग से राष्ट्र निर्माण'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-8824327168442811923</id><published>2010-05-31T09:41:00.000+05:30</published><updated>2010-05-31T09:41:10.623+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>राष्ट्रीय एकता और जाति आधारित जनगणना</title><content type='html'>इस&amp;nbsp; समय राष्ट्रीय एकता एवं कौमी एकजहती का बोलबाला है | इस सम्बन्ध मे जगह जगह अनेकानेक जलसे , सेमिनार एवं सम्मलेन आये दिन होते हुए दिखाई पड़ते हैं | जबकि ऐसे आयोजनकर्ताओ को यह तक नहीं पाता होता कि राष्ट्रीय एकता और कौमी एकजहती के असली मायने क्या होते हैं ? राष्ट्रीय एकता किन तत्वों से व कैसे आती है और कौन से तत्व इसे समाप्त कर देते हैं या नुकसान पहुंचाते हैं ? ऐसे आयोजनों मे कदाचित उन बिन्दुओं पर चर्चा तक नहीं हो पाती है , जिनसे वस्तुतः राष्ट्रीय एकता बनती है|&amp;nbsp; ऐसे आयोजन&amp;nbsp; राष्ट्रीय एकता के परिप्रेक्ष्य मे शायद ही कोई योगदान दे पाते है |&amp;nbsp; इन्ही&amp;nbsp; बिन्दुओं से मै अपनी बात शुरू करना चाहता हूँ |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; भारत विषमताओ का देश है और तमाम विषमताओ के बावजूद यहाँ एकता के मजबूत सूत्र भी विद्यमान हैं | अर्थात देश मे समता और विषमता दोनों तरह के बिंदु मौजूद हैं | मजहब , भाषा , खानपान , पहनावा , जाति और क्षेत्रीयता आदि विषमता के बिंदु हैं | भारत मे दुनिया के लगभग सभी मजहबों के लोग रहते हैं और सभी धर्मावलम्बी अपनी पूजा अर्चना करने मे पूर्ण स्वतन्त्र हैं | इसी प्रकार भारत अनेक भाषाभाषियों का देश है | गाँव गाँव मे बानी बदले कुएं कुएं पर&amp;nbsp; पानी की कहावत भारत पर पूर्णतया चरितार्थ है | अलग अलग जगहों पर बानी अर्थात भाषा के बदलने की प्रवृति है | अलग अलग जगहों मे मानव स्वभाव एवं आदत के कारण खानपान मे अंतर की स्थिति देखने को मिलती है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;पहनावा भी स्थानीय जरुरत एवं प्रवृति के अनुसार होता है | भारतीय परिवेश मे जाति और क्षेत्रीयता आदि मे अंतर होना भी स्वाभाविक होता है | विषमता के यह बिंदु अनिवार्यता&amp;nbsp; बरक़रार रहेंगे ही , जरुरत बस इतनी है कि इनके प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण अपनाया जाय , ताकि राष्ट्रीय एकता के परिप्रेक्ष्य मे इनसे संभावित क्षति को रोककर इनका लाभ लिया जा सके | वस्तुतः इन विषमता के बिन्दुओ पर बल देने के बजाय उन्हें नजरंदाज करना ही सर्बहितकारी होता है | इसी सिद्धांत का पालन करने से राष्ट्रीय एकता को बढावा मिलेगा |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; इसी प्रकार समानता के कतिपय बिंदु हैं , जिनपर निरन्तर बल दिए जाने की आवश्यकता है | समानता के यही बिंदु हमारी भावनात्मक एकता के मुख्य आधार होते हैं और यही पूरे देशवासियों को एकता के सूत्र मे पिरो कर रखते है | राष्ट्रीय एकता के सम्मेलनों व जलसों तथा कौमी एकता सम्बन्धी कार्यक्रमों मे इन्ही समता मूलक बिन्दुओं पर बल दिया जाना चाहिए और इन्ही बिन्दुओं&amp;nbsp; तक चर्चा को सीमित रखना चाहिए | तभी हम अपनी राष्ट्रीय एकता को मजबूत बना सकते हैं | इसके ठीक बिपरीत ऐसे जलसों मे उन्ही बिन्दुओ पर बल दिए जाते हैं , जो विषमता मूलक होने के कारण यह हमारी राष्ट्रीय एकता के लिए घातक ही सिद्ध होते हैं | इन जलसों के आयोजको को सामान्यतया यह तक नहीं पाता होता कि राष्ट्रीय एकता कैसे आती है और इसे बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए | अतयव ऐसे अति संवेदनशील प्रकरण मे पूरी सतर्कता बरतना आवश्यक है | &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हमने क्षेत्रीयता एवं भाषा को बल देते हुए भाषा के आधार पर राज्यों का गठन कर लिया | यह स्वतन्त्र भारत की सबसे बड़ी गलती थी और&amp;nbsp;&amp;nbsp; इस निर्णय ने राष्ट्रीय एकता को बहुत कमजोर किया | खैर जो हो गया सो हो गया , हमें अब से भाषा पर बल देना बंद कर देना चाहिए और यह संकल्प लेना चाहिए कि कम से कम अब तो हमें भाषाई मुद्दों को नहीं उठाना चाहिए | इसे हमारी पिछली गलतियों के परिप्रेक्ष्य मे प्रायश्चित मानना चाहिए | यहाँ मै पुनः इस बात पर बल देना चाहूँगा कि भाषा हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम है और मातृभाषा तो हम मा के दूध के साथ संस्कार के रूप मे प्राप्त करते हैं | जैसे हम अपनी मा के प्रति कृतग्य रहकर मा की आजीवन सेवा करते हैं , उसी प्रकार का भाव अपनी मातृभाषा के प्रति होना चाहिए और हमें मातृभाषा की आजीवन सेवा करनी चाहिए | पर अतिशय मातृभाषा प्रेम मे भारत माता का कोई अहित नहीं होना चाहिए और यदि हमारे पुर्बजो द्वारा कोई गलती हो गयी है तो इसका भूल सुधार हमें ही करना होगा | हमारे नेताओं की पहली और सबसे बड़ी गलती थी मजहब के आधार पर देश का बटवारा किया जाना | जिसकी पीड़ा भारत और पाकिस्तान के अधिकांश लोगो को आज भी कष्ट देती रही है और आगे सदियों तक कष्ट देती रहेगी |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;आज राष्ट्रीय एकता के परिप्रेक्ष्य मे हम दूसरी सबसे बड़ी गलती दोहराने जा रहे है | वह है जाति , जो विषमता का कारक तत्व है , पर बल दिया जाना | जैसा पहले कहा जा चुका है ,&amp;nbsp; विषमता के बिन्दुओं पर बल देने के बजाय हमें इन्हें नजरंदाज करना चाहिए | इससे राष्ट्रीय एकता को सबसे ज्यादा नुकसान होता है और ऐसा हो भी चुका है | अतः जाति आधारित जनगणना कराना उपरोक्तानुसार स्वतन्त्र भारत की दूसरी बार होने वाली सबसे बड़ी गलती होने जा रही है | ऐसा कराना राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत घातक एवं आत्महत्या के समान सिद्ध होगा | आज हर राजनितिक दल मे जातिगत गणित को चुनाव मे टिकट देते समय देखा जाता है | परन्तु आज हमें यह देखना चाहिए कि जाति पर आधारित जनगणना कराने की मांग कराने वाले कौन लोग हैं और ऐसी मांग करने के पाछे उनकी मंशा&amp;nbsp; क्या है ? क्या ऐसा कराना राष्ट्रीय एकता के लिए हितकर होगा ? कुछ दलों तथा लोगो द्वारा समाज मे जतिबाद का जहर बोकर समाज को विषाक्त कर रखा गया है और जातिबाद का सहारा लेकर राजनीति की अपनी रोटी सेंक रहे हैं | महाराष्ट्र मे राज ठाकरे का उदाहरण सामने है जो भाषाई जहर की खेती बारी कर रहे हैं | इससे वो कौन सी फसल उगाना चाहते हैं , यह वही जाने ? जाति आधारित जनगणना होने के बाद देश के अलग अलग हिस्सों मे न जाने कितने राजठाकरे उत्पन्न हो जायेगे | ऐसी स्थिति मे हम कल्पना कर सकते हैं कि राष्ट्रीय एकता कितनी रह पायेगी और यह अकेले राष्ट्रीय एकता को क्षति पहुचने वाला सबसे बड़ा कदम सिद्ध होगा |&amp;nbsp; अतः सरकार को इस अति संवेदनशील मुद्दे पर सुविचारित व दूरदर्शी निर्णय लेना चाहिए ,&amp;nbsp; ताकि यह भारत की सबसे बड़ी भूल न बनने पाये |&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-8824327168442811923?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/8824327168442811923/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/05/blog-post_31.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/8824327168442811923'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/8824327168442811923'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/05/blog-post_31.html' title='राष्ट्रीय एकता और जाति आधारित जनगणना'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-9211685110055624593</id><published>2010-05-28T11:00:00.001+05:30</published><updated>2010-06-03T10:26:35.272+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पर्यावरण'/><title type='text'>नदियों पर बांध निर्माण के हानि लाभ की गणित</title><content type='html'>नदियों पर बांध निर्माण करना विकास का सूचक माना जाता है | यह कदाचित इसलिए माना जाता है कि बांध बनाकर हम नदी के जल को रोककर जलाशय मे एकत्र कर लेते हैं , जिससे जलविद्युत् बनायीं जाती है और नहरे बनाकर सिचाई हेतु खेतो को पानी उपलब्ध कराया जाता है | इन दो लाभों की बिना पर हम बांध निर्माण को विकास का मानक समझ बैठते हैं&amp;nbsp;| भाखड़ा नांगल और रिहंद आदि अनेक बाँधों को इसी कारण बिकास का पर्यायवाची समझा जाता है | जबकि वास्तविकता इसके बिलकुल बिपरीत होती है , क्योंकि हमारी संकुचित बुद्धि केवल लाभ ही देख पाती है और उक्त लाभ को पाने हेतु दी गयी कीमत की तरफ हमारी नजर नहीं जाती है &lt;br /&gt;बस्तुतः लाभ लागत अनुपात की कसौटी पर प्रत्येक परियोजना की संरचना की जानी चाहिए &lt;br /&gt;इस प्रकार बांध निर्माण सबंधी समस्त परियोजनाओं की संरचना के समय सबसे जरुरी लागत का ध्यान ही नहीं रखा गया प्रतीत होता है | तभी बाँध निर्माण संबंधित समस्त योजनायें , जिन्हें बरदान समझा गया था , वस्तुतः अभिशाप साबित हुयी है |&lt;br /&gt;बांध के जलाशय मे पानी भरने के उद्देश्य से नदी के प्रवाह को हम सामान्यतया अवरुद्ध कर देते हैं | ऐसी स्थिति मे एक तरह से नदी की हत्या हो जाती है , परिणामतः नदी एक नाला बन कर रह जाती है | नदी मे प्रवाह के साथ पानी न आने के कारण काफी बालू व सिल्ट , जिसे बांध बनने से पहले का नदी का तेज बहाव अपने साथ बहा ले जाता था , नदी के पेटे मे जमा हो जाता था | जिससे नदी की जल धारक क्षमता उत्तरोत्तर घटती जाती है &lt;br /&gt;इस प्रकार २० लाख क्यूसेक जल धारक क्षमता वाला उक्त नदी की जल धारक क्षमता घटते घटते दस साल मे २ लाख क्यूसेक ही रह जाती है | जबकि बांध को टूटने से बचाने के लिए ५० और कभी कभी १०० लाख क्यूसेक पानी छोड़ने की मज़बूरी आ जाती है | इससे भीषण बाढ़ और तबाही की बिभीषिका झेलना पड़ता है | इससे होने वाला नुकसान बांध से उत्पन्न होने वाली बिजली तथा नहर के पानी से मिलने वाले लाभ का कई (सैकड़ो) गुना अधिक होता है | बाढ़ से होने वाली छति एवं लोगो को होने वाली असुविधाओं के दृष्टिगत यह बाँध परियोजना बहुत बड़े घटे का सौदा साबित होती है |&lt;br /&gt;नदी प्रकृति का महत्वपूर्ण अंग है और प्रकृति अपने ऊपर नियंत्रण करके पालतू बनाये जाने सम्बन्धी प्रयास को किसी दशा मे बर्दास्त नहीं कर सकती है और प्रकृति द्वारा अपने गुस्से का इजहार बाढ़ आदि के रूप मे करना भी स्वाभाविक है | अतः मानव प्रयासों द्वारा प्रकृति को गुलाम बनाये जाने की कार्यवाही किसी भी दशा मे नहीं की जानी चाहिए , ताकि प्रकृति के क्रोध का सामना करने की नौबत न आवे | पिछली भूलो का सुधार करने के बजाय हमारी सरकारें नदियों को जोड़ने की योजना बना रही थी जो पहले की गयी भूल की तुलना मे बहुत बड़ी भूल है &lt;br /&gt;मनुष्य को चाहिए कि वह प्रकृति के अनुकूल आचरण करते हुए प्रकृति का आशीर्वाद व बरदान प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए | &lt;br /&gt;बुंदेलखंड मे नदियों के बजाय प्राकृतिक जल श्रोतो पर आधारित बाँध परियोजनाएं बनाकर लागू की जा रही हैं &lt;br /&gt;अतयव उपरोक्तानुसार अनुभव के आधार पर पुनर्समीक्षा की जानी चाहिए | गुंता बाँध व रसिन बाँध सहित प्राकृतिक जल श्रोतो पर निर्भर बांधो को इस दृष्टि से देखे जाने की आवश्यकता है कि हमारी अधिक प्राथमिकता पीने के पानी की है अथवा सिचाई के लिए पानी की है | मेरी राय मे प्राकृतिक जल श्रोतो पर आधारित परियोजना पेयजल न कि सिचाई क़ी होनी चाहिए | वर्षा ऋतु मे बरसाती झरनों पर आधारित जल विद्युत् परियोजना पर भी विचार किया जा सकता है | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-9211685110055624593?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/9211685110055624593/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/05/blog-post_28.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/9211685110055624593'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/9211685110055624593'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/05/blog-post_28.html' title='नदियों पर बांध निर्माण के हानि लाभ की गणित'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-4715904147447147829</id><published>2010-05-27T10:07:00.000+05:30</published><updated>2010-05-27T10:07:10.525+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्य'/><title type='text'>बुंदेलखंड मे पर्यटन उद्योग</title><content type='html'>कुछ समय पहले पर्यटन को उद्योग का दर्जा प्राप्त हो गया था | हमें समझना चाहिए कि पर्यटन उद्योग&amp;nbsp; मे रोजगार श्रृजन की अपार&amp;nbsp; संभावनाएं है | बेरोजगारी बुंदेलखंड&amp;nbsp; क्षेत्र की बहुत बड़ी समस्या है&amp;nbsp; और बेरोजगारी की समस्या का बहुत कुछ समाधान पर्यटन उद्योग&amp;nbsp; से होना संभव है | अतयव यहाँ&amp;nbsp; पर्यटन को इस दृष्टि से देखने की जरुरत है | बुंदेलखंड पर्यटन की दृष्टि से संभवतः देश का सबसे धनी हिस्सा है | बुंदेलखंड मे पर्यटन स्थलों की भरमार है | पर यहाँ पर्यटन स्थलों का समुचित प्रचार प्रसार नहीं है और इस सम्बन्ध मे प्रचार साहित्य भी&amp;nbsp; बिलकुल उपलब्ध नहीं है | अतयव समुचित प्रचार&amp;nbsp; प्रसार करके देश तथा विदेश के पर्यटकों को यहाँ आने के लिए आकर्षित किये जाने की बड़ी आवश्यकता है | बुंदलखंड मे धार्मिक , प्राकृतिक , ऐतिहासिक ,कलात्मक एवं सांस्कृतिक हर प्रकार का पर्यटन मिल जाता है | यहाँ के पर्यटन स्थलों मे देश तथा विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करने की भरपूर क्षमता है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; धार्मिक पर्यटन स्थलों की यहाँ प्रचुरता है | इसी कारण देश के प्रत्येक प्रान्त से आने वाली भ्रमण यात्राओं के नक़्शे मे बुंदेलखंड अनिवार्यतः सम्मिलित रहता है | प्रयाग के कुम्भ मे आने वाला ५० % श्रद्धालु चित्रकूट अवश्य ही आता है | इसी बात से बुंदेलखंड मे धार्मिक पर्यटन क़ी संभावना एवं महत्त्व को समझा जा सकता है | चित्रकूट मे प्रतिदिन प्रायः दस हजार , प्रत्येक अमवस्या पर होने वाले स्नान व मेले मे ४ - ५ लाख , सोमवती अमावस्या को ८ -९ लाख तथा दीवाली मेले पर २० से ३० लाख श्रद्धालु एकत्र होते हैं | दतिया जिले की पीताम्बरा पीठ तथा टीकमगढ़ जिले का ओरछा मंदिर धार्मिक पर्यटकों तथा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा है | चित्रकूट , ओरछा&amp;nbsp; तथा पीताम्बरापीठ आने वाले पर्यटकों को इनके अलावा अनेक पर्यटन स्थलों को देखने का भी मौका मिलता है | &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों मे झाँसी का किला , जो स्वाधीनता की प्रथम क्रांति का सशक्त गवाह रहा है , सर्व प्रमुख है | बांदा मे कालिंजर का किला , महोबा का किला सहित अनेक किले तथा अनेक ऐतिहासिक स्थल&amp;nbsp; दर्शनीय हैं | वैसे बुंदेलखंड का प्रत्येक जिला ऐतिहासिक गाथाओं तथा स्थलों से भरा हुआ है | आल्हा ऊदल सहित अनेक गौरव गाथाएं बुंदेलखंड की धरती पर बिखरी हुयी हैं | &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; खजुराहो अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों का बहुत प्रिय स्थल है | ओरछा , चित्रकूट और झाँसी मे भी अंतर्राष्ट्रीय पर्यटक खूब आते है | चित्रकूट के अनेको पर्यटन स्थल , बांदा के कलिजर तथा बुंदेलखंड के प्रत्येक जिले मे ऐसे पर्यटन स्थल हैं , जिनमे बिदेशी पर्यटकों की गहरी रूचि हो सकती है | आवश्यकता बस इतनी है कि इन पर्यटन स्थलों को टूरिस्ट नक़्शे पर लाकर इनके बारे मे खूब प्रचार प्रसार किया&amp;nbsp; जाय | इसके साथ ही इनकी समुचित मार्केटिंग किये जाने की भी आवश्यकता होगी | इसके बाद बुंदेलखंड मे पर्यटकों की बाढ़ रोके नहीं रुकेगा | चित्रकूट मे अनेक स्थलों पर गुफा ( भित्ति ) चित्र देखे जा सकते हैं , जिन्हें हमारे पत्थर काल के पुर्ब्जो ने बनाए थे | यहाँ खेतो की जुताई करते हुए किसानो को उसी पत्थर काल के पाषाण युगीन औजार मिल जाते हैं | एक किसान द्वारा एक पत्थर का औजार सौपे जाते समय मुझे जो रोमांच हुआ था , उसे मै आज तक नहीं भूल पाया हूँ | विश्व की इस अमूल्य निधि मे&amp;nbsp; देश व विदेश के किस पर्यटक की रूचि नहीं होगी | यह बिलकुल अछूता क्षेत्र है , जिसका अभी कोई विशेष&amp;nbsp; प्रचार प्रसार हुआ ही नहीं है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; वर्षा काल मे अन्य सभी&amp;nbsp; पर्यटन स्थल सामान्यतया कीचड़ व गंदगी आदि कारणों से अपना आकर्षण खो देते हैं और कोई पर्यटक वहा जाना नहीं चाहता है | बुंदेलखंड की स्थिति इसके बिलकुल बिपरीत है | बुंदेलखंड वर्षा ऋतु मे अधिक मनोरम एवं सुन्दर हो जाता है | हरियाली के कारण यह बड़ा मनोहारी एवं आकर्षक हो जाता है | पठारी भूभाग होने&amp;nbsp; एवं ढलान के कारण वर्षा का पानी भी यहाँ नहीं ठहरता | इस तरह यहाँ वर्षा व जाड़ा पर्यटन का सबसे उपयुक्त काल होता है | वर्षा काल मे यहाँ के झरने अपनी अनुपम छटा बिखेरते हैं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बुंदेलखंड के पर्यटन विकास की राह मे कई अडचने और कार्य हैं | पहला कार्य यह है कि बुंदेलखंड के प्रत्येक जिले मे पर्यटन की सम्भावना वाले पर्यटन स्थलों का चिन्हांकन किया जाय | दूसरा कार्य यह है&amp;nbsp; कि इन पर्यटन स्थलों का विकास करके अपेक्षित अवस्थापना सुविधाओं की व्यवस्था किया जाय | तीसरा कार्य यह है कि इन पर्यटन स्थलों को टूरिस्ट नक़्शे पर लेते हुए इस सम्बन्ध मे समुचित प्रचार प्रसार किया जाय | चौथा कार्य यह है कि टूरिस्ट गाइड व पर्यटन यात्रा एजेंसियों को प्रेरित करके यात्रा रूट तय करते हुए अपेक्षित सुरक्षा व्यवस्था मुहैया करायी जाय | तकनीकी संस्थानों तथा विश्व विद्यालयों&amp;nbsp; मे टूरिस्ट गाइड का कोर्स चलाकर प्रतिवर्ष हजारो हजारो बेरोजगारों को सम्मानजनक रोजगार मुहैया कराया जा सकता है |&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अपना बुंदेलखंड डॉट कॉम के लिए श्री जगन्नाथ सिंह पूर्व जिलाधिकारी, (झाँसी एवं चित्रकूट) द्वारा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3463606016400044783-4715904147447147829?l=apna-bundelkhand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/feeds/4715904147447147829/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/05/blog-post_27.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/4715904147447147829'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3463606016400044783/posts/default/4715904147447147829'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apna-bundelkhand.blogspot.com/2010/05/blog-post_27.html' title='बुंदेलखंड मे पर्यटन उद्योग'/><author><name>Jagannath Singh I.A.S (Retd.)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05887675493816268287</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Z-zIrBfB4RI/S8BvcMYZCRI/AAAAAAAAADk/HbvTGcGNwzU/S220/jagannath+singh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3463606016400044783.post-3369659369106326823</id><published>2010-05-24T17:35:00.000+05:30</published><updated>2010-05-24T17:35:42.075+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्य'/><title type='text'>स्वस्थ एवं सम्यक स्वास्थ्य बोध</title><content type='html'>मेरा यह मानना है कि आफ आल दि पैथीज दि बेस्ट इज दि रेजिस्टोपैथी एंड वर्स्ट इज दि सिम्पैथी | अर्थात व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता ही स्वास्थ्य है और सहानुभूति प्रतिरोधक क्षमता और स्वास्थ्य की विरोधी है | प्रतिरोधक क्षमता के मूल मे इच्छाशक्ति ही होती है और यही इच्छा शक्ति मनुष्य और ईश्वर मे अंतर को दर्शाती है | ईश्वरीय इच्छाशक्ति&amp;nbsp; इतनी शक्तिशाली है कि उसकी इच्छा मात्र से पल मे एक ग्रह बन जाता है अथवा नष्ट हो जाता है | यह विश्व ब्रह्माण्ड ईश्वर की इच्छाशक्ति का ही&amp;nbsp; अभिप्रकाशन मात्र है | जबकि संकल्प - विकल्प एवं दुविधा के चलते मानवीय इच्छाशक्ति कभी कभी उसे इस बात का निर्णय लेने&amp;nbsp; तक सक्षम नहीं बना पाती कि वह चाय पिए या काफी | अभाव , अनिश्चय , भय तथा निर्भरता के कारण मनुष्य को अपने ऊपर ही भरोसा नहीं होता और आत्मविश्वास मे कमी के कारण अपने को असहाय स्थिति मे पाता है | मनुष्य का&amp;nbsp; आत्मविश्वास जब घनीभूत हो जाता है तो उसे ही इच्छाशक्ति के रूप मे समझा जा सकता है |&amp;nbsp; अश्वशक्ति व धनशक्ति के क्रम मे इच्छाशक्ति संसार की सबसे बड़ी शक्ति है | जिस व्यक्ति मे जितनी अधिक इच्छाशक्ति होती है , वह उतना ही अधिक शक्तिशाली होता है | अतः स्वस्थ रहने के लिए प्रबल इच्छाशक्ति का होना नितांत आवश्यक है | &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; प्राकृतिक , शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक कार्य व्यवहार के सम्बन्ध मे सम्यक जानकारी न होने तथा कमजोर इच्छाशक्ति के कारण प्रायः बीमारियाँ मनस्तरीय आधार पा जाती हैं | इसके बिपरीत समुचित ज्ञान एवं प्रबल इच्छाशक्ति के चलते मानसिक स्तर पर उत्पन्न बीमारी का शारीरिक स्तर पर अभिव्यक्त होना संभव नहीं होता | इसको निग्रह शक्ति या प्रतिरोधक क्षमता भी कहते हैं | यह जिसमे जितना अधिक होगा , वह उतना ही स्वस्थ रहेगा और कम बीमार होगा |&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; यहाँ एक उदाहण रखना उपयोगी होगा | काफी उम्र पर पुत्र पैदा होने के कारण एक व्यक्ति अपने पुत्र से अतिशय लगाव रखता है | जिसके कारण पुत्र के मामूली जुकाम से वह बहुत परेशान हो जाता है और वह डाक्टर के पास जाकर बेटे को दिखाता है | दवा दिलाने के बाद बेटे पर टकटकी लगा कर दवा का असर देखने लगता है | थोड़ी देर बाद ही बेटे को पुनः छींक आने पर वह पुनः घबडा उठता है और बेटे को दूसरे डाक्टर को दिखाता है | इस प्रकार अपने बेटे के प्रति अतिशय प्रेम वं सहानुभूति के कारण वह धीरे धीरे अपने बेटे की प्रतिरोधक क्षमता को समाप्त करके उसका बहुत बड़ा अहित करता है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; वस्तुतः बीमारियाँ इस शरीर उद्योग के अवांछित उप उत्पाद के&amp;nbsp; बहिर्गमन की स्वाभाविक प्रक्रिया मे उत्पन्न होती हैं | उदाहरणार्थ शीरा&amp;nbsp; चीनी उद्योग का उप उत्पाद है , जिसकी बदबू के कारण फैक्ट्री वाले तथा आसपास के लोग शीरे को बिलकुल नहीं चाहते | किन्तु हकीकत यह है कि&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बिना शीरा बने चीनी बनाने की कल्पना नहीं की जा सकती | इसी तरह मानव शरीर मे स्वशन , पाचन , रक्त परिवहन आदि अनेक क्रियाएं चल रही हैं | जुकाम स्वशन क्रिया का स्वाभाविक उप उत्पाद है | इस तथ्य का सम्यक संज्ञान रखने वाला व्यक्ति इसे शरीर की स्वाभाविक क्रिया मानते हुए वह जुकाम से नहीं घबराएगा | वहीँ दूसरी ओर व्यक्ति जुकाम को बीमारी मान कर दवा लेकर बलगम बाहर निकलने की स्वाभाविक प्रक्रिया&amp;nbsp; पर अवरोध लगा देता है | दवा लेने के फलस्वरूप जुकाम तो ठीक हो जाता है , पर बाहर निकलने से रुका हुआ बलगम ब्रेन कंजेशन पैदा करके सरदर्द उत्पन्न करता है और वह जुकाम से ज्यादा परेशान हो जाता है | फिर सरदर्द से निजाद पाने के लिए वह सरदर्द की दवा लेता है | इसके बाद वही बलगम मवाद बनकर फोड़ा बनकर उसकी परेशानी और बढा देता है | फिर वह फोड़े की दवा लेता है | इस दवा के फलस्वरूप फोड़ा तो ठीक हो जाता है पर इसके साथ कैसर की बीमारी से ग्रसित करा देता है | इस प्रकार मामूली जुकाम उस व्यक्ति को डाक्टर तथा बीमारियों के कुचक्र मे डालकर कैंसर तक पहुँचा जाता है | यह है हमारी चिकित्सा पद्यति की असली हकीकत| इस स्वस्थ बोध से उसकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी | वह यह भी समझ जायेगा कि सहानुभूति उसके लिए अस्वास्थ्य कर एवं हानिकारक ही है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मोटे तौर पर यदि देखा जाय तो स्वस्थ रहने के लिए शारीर के दो अवयवो का ठीक रहना अत्यावश्यक है | यह दोनों अंग हैं दांत और दिल&amp;nbsp; | दांत के ठीक व् स्वस्थ होने की दशा में खाने का भरपूर चबाना संभव हो जाता है | यदि खाने को खूब चबा चबा कर खाया जाय तो खाना पूरा पूरा पच जाता है | ऐसी&amp;nbsp; दशा में उदर की कोई बीमारी नहीं हो सकती | इसी प्रकार दिल दूसरा अंग है , जिसके ठीक ठाक होने से हम अधिकांश बीमारियों से बचे रह सकते हैं | इस प्रकार यदि दांत और दिल पूरे - पूरे स्वस्थ और ठीक होते हैं तो हम ७०% बीमारियों से बचे रहते हैं | इस प्रकार लोगो को दांत और दिल को ठीक रखने के सम्बन्ध में कुछ अधिक गंभीर एवं सतर्क होना चाहिए |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पहले हम दांत को लेते हैं | दांत से हम खाना चबाने का काम करते हैं | सारे जीवों को हम शाकाहारी और मांसाहारी दो श्रेणियों मे विभक्त कर सकते हैं | आसानी से समझने के लिए यहाँ हम जानवरों का उदाहरण लेते हैं | शाकाहारी भोजन करने वाला जानवर फल, घास एवं पत्तियों को उसी रूप मे खाता है और बाद मे जुगाली करके भोजन को पचाता है | इसी प्रकार मांसाहारी जानवर शिकार करके कच्चा ही खा जाता है | इस प्रकार j खाने की प्रक्रिया मे ही जानवरों के दांतों का व्यायाम एवं साफ़ सफाई स्वयमेव हो जाती है | यही कारण है कि किसी जानवर का दांत अपरिवक्व रूप मे न तो ख़राब होता है और न ही टूटता है |जानवर कभी ब्रश भी नहीं करते और न ही ठंढा - गरम व् मसालेदार खाना ही करता है |&amp;nbsp; इस प्रकार&amp;nbsp; यदि हम भोजन मे&amp;nbsp; जानवरों से सीख लें तो मनुष्य के दांत हमेशा - हमेशा के लिए ठीक रह सकता है | उसके लिए आवश्यक है कि जब फल (सेब) खाना हो तो उसे चाक़ू से काटकर खाने के बजाये जानवरों की तरह सीधे दांतों से खाया जाए | इस प्रकार भोजन करने मे जानवरों का अनुसरण कर प्रकृति के निकटस्त रह कर ठंडा - गरम के बेमेल व् मसालेदार खाने से बचना चाहिए , तभी दांत पूर्णतया स्वस्त रह सकेगा | &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अब हम दिल को लेते हैं | मोटे तौर पर समझे तो दिल एक मशीन की तरह है | किसी मशीन के समुचित रख रखाव के उद्देश्य मशीन को उसकी औसत गति पर चलाना जरुरी होता है और २४ घंटे मे लगभग आधे घंटे के लिए उस मशीन को औसत से अधिक गति से चलाना चाहिए | तभी उक्त मशीन को बिलकुल ठीक ठाक रखा जा सकता है | इसे&amp;nbsp; समझने के लिए हम एक स्कूटर का उदाहरण लेगे | एक भारी शरीर का सेठ अपनी गद्दी जाने आने का काम अपने स्कूटर से करता था | वह डरते हुए २० -२५ किलोमीटर रफ़्तार से स्कूटर चलाता था , जिससे उसके स्कूटर की तेल वाहनियाँ सिकुड़ गयीं थी और इससे अधिक पेट्रोल जाने पर तेल नलिकाओं के फटने की सम्भावना बनी रहती है | अधिक रफ़्तार होने पर इंजिन और कारबोरेटर भी फेल हो सकता था , क्योंकि उनका समयोजम इसी गति से हो गया था | सेठ जी को एक संकटकालीन स्थिति मे अपनी&amp;nbsp; जान बचाने के लिए ७० - ८० किमी रफ़्तार से स्कूटर भगाना पड़ता है | ऐसी स्थिति मे उक्त स्कूटर की तेलवाही नलिकाएं या तो फट जाएगी अथवा इंजन या कारबोरेटर बुरी तरह फेल हो जायेगा और सेठ जी की जान को गंभीर खतरा भी उत्पन्न हो जायेगा | अतयव दिल को ठीक रखने के लिए दिल से औसत गति से काम लेना&amp;nbsp; चाहिए , यानि शारीरिक श्रम करते रहना चाहिए | इतना ही नहीं , २४ घंटे 
